बंगाल की दुर्गापूजा की बात हो और मां दुर्गा की दस भुजाओं वाली प्रतिमा का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। सिंह पर सवार, महिषासुर का वध करतीं और अलग-अलग अस्त्र धारण किए मां दुर्गा की यही छवि सदियों से बंगाली समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है। हालांकि, अगर पुराणों और देवी से जुड़े शास्त्रीय वर्णनों को देखा जाए तो मां दुर्गा का स्वरूप केवल दस भुजाओं तक सीमित नहीं है। अलग-अलग ग्रंथों में देवी के दो से लेकर 32 हाथों और यहां तक कि सहस्रभुजा स्वरूप का भी उल्लेख मिलता है।
कितने हाथों वाली हैं मां दुर्गा? शास्त्रों में एक नहीं, कई जवाब
आम तौर पर मां दुर्गा को ‘दशभुजा’ कहा जाता है, लेकिन देवी के स्वरूपों का शास्त्रीय विवरण इससे कहीं अधिक विस्तृत है। उपलब्ध पुरातात्विक और धार्मिक संदर्भों में दो, चार, आठ, दस, 12, 16, 18 और 32 भुजाओं वाली देवी की प्रतिमाओं के उदाहरण मिलते हैं। खास बात यह है कि देवी की भुजाओं की संख्या हमेशा एक जैसी नहीं रही। अलग-अलग काल, क्षेत्र, परंपरा और उपासना पद्धति के अनुसार देवी का स्वरूप बदलता रहा है।
दुर्गासप्तशती में अष्टभुजा और अष्टादशभुजा स्वरूप का उल्लेख
मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को समझने के लिए ‘देवी माहात्म्य’ यानी ‘दुर्गासप्तशती’ बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। यह मार्कण्डेय पुराण का हिस्सा है और इसमें देवी के अलग-अलग चरित्रों तथा उनके युद्धों का वर्णन मिलता है। शास्त्रीय व्याख्याओं के अनुसार इसमें देवी के आठ, दस और 18 भुजाओं वाले स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। यही वजह है कि केवल दस हाथों वाली प्रतिमा को ही देवी का एकमात्र शास्त्रीय स्वरूप मानना पूरी तस्वीर पेश नहीं करता।
महिषासुरमर्दिनी का शास्त्रीय स्वरूप भी दस भुजाओं वाला नहीं
बंगाल की पूजा पद्धति में महिषासुर का वध करती हुई दस भुजाओं वाली मां दुर्गा सबसे ज्यादा दिखाई देती हैं। लेकिन दुर्गासप्तशती के चरित्र-विभाजन को देखें तो महिषासुर वध से जुड़े देवी के रूप को अठारह भुजाओं वाली महालक्ष्मी से जोड़ा जाता है। वहीं तीसरे चरित में महाशक्ति का अष्टभुजा स्वरूप सामने आता है, जिसका संबंध शुम्भ और निशुम्भ के साथ युद्ध से बताया गया है। यानी जिस देवी को आज हम एक सामान्य रूप में देखते हैं, शास्त्रीय परंपरा में उनके अलग-अलग प्रसंगों के लिए अलग स्वरूप बताए गए हैं।
देवी के हाथों में कितने अस्त्र? ‘एक देवता-एक हथियार’ का हिसाब भी सीधा नहीं
लोकप्रिय मान्यता है कि देवताओं ने महिषासुर से युद्ध के लिए देवी को अपनी-अपनी शक्तियां और अस्त्र दिए। इसी आधार पर दस देवताओं और दस अस्त्रों से दस भुजाओं वाली देवी की व्याख्या की जाती है। लेकिन देवी माहात्म्य के विस्तृत वर्णन में कई देवताओं की ओर से अलग-अलग अस्त्र और शक्तियां दिए जाने की बात आती है। इनमें त्रिशूल, चक्र, शंख, धनुष-बाण, वज्र, दंड, तलवार, ढाल, कंठाभूषण और अन्य आयुधों का उल्लेख मिलता है। इसलिए देवी की भुजाओं की संख्या को केवल ‘दस देवता-दस हथियार’ के सरल समीकरण से समझना पर्याप्त नहीं माना जाता।
सहस्रभुजा स्वरूप भी मिलता है शास्त्रीय वर्णनों में
देवी के स्वरूपों की विविधता यहीं खत्म नहीं होती। कुछ शास्त्रीय वर्णनों में देवी के सहस्रभुजा यानी हजार भुजाओं वाले विराट स्वरूप की कल्पना भी मिलती है। यह स्वरूप देवी की असीम शक्ति और सर्वव्यापक सामर्थ्य का प्रतीक माना जाता है। जाहिर है कि हजार भुजाओं वाले स्वरूप को सामान्य मिट्टी की प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए पूजा की परंपराओं में अलग-अलग क्षेत्रों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं और कलात्मक परंपराओं के अनुसार देवी का स्वरूप विकसित किया।
बंगाल में भी सिर्फ दशभुजा नहीं, कई रूपों में होती है पूजा
बंगाल की धार्मिक परंपरा में देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा के उदाहरण मिलते हैं। कहीं अष्टभुजा देवी की प्रतिमा स्थापित होती है, तो कहीं चतुर्भुजा या द्विभुजा स्वरूप में मां की आराधना की जाती है। पश्चिम बंगाल के कई पुराने पूजा स्थलों और पारंपरिक परिवारों में सामान्य दस भुजाओं वाली प्रतिमा से अलग स्वरूप आज भी देखने को मिलते हैं। इससे पता चलता है कि बंगाल की दुर्गापूजा केवल एक निश्चित मूर्ति या एक ही प्रतिमा-विधान तक सीमित नहीं रही है।
कहीं चार तो कहीं दो हाथों वाली मां की भी होती है पूजा
बंगाल की परंपराओं में ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं जहां देवी को चार या दो भुजाओं के साथ पूजा जाता है। कुछ पारंपरिक पूजा स्थलों में स्थानीय मान्यता और पारिवारिक परंपरा के कारण देवी के स्वरूप में बदलाव देखने को मिलता है। यानी जिस दस भुजाओं वाली मां को आज बंगाली दुर्गापूजा की पहचान माना जाता है, वह देवी के अनेक रूपों में से एक लोकप्रिय रूप है।
तो फिर दस भुजाओं वाली मां दुर्गा इतनी लोकप्रिय कैसे हुईं?
दस भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा धीरे-धीरे बंगाल की दुर्गापूजा का सबसे पहचानने योग्य स्वरूप बन गई। इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ बंगाल की मूर्तिकला और पारिवारिक पूजा परंपराओं की भी बड़ी भूमिका रही। मां के दस हाथों में अलग-अलग अस्त्र दिखाए जाते हैं, जो देवी की विभिन्न शक्तियों और बुराई के खिलाफ उनके संघर्ष का प्रतीक माने जाते हैं। इसी रूप ने आगे चलकर सार्वजनिक दुर्गापूजा की सबसे लोकप्रिय प्रतिमा का स्वरूप ले लिया।
देवी की भुजाओं की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका प्रतीकात्मक अर्थ
धार्मिक व्याख्याओं में देवी की अनेक भुजाओं को केवल शारीरिक स्वरूप के तौर पर नहीं देखा जाता। अधिक हाथों का अर्थ अधिक अस्त्र और अधिक शक्ति से जोड़ा जाता है। देवी के अनेक हाथ उस सामूहिक शक्ति का प्रतीक माने जाते हैं, जो विभिन्न देवताओं की शक्तियों के एक साथ आने से निर्मित होती है। इस दृष्टि से दो, आठ, दस, 18 या हजार भुजाएं—संख्या भले अलग हो, लेकिन संदेश एक ही है: शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय।
बंगाल की दुर्गापूजा ने शास्त्र और लोकपरंपरा को जोड़ा
मां दुर्गा की आज दिखाई देने वाली पारिवारिक प्रतिमा—जिसमें उनके साथ गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती भी मौजूद होते हैं—बंगाल की विशिष्ट सांस्कृतिक कल्पना का हिस्सा है। यही वजह है कि यहां दुर्गा केवल महिषासुरमर्दिनी के रूप में नहीं, बल्कि बेटी उमा और परिवार की सदस्य के रूप में भी देखी जाती हैं। शास्त्रीय देवी और बंगाल की लोक-संस्कृति के इस मेल ने दुर्गापूजा को सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे भावनाओं, कला, परंपरा और सामाजिक उत्सव का रूप दे दिया।
दस भुजाओं में समाई अनंत शक्ति
इसलिए मां दुर्गा को ‘दशभुजा’ कहना उनकी पहचान जरूर है, लेकिन उनकी पूरी शक्ति को केवल दस हाथों तक सीमित करना शास्त्रीय परंपरा की व्यापकता को छोटा कर देता है। पुराणों से लेकर लोकपरंपरा और मूर्तिकला तक देवी के अनेक रूप सामने आते हैं। यही विविधता बताती है कि मां दुर्गा का स्वरूप किसी एक संख्या में बंधा नहीं है—उनकी भुजाएं जितनी बढ़ती हैं, उनके भीतर समाई शक्ति और प्रतीकात्मकता की कल्पना भी उतनी ही व्यापक होती जाती है।