मानव सभ्यता की शुरुआत से ही लंबी आयु और अमरता की खोज विज्ञान, दर्शन और चिकित्सा का प्रमुख विषय रही है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने पिछले कुछ दशकों में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ाने, गंभीर बीमारियों के उपचार और बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल बुढ़ापे को नियंत्रित कर लेने से मनुष्य अमर नहीं बन सकता। हाल में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार यदि भविष्य में उम्र बढ़ने की लगभग सभी जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने वाली प्रभावी चिकित्सा भी विकसित हो जाए, तब भी मनुष्य की अधिकतम आयु लगभग 150 से 190 वर्ष के बीच ही सीमित रह सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे शरीर की कोशिकाओं और डीएनए में समय के साथ होने वाले ऐसे प्राकृतिक परिवर्तन जिम्मेदार हैं, जिन्हें पूरी तरह रोक पाना वर्तमान वैज्ञानिक समझ के अनुसार संभव नहीं है।
डीएनए में छिपा है जीवन की अधिकतम आयु का रहस्य
रूस के स्कोल्कोवो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने मानव आयु की जैविक सीमा को समझने के लिए एक विशेष वैज्ञानिक मॉडल विकसित किया है। इस मॉडल के अनुसार समय बीतने के साथ मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका के डीएनए में सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों को वैज्ञानिक भाषा में 'सोमैटिक म्यूटेशन' कहा जाता है। प्रारंभ में ये परिवर्तन नगण्य प्रतीत होते हैं, लेकिन वर्षों और दशकों के दौरान इनकी संख्या बढ़ती जाती है। यही क्रमिक बदलाव शरीर की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं और अंततः उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यही जैविक परिवर्तन मानव जीवन की अंतिम सीमा निर्धारित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
बुढ़ापे के साथ क्यों कमजोर होने लगता है शरीर
बढ़ती उम्र के साथ शरीर की कोशिकाओं की मरम्मत करने और स्वयं को पुनर्जीवित करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। पुरानी कोशिकाएं शरीर में जमा होने लगती हैं और वे पहले की तरह अपशिष्ट पदार्थों तथा विषैले तत्वों को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पातीं। परिणामस्वरूप शरीर के विभिन्न अंगों की कार्यक्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है। मांसपेशियों की शक्ति घटती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और ऊतकों की मरम्मत की प्रक्रिया भी धीमी पड़ जाती है। यही कारण है कि बढ़ती उम्र के साथ अनेक दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, जिसे पूरी तरह समाप्त करना अत्यंत कठिन है।
कोशिकाओं की प्रतिकृति के दौरान होती हैं सूक्ष्म त्रुटिया
मानव शरीर लगातार नई कोशिकाएं बनाता रहता है। इस प्रक्रिया में प्रत्येक नई कोशिका के निर्माण के समय डीएनए की प्रतिलिपि तैयार की जाती है। हालांकि यह प्रक्रिया अत्यंत सटीक होती है, फिर भी कभी-कभी इसमें सूक्ष्म त्रुटियां हो जाती हैं। यही छोटी-छोटी त्रुटियां आगे चलकर सोमैटिक म्यूटेशन का रूप ले लेती हैं। समय के साथ इन परिवर्तनों का संचय शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है और उम्र बढ़ने की गति में योगदान देता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी इन त्रुटियों को कम करने में भविष्य में कुछ हद तक सफल हो सकती है, लेकिन उन्हें पूरी तरह समाप्त कर देना वर्तमान विज्ञान की दृष्टि से संभव नहीं माना जाता।
क्या बुढ़ापे की दवा से अमरता संभव है?
शोधकर्ताओं का स्पष्ट मत है कि भविष्य में यदि ऐसी दवाएं विकसित हो जाएं जो उम्र बढ़ने की गति को काफी हद तक धीमा कर दें, तब भी मनुष्य अमर नहीं बन सकेगा। ऐसी चिकित्सा तकनीकें जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकती हैं, अनेक आयु-संबंधी बीमारियों के खतरे को कम कर सकती हैं और जीवन अवधि को कुछ हद तक बढ़ा सकती हैं, लेकिन डीएनए में लगातार होने वाले प्राकृतिक जैविक परिवर्तनों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा। इसी कारण मृत्यु को अनिश्चित काल तक टालना या अमरता प्राप्त करना अभी भी वैज्ञानिक कल्पना का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि इस क्षेत्र में अनुसंधान लगातार जारी है और भविष्य में नई खोजें मानव जीवन को और अधिक स्वस्थ तथा दीर्घायु बना सकती हैं, किंतु अमरता का दावा करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
स्वस्थ जीवनशैली अब भी लंबी आयु की सबसे प्रभावी कुंजी
वैज्ञानिकों का मानना है कि भले ही चिकित्सा विज्ञान लगातार प्रगति कर रहा हो, लेकिन वर्तमान समय में लंबा और स्वस्थ जीवन जीने का सबसे विश्वसनीय तरीका संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव पर नियंत्रण और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच ही है। धूम्रपान और अत्यधिक मद्यपान जैसी आदतों से दूरी, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों का समय पर उपचार तथा मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि विज्ञान उम्र बढ़ने की गति को धीमा करने में भविष्य में नई संभावनाएं अवश्य खोल सकता है, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली का कोई विकल्प आज भी उपलब्ध नहीं है।