रायपुर। छत्तीसगढ़ में ज्वेलरी शॉप्स की सुरक्षा को लेकर लिया गया एक फैसला अब सियासी बहस का रूप ले चुका है। हाल ही में नवापारा-राजिम और सुकमा में हुई लूट की घटनाओं के बाद छत्तीसगढ़ सर्राफा एसोसिएशन ने ज्वेलरी दुकानों में बुर्का, नकाब और हेलमेट पहनकर प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। एसोसिएशन का दावा है कि यह फैसला पूरी तरह सुरक्षा के मद्देनजर लिया गया है, लेकिन राजनीति में आते ही इसका फोकस “बुर्का बैन” पर सिमट गया।
लूट की घटनाओं से बढ़ी चिंता
नवापारा-राजिम में एक ज्वेलरी शॉप से करीब 1 करोड़ रुपये के सोने-चांदी के जेवरात चोरी होने की घटना ने सराफा व्यापारियों को हिला दिया। इसके अलावा सुकमा में 13 लाख रुपये की लूट, जिसमें दो नकाबपोश लुटेरे शामिल थे, और अंबिकापुर में बुर्का पहनकर चोरी की कोशिश की घटना ने सुरक्षा चिंताओं को और गहरा किया। इन्हीं घटनाओं के बाद सर्राफा एसोसिएशन ने दुकानों में चेहरा ढंककर आने वालों पर रोक लगाने का फैसला किया।
सराफा एसोसिएशन का पक्ष
छत्तीसगढ़ सर्राफा एसोसिएशन के अध्यक्ष कमल सोनी का कहना है कि “सोने-चांदी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे में भविष्य में लूट की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। पहचान छुपाकर आने वालों से खतरा ज्यादा होता है, इसलिए यह फैसला सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है।”
सियासत गरमाई
फैसले के बाद मामला राजनीतिक रंग में रंग गया। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस इस फैसले को सही तो मान रही है लेकिन बीजेपी पर बुर्का को लेकर संकीर्ण मानसिकता का आरोप भी लगा रही है वहीं उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इस मामले में पलटवार करते हुए कहा है कि सराफा एसोसिएशन ने अपना निर्णय ले लिया है, कांग्रेस को कोई परेशानी है तो सराफा एसोसिएशन से बात कर ले।
सवाल पहचान का या पहनावे का?
दिलचस्प बात यह है कि लूट हाथों से की गई, लेकिन बहस पहचान और पहनावे पर सिमट गई। सुरक्षा के तर्क के साथ लिया गया फैसला अब धार्मिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनता जा रहा है।
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