कोलकाता/नदिया: 2002 में दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित FESPIC Games में भारत के लिए हाई जंप में स्वर्ण पदक जीतने वाले पश्चिम बंगाल के दिव्यांग एथलीट सोमनाथ मालो आज बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले सोमनाथ अब ब्लड कैंसर से जूझ रहे हैं और जिस सरकारी स्कूल में ग्रुप-C कर्मचारी के रूप में काम कर रहे थे, वह नौकरी भी सुप्रीम कोर्ट के 2016 SSC भर्ती मामले से जुड़े फैसले के बाद चली गई। नौकरी जाने के बाद इलाज और परिवार चलाने की चिंता के बीच सोमनाथ अब सरकार से मदद की उम्मीद कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें पहले भी सरकारी नौकरी का भरोसा मिला था, लेकिन वह आश्वासन पूरा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के दौरान रेलवे में खेल कोटे से नौकरी के कथित आश्वासन का भी उन्होंने जिक्र किया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध विश्वसनीय सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं मिली है, इसलिए इसे सोमनाथ के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
2002 बुसान में भारत के लिए जीता था हाई जंप गोल्ड
सोमनाथ मालो की खेल उपलब्धि की पुष्टि पुराने रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों से होती है। 2002 के FESPIC Games में भारतीय दल ने कुल 22 पदक—3 गोल्ड, 9 सिल्वर और 10 ब्रॉन्ज जीते थे। सोमनाथ ने हाई जंप में भारत के लिए स्वर्ण पदक हासिल किया था। उस समय उनकी उम्र करीब 20 साल थी। चाकदह कॉलेज के आधिकारिक दस्तावेज में भी सोमनाथ मालो के नाम के साथ 2002 में बुसान में हाई जंप में गोल्ड और 2006 के बेंगलुरु नेशनल गेम्स में हाई जंप में एक और गोल्ड का उल्लेख मिलता है। रिकॉर्ड में 2006 की मलेशिया प्रतियोगिता में चौथे स्थान का भी जिक्र है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने घर बुलाकर कराया था डिनर
बुसान से लौटने के करीब 20 दिन बाद भारतीय दल को दिल्ली बुलाया गया था। खेल मंत्रालय की ओर से सम्मान समारोह के बाद खिलाड़ियों को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर रात्रिभोज के लिए ले जाया गया। 2018 में PTI को दिए इंटरव्यू में सोमनाथ ने उस मुलाकात को याद करते हुए बताया था कि वाजपेयी ने उन्हें अपने पास बैठाया और उनके घर तथा दिव्यांगता के बारे में पूछा था। सोमनाथ उस समय भारतीय दल के सबसे कम उम्र के सदस्यों में थे। वाजपेयी ने उन्हें आगे अभ्यास जारी रखने और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने की सलाह दी थी।
ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के दौरान नौकरी के आश्वासन का दावा
सोमनाथ का कहना है कि केंद्र में ममता बनर्जी के रेल मंत्री रहने के दौरान बंगाल के पदक विजेता खिलाड़ियों को रेलवे में नौकरी देने की बात हुई थी। उनके मुताबिक, उन्हें भी खेल कोटे के तहत रेलवे में नौकरी मिलने का भरोसा दिया गया था। सोमनाथ का दावा है कि उनके साथ खेल से जुड़े कुछ खिलाड़ियों को बाद में रेलवे में नौकरी मिल गई, लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक वह इस उम्मीद में रहे कि उनका नाम भी नौकरी की सूची में आएगा। हालांकि, ममता बनर्जी की ओर से सोमनाथ को रेलवे नौकरी देने के इस कथित आश्वासन की स्वतंत्र पुष्टि मुझे उपलब्ध विश्वसनीय ऑनलाइन स्रोतों में नहीं मिली है। इसलिए इसे आरोप या स्थापित तथ्य के बजाय सोमनाथ के बयान के तौर पर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
2016 में मिली स्कूल की नौकरी, लेकिन 2025 में वह भी चली गई
सोमनाथ को बाद में 2016 में बीरनगर हाई स्कूल में ग्रुप-C कर्मचारी के रूप में नौकरी मिली थी। 2018 की PTI रिपोर्ट में भी उनके स्कूल में गैर-शिक्षण कर्मचारी के रूप में काम करने का उल्लेख है। लेकिन 2025 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2016 की पश्चिम बंगाल SSC भर्ती प्रक्रिया से जुड़े हजारों शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द हो गईं। सोमनाथ भी इससे प्रभावित हुए। Hindustan Times ने उन्हें उन कर्मचारियों में शामिल बताया जिनकी नौकरी चली गई। West Bengal School Service Commission की उपलब्ध सूची में भी Somnath Malo का नाम दर्ज है। 2026 की सूची में उनके नाम के साथ क्लर्क पद का उल्लेख मिलता है।
ब्लड कैंसर से पांच साल से जंग
नौकरी जाने की परेशानी के बीच सोमनाथ गंभीर बीमारी से भी लड़ रहे हैं। Hindustan Times की रिपोर्ट के अनुसार, वह पिछले करीब पांच वर्षों से ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, उनके इलाज के लिए उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल जाना पड़ता था और इलाज पर लगातार खर्च हो रहा था। नौकरी उनकी आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार थी, इसलिए उसके चले जाने से परिवार की मुश्किलें और बढ़ गईं।
अब सरकार से नौकरी या आर्थिक सहायता की उम्मीद
सोमनाथ का कहना है कि उन्होंने देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीता, लेकिन आज बीमारी और बेरोजगारी के बीच परिवार का भविष्य चिंता का विषय बना हुआ है। उनकी मांग है कि उनकी दिव्यांगता, खेल उपलब्धियों और गंभीर बीमारी को देखते हुए सरकार उनके लिए कोई मानवीय समाधान निकाले। उनकी अपील है कि उन्हें दोबारा रोजगार, आर्थिक सहायता या इलाज के लिए विशेष मदद उपलब्ध कराई जाए, ताकि परिवार का खर्च और कैंसर का इलाज जारी रह सके। एक तरफ 2002 का वह खिलाड़ी है जिसने बुसान में भारत के लिए तिरंगा ऊंचा किया था, तो दूसरी तरफ आज वही खिलाड़ी बीमारी और बेरोजगारी के बीच सरकारी मदद का इंतजार कर रहा है। सोमनाथ मालो की कहानी इस सवाल को भी सामने लाती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतने वाले दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए खेल करियर के बाद सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा कितनी मजबूत है।