पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इन दोनों सीटों पर मुकाबला सिर्फ उम्मीदवारों और पार्टियों के बीच नहीं रहने वाला, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच भी ताकत का बड़ा इम्तिहान माना जा रहा है। चुनाव आयोग ने दोनों सीटों के लिए कार्यक्रम जारी कर दिया है। 6 अक्टूबर को मतदान और 9 अक्टूबर को मतगणना होगी। नामांकन की प्रक्रिया 9 सितंबर से शुरू होकर 16 सितंबर तक चलेगी। इसी बीच TMC के प्रतिद्वंद्वी गुट ने दोनों सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर दिया है, जबकि ममता बनर्जी के गुट ने अभी अपने उम्मीदवारों को लेकर पत्ते नहीं खोले हैं।
दो सीटें, लेकिन दांव पर TMC की सियासी पहचान
रेजीनगर और नंदीग्राम के उपचुनाव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि TMC के दोनों गुट इन चुनावों में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी में हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का गुट है, तो दूसरी तरफ रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला प्रतिद्वंद्वी गुट खुद को ‘असली TMC’ बता रहा है। पूर्व राज्य मंत्री फिरहाद हकीम, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में शामिल रहे हैं, अब प्रतिद्वंद्वी गुट के साथ हैं। हकीम ने दावा किया है कि उनका गुट रेजीनगर और नंदीग्राम दोनों सीटों पर चुनाव लड़ेगा और जीत हासिल करेगा। प्रतिद्वंद्वी गुट के विधानसभा में मुख्य सचेतक अखरुज्जमां के मुताबिक, उम्मीदवारों के नाम तय करने के लिए कार्यसमिति की बैठक होगी।
चुनाव चिह्न पर फैसला क्यों बन गया सबसे बड़ा सवाल?
इस उपचुनाव में सीटों से ज्यादा दिलचस्प लड़ाई TMC के चुनाव चिह्न को लेकर हो सकती है। दोनों गुटों के बीच पार्टी की आधिकारिक पहचान और चुनाव चिह्न पर अधिकार का सवाल अभी असमंजस में है। ऐसे में चुनाव आयोग का फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिस गुट को आधिकारिक चुनाव चिह्न मिलता है, उसे चुनावी मैदान में संगठनात्मक और राजनीतिक बढ़त मिलने की संभावना रहेगी।
ममता गुट ने उम्मीदवारों पर अभी नहीं खोले पत्ते
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से अभी तक दोनों सीटों पर उम्मीदवारों को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालांकि, पार्टी के वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर भाजपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि भाजपा प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल कर चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर सकती है। उन्होंने पुलिस के जरिए चुनाव को नियंत्रित करने और TMC समर्थकों पर हमले की आशंका भी जताई है। ये आरोप राजनीतिक दावों के रूप में सामने आए हैं और भाजपा की ओर से इस पर प्रतिक्रिया इस खबर में उपलब्ध नहीं है।
नंदीग्राम में ममता गुट के सामने सबसे बड़ी चुनौती
नंदीग्राम की सीट ममता बनर्जी के लिए पहले से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा था। ममता गुट के एक नेता के अनुसार, इस बार यहां ऐसा उम्मीदवार उतारना चुनौती होगा जो भाजपा के मुकाबले मजबूत चुनावी लड़ाई दे सके। इसी संदर्भ में शेख सूफियान का नाम भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वह 2021 के चुनाव में ममता बनर्जी के चुनाव एजेंट रह चुके हैं। दूसरी ओर, सुवेंदु अधिकारी ने उपचुनाव की घोषणा के बाद दावा किया है कि नंदीग्राम की जनता उनकी बड़ी जीत सुनिश्चित करने के लिए तैयार है।
रेजीनगर में बदलेगा धार्मिक समीकरण का खेल?
रेजीनगर सीट का सामाजिक और धार्मिक समीकरण चुनाव को और दिलचस्प बनाता है। उपलब्ध आकलनों के मुताबिक यहां करीब 27 से 30 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं, जबकि मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है। 2025 में निलंबित किए गए TMC के पूर्व भरतपुर विधायक हुमायूं कबीर ने कहा है कि अगर दूसरे दल हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाते हैं, तो वह मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मांगेंगे। इस बयान से संकेत मिलता है कि रेजीनगर में चुनावी रणनीति काफी हद तक मतदाताओं के सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर तैयार की जा सकती है।
फाल्टा चुनाव ने क्यों बढ़ाई TMC की चिंता?
इन उपचुनावों से पहले फाल्टा विधानसभा सीट का परिणाम भी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया है। भाजपा ने फाल्टा में 1,09,021 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। खास बात यह रही कि 2011 के बाद तीन बार फाल्टा सीट जीत चुकी TMC इस बार चौथे स्थान पर चली गई। इस नतीजे ने राज्य में विपक्षी दलों के प्रदर्शन और TMC की चुनावी स्थिति को लेकर बहस तेज कर दी है। इसी वजह से रेजीनगर और नंदीग्राम के नतीजों पर सिर्फ TMC ही नहीं, बल्कि भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों की भी नजर रहेगी।
क्या उपचुनाव बताएगा कि जनता किस TMC गुट के साथ है?
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए इन दोनों सीटों का परिणाम इसलिए अहम होगा क्योंकि यह TMC के भीतर चल रही खींचतान के बीच जनता के रुख का शुरुआती संकेत दे सकता है। राजनीतिक स्तंभकार सुवाशिस मैत्रा के मुताबिक, चुनाव चिह्न इस मुकाबले में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके अलावा कांग्रेस और वाम दल कितना प्रभाव छोड़ते हैं, यह भी चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। अगर दोनों सीटों पर TMC के अलग-अलग गुट आमने-सामने उतरते हैं, तो परिणाम केवल जीत-हार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे यह संदेश भी निकल सकता है कि मतदाताओं के बीच पार्टी की वास्तविक राजनीतिक पकड़ किसके साथ है।
6 अक्टूबर को मतदान, 9 अक्टूबर को आएगा फैसला
चुनाव आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक दोनों विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होगा और 9 अक्टूबर को मतगणना के बाद परिणाम सामने आएगा। नामांकन के लिए 9 से 16 सितंबर तक का समय निर्धारित किया गया है। इन तारीखों के साथ अब सबसे ज्यादा नजर तीन चीजों पर रहेगी—दोनों गुटों के उम्मीदवार कौन होंगे, चुनाव चिह्न को लेकर आयोग क्या फैसला करता है और मतदाता किस गुट को समर्थन देते हैं।
आने वाले नगर निकाय चुनावों पर भी पड़ेगा असर
रेजीनगर और नंदीग्राम के परिणामों को पश्चिम बंगाल की आगामी स्थानीय राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि दोनों सीटों का परिणाम TMC के भीतर शक्ति संतुलन, विपक्ष की रणनीति और आने वाले कोलकाता तथा अन्य जिलों के नगर निकाय चुनावों पर असर डाल सकता है। इस लिहाज से अक्टूबर में आने वाला परिणाम पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए महज दो विधानसभा सीटों का आंकड़ा नहीं होगा, बल्कि आगे की राजनीतिक दिशा का संकेत भी दे सकता है।