कोलकाता: पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद चर्चित 'अभया' (आरजी कर अस्पताल) मामले में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस राजशेखर मान्ठा की डिवीजन बेंच ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस मान्ठा ने इस मामले को वापस मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास भेजने का निर्देश दिया।
क्यों पीछे हटी जस्टिस मान्ठा की बेंच?
सुनवाई के दौरान जस्टिस मान्ठा ने टिप्पणी की कि राज्य में नई सरकार के गठन के बाद अब इस मामले की जांच के लिए एक 'राज्य न्यायिक आयोग' (State Judicial Commission) के गठन की खबरें आ रही हैं। उन्होंने कहा, "ऐसा सुना जा रहा है कि सरकार इस मामले के लिए न्यायिक आयोग बना रही है, इसलिए वर्तमान में इस बेंच द्वारा सुनवाई की आवश्यकता नहीं लगती।" उन्होंने आगे कहा कि यह मामला न केवल याचिकाकर्ता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे देश की नजरें इस पर टिकी हैं।
चुनावी मुद्दा बना था आरजी कर कांड
गौरतलब है कि पिछली सरकार के खिलाफ जनाक्रोश भड़काने में आरजी कर अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ हुए जघन्य अपराध ने बड़ी भूमिका निभाई थी। सीबीआई जांच के बाद मुख्य आरोपी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन पीड़िता का परिवार और बंगाल की जनता इस फैसले से असंतुष्ट है। लोगों का मानना है कि असली साजिशकर्ताओं को अब भी छुपाया जा रहा है।
विधायक बनीं अभया की मां
न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए अभया की मां रत्ना देबनाथ चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुई थीं। वर्तमान में वह पानीहाटी से विधायक निर्वाचित हुई हैं। उनका स्पष्ट रुख है कि जब तक उनकी बेटी को पूर्ण न्याय नहीं मिलता और सच्चाई सामने नहीं आती, उनकी लड़ाई जारी रहेगी।अब यह मामला वापस मुख्य न्यायाधीश के पास जाने से उम्मीद जताई जा रही है कि नई सरकार द्वारा गठित होने वाला न्यायिक आयोग इस केस की परतों को फिर से खोलेगा और उन तथ्यों को सामने लाएगा जो अब तक दफन थे।