नई दिल्ली. 86 साल पुराने दिल्ली रेस क्लब के लिए जमीन खाली करने के मामले में बड़ा झटका लगा है। क्लब को एस्टेट ऑफिसर की ओर से जारी बेदखली आदेश पर रोक लगाने की मांग को अदालत ने स्वीकार नहीं किया। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि क्लब को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए गए थे। इसके बावजूद उसने तय प्रक्रिया के तहत समय पर जवाब और आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए। अदालत के इस रुख के बाद क्लब की ओर से बेदखली आदेश को तत्काल रोकने की कोशिश को बड़ा झटका माना जा रहा है।
पर्याप्त मौका मिलने के बावजूद जवाब दाखिल नहीं करने पर सवाल
दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत के जिला एवं सत्र न्यायाधीश पितांबर दत्त ने मामले के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि एस्टेट ऑफिसर ने क्लब को अपना जवाब दाखिल करने और उसके समर्थन में साक्ष्य पेश करने के पर्याप्त अवसर दिए थे। अदालत के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से दाखिल याचिका की प्रति भी क्लब को उपलब्ध कराई गई थी और जवाब देने के लिए समय दिया गया था। इसके बावजूद क्लब ने तय अवधि में अपना पक्ष औपचारिक रूप से दाखिल नहीं किया। ऐसे में एस्टेट ऑफिसर ने क्लब का जवाब दाखिल करने का अधिकार समाप्त कर दिया और बाद में मामले में आदेश सुरक्षित कर लिया।
प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील अदालत ने खारिज की
क्लब की ओर से वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। उनका कहना था कि एस्टेट ऑफिसर ने केंद्र सरकार की याचिका की प्रति क्लब को उपलब्ध नहीं कराई, जिससे उसे अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का अवसर नहीं मिला। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि 27 अप्रैल 2026 के आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज था कि संबंधित याचिका की प्रति दिल्ली रेस क्लब को दे दी गई थी। इसलिए क्लब की ओर से यह कहना कि उसे याचिका की कॉपी नहीं मिली, रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से मेल नहीं खाता।
क्लब के प्रतिनिधि के हस्ताक्षर भी बने अहम आधार
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि संबंधित आदेश पर क्लब के सचिव और कानूनी प्रतिनिधि कर्नल एसके बख्शी के हस्ताक्षर मौजूद थे। इस तथ्य को अदालत ने महत्वपूर्ण माना, क्योंकि इसके बाद किसी भी सुनवाई के दौरान क्लब ने एस्टेट ऑफिसर के समक्ष यह शिकायत दर्ज नहीं कराई कि उसे केंद्र सरकार की याचिका की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। न्यायालय ने माना कि यदि वास्तव में दस्तावेज की प्रति नहीं मिली होती, तो क्लब को कार्यवाही के दौरान इस मुद्दे को उठाने का अवसर था। रिकॉर्ड में ऐसी कोई आपत्ति न मिलने के कारण अदालत ने क्लब की दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
जवाब और सबूत पेश न करने से कमजोर पड़ा क्लब का पक्ष
अदालत के अनुसार, एस्टेट ऑफिसर ने केवल औपचारिक नोटिस जारी कर मामला आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि क्लब को अपना जवाब दाखिल करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कई अवसर दिए। इसके बावजूद क्लब ने इन अवसरों का उपयोग नहीं किया। न्यायालय ने माना कि जब किसी पक्ष को पर्याप्त अवसर मिलने के बाद भी वह तय प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करता, तो बाद में कार्यवाही को केवल इस आधार पर चुनौती देना उचित नहीं माना जा सकता कि उसे सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। इसी आधार पर अदालत ने बेदखली आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
जमीन खाली करने का आदेश पहले ही हो चुका था जारी
दिल्ली रेस क्लब को संबंधित जमीन खाली करने का नोटिस पहले ही दिया जा चुका था और एस्टेट ऑफिसर की कार्यवाही के बाद बेदखली का आदेश जारी हुआ। क्लब ने इस आदेश के खिलाफ अदालत का रुख करते हुए राहत की मांग की थी, लेकिन उसे तत्काल सफलता नहीं मिली। अदालत के फैसले से फिलहाल बेदखली आदेश पर रोक नहीं लगी है, जिससे क्लब के सामने आगे की कानूनी रणनीति तय करने की चुनौती खड़ी हो गई है। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और संभावित अपील पर सभी की नजर रहेगी।
86 साल पुराने रेस क्लब के भविष्य पर बढ़ा सवाल
दिल्ली रेस क्लब लंबे समय से राजधानी की खेल और सामाजिक विरासत का हिस्सा रहा है। मौजूदा अदालती फैसले के बाद उसके भविष्य और परिसर के उपयोग को लेकर चर्चा तेज हो सकती है। हालांकि क्लब के पास आगे उपलब्ध कानूनी विकल्पों और किसी उच्च अदालत का रुख करने की संभावना पर स्थिति आने वाले दिनों में स्पष्ट होगी। फिलहाल पटियाला हाउस अदालत के फैसले ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि बेदखली आदेश पर तत्काल रोक लगाने की क्लब की मांग स्वीकार नहीं की गई है और अदालत ने कार्यवाही में पर्याप्त अवसर दिए जाने के एस्टेट ऑफिसर के रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण आधार माना है।