दिल्ली. जून से अगस्त के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में मानसून की गतिविधियों में काफी अंतर देखने को मिला है। कुछ क्षेत्रों में लगातार बारिश ने जलस्रोतों और खेतों को पर्याप्त पानी दिया, जबकि दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब समेत उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्से अपेक्षित वर्षा के लिए तरसते रहे। भारत मौसम विज्ञान विभाग के 31 अगस्त के पूर्वानुमान के अनुसार सितंबर में देशव्यापी वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। विभाग की मौसमी पृष्ठभूमि में भी 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश के लिए सामान्य से कम वर्षा का संकेत पहले से दिया गया था।
सितंबर की सामान्य दीर्घावधि वर्षा लगभग 167.9 मिमी मानी जाती है, लेकिन इस बार महीने के दौरान देश के बड़े हिस्से में इससे कम वर्षा होने का जोखिम बना हुआ है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे महीने बारिश पूरी तरह कमजोर रहेगी। मौसम की क्षेत्रीय प्रणालियों में बदलाव के कारण कुछ दिनों के दौरान अचानक बारिश की गतिविधियां तेज हो सकती हैं। खासकर सितंबर के शुरुआती दिनों में उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में बादल, गरज-चमक और वर्षा की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि मानसून की विदाई की शुरुआत के बावजूद आने वाले दिनों में कई क्षेत्रों को बारिश की राहत मिलने की उम्मीद है।
दिल्ली-एनसीआर में 1 से 4 सितंबर तक बारिश का दौर
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सितंबर की शुरुआत मौसम के लिहाज से अपेक्षाकृत राहत देने वाली हो सकती है। उपलब्ध पूर्वानुमान के मुताबिक 1 से 4 सितंबर के बीच बादल छाए रहने के साथ हल्की से मध्यम बारिश की गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं। कुछ स्थानों पर गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ने की संभावना भी बनी रहेगी। बारिश के कारण दिन के तापमान में कुछ कमी आ सकती है और लंबे समय से बनी उमस के बीच लोगों को अस्थायी राहत मिल सकती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग अपनी शहरी और स्थानीय मौसम सेवाओं के माध्यम से दिल्ली समेत विभिन्न क्षेत्रों के लिए अल्पावधि पूर्वानुमान और चेतावनियां लगातार जारी करता है।
3 सितंबर के आसपास भी राजधानी में बादल छाए रहने और हल्की बारिश या बूंदाबांदी की संभावना बताई गई है। अधिकतम तापमान करीब 33 डिग्री और न्यूनतम तापमान करीब 24 डिग्री के आसपास रह सकता है। हालांकि 5 और 6 सितंबर के आसपास बारिश की गतिविधियों में कमी आने के संकेत हैं। बारिश के साथ हवा चलने पर वातावरण में मौजूद धूल और प्रदूषक कणों के स्तर में भी अस्थायी सुधार हो सकता है। दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग हिस्सों में बारिश की तीव्रता एक जैसी नहीं रहने की संभावना है, इसलिए किसी एक इलाके में तेज बौछार होने के बावजूद दूसरे इलाके में केवल बादल या हल्की फुहार देखने को मिल सकती है।
उत्तर प्रदेश में पूर्व से पश्चिम तक बदल सकता है मौसम
उत्तर प्रदेश में सितंबर की शुरुआत क्षेत्रीय अंतर के साथ हो सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच बारिश की गतिविधियां बने रहने के संकेत हैं, जबकि पूर्वांचल में 1 सितंबर को गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ सकती हैं। पश्चिमी जिलों में बारिश का प्रभाव दिल्ली और आसपास के मैदानी क्षेत्रों की मौसम प्रणाली से भी जुड़ सकता है। ऐसे में कुछ स्थानों पर हल्की बारिश और कुछ इलाकों में अपेक्षाकृत तेज बौछार का अंतर दिखाई दे सकता है। बारिश की इस गतिविधि से खेतों में नमी बढ़ सकती है, लेकिन अत्यधिक बारिश वाले स्थानीय क्षेत्रों में जलभराव की समस्या भी पैदा हो सकती है।
उत्तर प्रदेश के लिए सितंबर का व्यापक परिदृश्य हालांकि पूरी तरह उत्साहजनक नहीं है। महीने के दौरान राज्य के बड़े हिस्से में सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण होगा जहां मानसूनी वर्षा पहले ही अपेक्षा से कम रही है। कृषि क्षेत्र के लिए सितंबर की बारिश इसलिए अहम है क्योंकि मानसून के अंतिम चरण की वर्षा मिट्टी की नमी और खरीफ फसलों की स्थिति पर सीधा असर डालती है। आने वाले दिनों में बारिश की मात्रा के साथ उसका वितरण भी महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि लगातार कम वर्षा और कुछ दिनों में अचानक भारी बौछारों का मिश्रण किसानों के लिए अलग-अलग तरह की परिस्थितियां पैदा कर सकता है।
राजस्थान में बारिश की कमी बनी रहेगी बड़ी चिंता
राजस्थान में मानसून की तस्वीर दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक असमान रहने की आशंका है। पूर्वी राजस्थान में 31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच बारिश के आसार हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थान में 2 से 6 सितंबर के बीच वर्षा की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मरुस्थलीय और शुष्क क्षेत्रों के लिए कुछ दिनों की बारिश भी महत्वपूर्ण होती है, लेकिन केवल शुरुआती सप्ताह की बौछारें पूरे महीने की कमी की भरपाई नहीं कर सकतीं। इसलिए राज्य के लिए बारिश का क्षेत्रीय वितरण और कुल मात्रा दोनों पर नजर रखना जरूरी होगा।
राजस्थान में सामान्य से कम बारिश की स्थिति कृषि, जलस्रोतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती है। मानसून के अंतिम चरण में होने वाली वर्षा खेतों में नमी बनाए रखने के साथ स्थानीय जलस्रोतों को भी सहारा देती है। दूसरी ओर, कम वर्षा वाले पश्चिमी हिस्सों में लंबे शुष्क अंतराल की स्थिति बनी रहती है तो इसका असर फसलों और पशुपालन दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे में सितंबर के शुरुआती दिनों में होने वाली बारिश राहत जरूर दे सकती है, लेकिन पूरे मौसम की कमी का आकलन केवल कुछ दिनों की वर्षा के आधार पर करना उचित नहीं होगा।
पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में गरज-चमक के साथ बौछारें
पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में 31 अगस्त से 2 सितंबर तथा फिर 6 सितंबर के आसपास हल्की से मध्यम बारिश की संभावना बनी हुई है। 1 और 2 सितंबर को कुछ स्थानों पर बिजली चमकने और बादल गरजने के साथ बौछारें पड़ सकती हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की गतिविधियों के उतार-चढ़ाव के कारण एक ही दिन में अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम का मिजाज अलग दिखाई दे सकता है। कहीं बादल छाए रह सकते हैं तो कहीं बारिश की तीव्र बौछारें भी देखने को मिल सकती हैं।
इन राज्यों के लिए सितंबर की शुरुआत की बारिश कई मायनों में महत्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में मिट्टी की नमी, तापमान और फसल की मौजूदा अवस्था पर बारिश का प्रभाव पड़ता है। वहीं शहरी इलाकों में अचानक तेज बारिश होने पर यातायात और जलनिकासी व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। मौसम विभाग की चेतावनियों में गरज-चमक वाले मौसम के दौरान स्थानीय स्तर पर सावधानी बरतना महत्वपूर्ण माना जाता है, विशेषकर खुले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए। मौसम संबंधी आधिकारिक चेतावनियों और स्थानीय पूर्वानुमान पर नजर रखना ऐसे समय में अधिक उपयोगी रहेगा।
उत्तराखंड और हिमालयी राज्यों में भी बारिश के संकेत
उत्तराखंड में सितंबर की शुरुआत में मौसम सक्रिय रहने की संभावना है। 6 सितंबर के आसपास राज्य में हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। पहाड़ी इलाकों में बारिश का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक संवेदनशील होता है, क्योंकि कम समय में तेज वर्षा होने पर नदियों, नालों और ढलानों पर पानी का दबाव तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए सामान्य बारिश और स्थानीय स्तर पर अचानक तेज बौछार के बीच अंतर समझना जरूरी है। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए मौसम विभाग की जिला और क्षेत्र आधारित चेतावनियां विशेष महत्व रखती हैं।
जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में भी 2 और 3 सितंबर के आसपास बारिश के आसार हैं। हालांकि इन क्षेत्रों में बारिश की तीव्रता और भौगोलिक प्रभाव एक समान नहीं रहेगा। पर्वतीय भूभाग में बादल फटने जैसी अत्यधिक स्थानीय घटनाओं की संभावना का आकलन केवल सामान्य वर्षा पूर्वानुमान से नहीं किया जा सकता, इसलिए स्थानीय चेतावनियों को प्राथमिकता देना जरूरी है। सितंबर में मानसून के कमजोर पड़ने के बावजूद हिमालयी क्षेत्र पूरी तरह बारिश से मुक्त नहीं हो जाता और पश्चिमी विक्षोभ तथा स्थानीय मौसम प्रणालियां भी समय-समय पर वर्षा को प्रभावित कर सकती हैं।
मध्य भारत में बारिश का वितरण रहेगा असमान
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत मध्य भारत में सितंबर के दौरान बारिश का वितरण असमान रहने की संभावना है। देश के व्यापक पूर्वानुमान में मध्य भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा का संकेत मिलता है, हालांकि अलग-अलग दिनों में स्थानीय मौसम प्रणालियों के प्रभाव से बारिश की गतिविधि तेज हो सकती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के विस्तृत पूर्वानुमान तंत्र में वर्षा की निगरानी के लिए दैनिक, साप्ताहिक और संचयी आंकड़ों के साथ क्षेत्रवार चेतावनियां उपलब्ध कराई जाती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि महीने का औसत पूर्वानुमान और किसी खास दिन की बारिश का अनुमान अलग-अलग स्तरों पर समझना जरूरी है।
मध्य भारत के लिए सितंबर की बारिश कृषि और जल प्रबंधन दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण होगी। यदि बारिश लंबे अंतराल के बाद थोड़े समय के लिए तेज होती है तो खेतों को तत्काल पानी तो मिल सकता है, लेकिन मिट्टी में उसका ठहराव और जलसंचय क्षेत्र के भूगोल पर निर्भर करेगा। वहीं लंबे समय तक बारिश कमजोर रहने से खरीफ फसलों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए इस क्षेत्र में केवल बारिश होने या न होने से अधिक महत्वपूर्ण उसका समय, मात्रा और भौगोलिक फैलाव रहेगा।
मानसून की विदाई के बीच पूर्वोत्तर को मिल सकती है बेहतर बारिश
देश के अन्य हिस्सों की तुलना में पूर्वोत्तर भारत सितंबर में अपेक्षाकृत बेहतर वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल रह सकता है। मानसूनी प्रणालियों और क्षेत्रीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पूर्वोत्तर में बारिश की गतिविधियां कई बार मानसून के अंतिम चरण तक बनी रहती हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग के मौसमी आकलन में भी पूर्वोत्तर भारत के लिए पूरे मानसून काल में सामान्य वर्षा की संभावना जताई गई थी, जबकि मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा का जोखिम अधिक बताया गया था।
इस क्षेत्र में बारिश का अधिक होना जहां जलस्रोतों और कृषि के लिए लाभकारी हो सकता है, वहीं लगातार या अत्यधिक बारिश होने पर भूस्खलन, बाढ़ और स्थानीय जलभराव जैसी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं। इसलिए सितंबर का मौसम पूरे देश के लिए एक जैसा नहीं होगा। एक तरफ उत्तर भारत के कुछ हिस्से शुरुआती दिनों की बारिश से राहत महसूस कर सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ कई राज्यों में महीने का कुल वर्षा आंकड़ा सामान्य से नीचे रह सकता है। यही क्षेत्रीय असमानता इस बार मानसून के अंतिम चरण की सबसे प्रमुख विशेषता बन सकती है।
पूरे देश के लिए क्या कहता है सितंबर का संकेत
सितंबर को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महीने की शुरुआत में बारिश के कुछ सक्रिय दौर दिखाई दे सकते हैं, लेकिन पूरे महीने का औसत परिदृश्य कमजोर रहने की आशंका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग की मौसमी जानकारी के अनुसार 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सत्र के लिए देशव्यापी वर्षा सामान्य से कम रहने का अनुमान पहले ही जारी किया गया था। मई में जारी अद्यतन दीर्घावधि पूर्वानुमान में जून से सितंबर के दौरान देशभर में मौसमी वर्षा लगभग 90% दीर्घावधि औसत रहने का अनुमान था, जिसमें मॉडल त्रुटि ±4% बताई गई थी।
इसलिए सितंबर की शुरुआत में होने वाली बारिश को मानसून की पूरी तस्वीर में एक अस्थायी सक्रिय चरण के रूप में देखना अधिक उचित होगा। दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में शुरुआती दिनों की बारिश गर्मी और उमस से राहत दे सकती है, जबकि कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की चिंता बनी रहेगी। मौसम का वास्तविक असर स्थानीय स्तर पर वर्षा की तीव्रता और अवधि पर निर्भर करेगा। ऐसे में किसानों, यात्रियों और आम लोगों के लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग की ताजा चेतावनियों और स्थानीय पूर्वानुमानों को प्राथमिकता देना सबसे सुरक्षित और व्यावहारिक रास्ता रहेगा।