केंद्र सरकार पश्चिमी घाट के चुनिंदा क्षेत्रों को पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रही है। गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात में इस संबंध में लगभग सहमति बनने के बाद अधिसूचना जारी करने की तैयारी तेज हो गई है। यह निर्णय केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि देश की प्राकृतिक धरोहर और पारिस्थितिक संतुलन को सुरक्षित रखने की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अधिसूचना लागू होने के बाद इन क्षेत्रों में पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लागू हो जाएंगे, जिससे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र को दीर्घकालिक सुरक्षा मिल सकेगी।
खनन, तापीय संयंत्र और प्रदूषणकारी उद्योगों पर लगेगा प्रतिबंध
पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र घोषित होने का सबसे बड़ा प्रभाव औद्योगिक गतिविधियों पर दिखाई देगा। इन क्षेत्रों में नए खनन कार्यों, पत्थर खदानों, तापीय विद्युत संयंत्रों और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना पर रोक लग जाएगी। इसके साथ ही बड़े औद्योगिक परिसरों के निर्माण और विस्तार को भी सीमित किया जाएगा। सरकार का मानना है कि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने प्राकृतिक तंत्र पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में यह कदम पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।
जैव-विविधता का वैश्विक खजाना है पश्चिमी घाट
पश्चिमी घाट केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं बल्कि विश्व के सबसे महत्वपूर्ण जैव-विविधता क्षेत्रों में से एक है। यहां अनेक दुर्लभ वनस्पतियां, औषधीय पौधे और विलुप्तप्राय जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनका वैश्विक स्तर पर विशेष महत्व है। यही कारण है कि इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है। इस क्षेत्र के घने वन और प्राकृतिक तंत्र दक्षिण भारत के मौसम, वर्षा चक्र और जल संसाधनों को प्रभावित करते हैं। देश की अनेक महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी इसी क्षेत्र से होता है, जिससे इसकी पर्यावरणीय उपयोगिता और बढ़ जाती है।
गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियों की सिफारिशों का लंबा सफर
पश्चिमी घाट संरक्षण का विषय पिछले डेढ़ दशक से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा रहा है। वर्ष 2010 में गठित माधव गाडगिल समिति ने पूरे पश्चिमी घाट क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी। हालांकि राज्यों और उद्योग जगत ने इन सिफारिशों को अत्यधिक कठोर बताया। इसके बाद कस्तूरीरंगन समिति का गठन किया गया, जिसने संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की दृष्टि से अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र को पर्यावरण-संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया। वर्तमान प्रक्रिया इसी समिति की सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें कई दौर के संशोधन और राज्यों के साथ परामर्श शामिल रहे हैं।
राज्यों के बीच सहमति की चुनौती अब भी बरकरार
जहां गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र में सीमांकन को लेकर सहमति बनने की स्थिति दिखाई दे रही है, वहीं केरल और कर्नाटक अब भी कई मुद्दों पर अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं। केरल अपने हिस्से में प्रस्तावित क्षेत्रफल को कम करने की मांग कर रहा है, जबकि कर्नाटक प्रक्रिया और मानकों पर पुनर्विचार की बात कर रहा है। तमिलनाडु में प्रस्तावित क्षेत्र अपेक्षाकृत कम होने के कारण विवाद सीमित है। केंद्र सरकार इन राज्यों के साथ लगातार संवाद कर रही है ताकि व्यापक सहमति के आधार पर अंतिम अधिसूचना जारी की जा सके।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की नई परीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिमी घाट के संरक्षण का प्रश्न केवल वन और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल सुरक्षा, कृषि, जलवायु स्थिरता और करोड़ों लोगों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार संरक्षण के उद्देश्यों को पूरा करते हुए स्थानीय समुदायों और विकास परियोजनाओं की आवश्यकताओं के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करती है। यदि यह पहल प्रभावी ढंग से लागू होती है तो पश्चिमी घाट आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपनी प्राकृतिक समृद्धि और पारिस्थितिक महत्व को सुरक्षित रख सकेगा।