नई दिल्ली - करवा चौथ का त्योहार भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। शाम को चंद्रमा के दर्शन करने और अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि करवा चौथ पर चंद्र देव की ही पूजा क्यों की जाती है, सूर्य देव की क्यों नहीं? इसके पीछे धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

कब मनाया जाएगा करवा चौथ?
हिंदू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह से निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को विधि-विधान से पूजा करती हैं। पूजा में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की आराधना की जाती है। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है और पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत पूरा किया जाता है।

चंद्र देव की पूजा क्यों की जाती है?
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा को मन, भावनाओं, शांति, शीतलता और प्रेम का कारक माना जाता है। चंद्रमा की शीतल रोशनी मानसिक शांति और सौम्यता का प्रतीक मानी जाती है। यही वजह है कि करवा चौथ पर महिलाएं चंद्र देव को अर्घ्य देकर अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और मधुरता बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं।
धार्मिक मान्यता है कि चंद्रमा की पूजा करने से मन में शांति और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। करवा चौथ पर चंद्र दर्शन को व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, इसलिए महिलाएं पूरे दिन उपवास रखने के बाद चंद्रमा के उदय होने की प्रतीक्षा करती हैं।

चंद्रमा को अखंड सौभाग्य का प्रतीक क्यों मानते हैं?
चंद्रमा का घटता-बढ़ता स्वरूप समय के निरंतर चक्र और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में चंद्रमा को दीर्घायु, शांति और जीवन की निरंतरता से भी जोड़ा जाता है। इसी आस्था के चलते करवा चौथ पर महिलाएं चंद्र देव से अपने पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। हालांकि, चंद्रमा को अखंड सौभाग्य का प्रतीक मानना धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का विषय है। अलग-अलग क्षेत्रों में करवा चौथ से जुड़ी परंपराओं और मान्यताओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।

सूर्य देव की जगह चंद्र देव को अर्घ्य देने की परंपरा क्यों?
हिंदू धर्म में सूर्य देव और चंद्र देव, दोनों की पूजा का विशेष महत्व है। सूर्य देव को ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का आधार माना जाता है, जबकि चंद्रमा को शीतलता, मन और भावनाओं से जोड़ा जाता है।
करवा चौथ की पूजा परंपरा में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की विशेष विधि प्रचलित है। रात के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख की प्रार्थना करती हैं। इसीलिए इस पर्व में चंद्र दर्शन को विशेष स्थान मिला है। सूर्य देव की पूजा भी हिंदू धर्म में अनेक व्रतों और त्योहारों का अहम हिस्सा है, लेकिन करवा चौथ की परंपरा विशेष रूप से चंद्रमा से जुड़ी हुई है।
प्रेम, विश्वास और समर्पण का पर्व है करवा चौथ
करवा चौथ केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और समर्पण को व्यक्त करने का अवसर भी है। महिलाएं इस दिन सोलह शृंगार करती हैं, करवा माता की पूजा करती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।
इस तरह चंद्र देव की पूजा करवा चौथ की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह आस्था, वैवाहिक प्रेम और सुखी जीवन की कामना से जुड़ा पर्व है, जिसे देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।