भारतीय कृषि क्षेत्र इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक ओर अल नीनो कमजोर मानसून के संकेत दे रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव ने उर्वरकों की कीमतों में तेज वृद्धि कर दी है। हाल ही में इंडियन पोटाश लिमिटेड द्वारा जारी निविदा के परिणामों ने इस संकट की गंभीरता को उजागर कर दिया है, जिससे स्पष्ट है कि इसका असर सीधे किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी का गणित
फरवरी 2026 में राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स द्वारा जारी निविदा में पश्चिमी तट के लिए यूरिया की कीमत लगभग 508 डॉलर प्रति टन थी, जो अप्रैल में बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन हो गई। यह वृद्धि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधा का परिणाम है। इसके अलावा डि-अमोनियम फॉस्फेट, सल्फर और अमोनिया जैसे कच्चे माल की कीमतों में भी भारी उछाल देखा गया है, जिससे उर्वरक उत्पादन की लागत लगातार बढ़ रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट की जड़ में
इस पूरे संकट के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी आपूर्ति बाधाएं हैं। मध्य पूर्व में संघर्ष और समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर काफी हद तक निर्भर है, ऐसे में आपूर्ति में आई रुकावट ने कीमतों को तेजी से बढ़ा दिया है।
घरेलू उत्पादन और आयात पर दबाव
भारत की उर्वरक जरूरत का एक बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा होता है, लेकिन यह उत्पादन भी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। गैस आपूर्ति में कमी के कारण घरेलू उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे आयात पर निर्भरता और बढ़ गई है। अब भारत को इंडोनेशिया, मलेशिया, मोरक्को और जॉर्डन जैसे देशों से ऊंची कीमतों पर उर्वरक खरीदना पड़ रहा है, जिससे लागत और बढ़ रही है।
खरीफ और रबी सीजन पर मंडराया खतरा
आगामी खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है। वर्तमान भंडार और मांग के बीच का अंतर चिंता बढ़ा रहा है। हालांकि सरकार ने आयात के माध्यम से स्थिति को संभालने की कोशिश की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक प्रभाव आगामी रबी सीजन में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ सकता है, जब मांग और बढ़ेगी।
महंगाई और खाद्य सुरक्षा पर असर की आशंका
उर्वरकों की बढ़ती कीमतें केवल किसानों की लागत को ही नहीं बढ़ाएंगी, बल्कि इसका असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ने की संभावना है। साथ ही उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है, जिससे सरकारी वित्तीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
विकल्प और समाधान की तलाश
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरकों के अधिक कुशल उपयोग और वैकल्पिक तकनीकों को अपनाकर इस संकट के प्रभाव को कम किया जा सकता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ उर्वरकों के उपयोग और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है। यह कदम न केवल लागत को नियंत्रित करेगा, बल्कि कृषि को अधिक टिकाऊ भी बनाएगा।