करीब 6 महीने के सैन्य संघर्ष के बाद भी ईरान को लेकर निर्णायक नतीजा सामने नहीं आने के बीच अमेरिकी प्रशासन ने अब आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में कदम तेज किए हैं। अमेरिका की ओर से शुरू किए गए नए ‘ऑपरेशन इकनॉमिक आउटकास्ट’ का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर वित्तीय और व्यापारिक दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट ने विभिन्न देशों को ईरान के साथ कारोबार सीमित करने की चेतावनी दी है और आने वाले दिनों में नए प्रतिबंध लगाए जाने के संकेत भी दिए हैं। ऐसे में भारत के लिए चुनौती केवल ईरान के साथ सीधे कारोबार तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि बैंकिंग, भुगतान, समुद्री परिवहन और पश्चिम एशिया से जुड़े व्यापक व्यापारिक रास्तों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
बासमती चावल के कारोबार पर सीधा असर
भारत के लिए सबसे अहम चिंताओं में बासमती चावल का निर्यात शामिल है। भारत हर वर्ष लगभग 50-60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात करता है, जिसमें करीब 10 लाख टन ईरान को जाता है। वित्त वर्ष 2026 में ईरान को भारत का कुल निर्यात लगभग 1.3 अरब डॉलर रहा और इसमें करीब 60% हिस्सेदारी बासमती चावल की बताई गई है। हालांकि पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान का असर पहले से दिखाई देने लगा है। कारोबारियों के अनुसार अप्रैल-जून के दौरान ईरान को भारत का बासमती निर्यात करीब 62% घटकर 1,20,847 टन रह गया, जिससे निर्यातकों की चिंता और बढ़ गई है।
भुगतान व्यवस्था बनी सबसे बड़ी चिंता
भारतीय निर्यातकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संभावित द्वितीयक प्रतिबंधों को लेकर है। ईरान के साथ व्यापार में भुगतान और वित्तीय लेनदेन की व्यवस्था पहले से ही जटिल रही है, ऐसे में यदि संयुक्त अरब अमीरात के रास्ते होने वाले भुगतान पर भी अमेरिकी प्रतिबंधों का असर पड़ता है तो भारतीय कारोबारियों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इससे केवल भुगतान में देरी ही नहीं, बल्कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों की अनुपालन लागत भी बढ़ सकती है। हालांकि कुछ निर्यातकों का मानना है कि ईरान भारतीय बासमती के लिए महत्वपूर्ण बाजार है और व्यापार को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था तथा नए आपूर्ति मार्ग तलाशे जा सकते हैं। यही कारण है कि कारोबारी पूरी तरह बाजार छोड़ने के बजाय संभावित जोखिमों को कम करने के रास्ते तलाश रहे हैं।
भारत-ईरान व्यापार में पहले ही भारी गिरावट
भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार पिछले कुछ वर्षों में काफी सिकुड़ चुका है। वित्त वर्ष 2019 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 17 अरब डॉलर का था, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर लगभग 1.6 अरब डॉलर रह गया। इस गिरावट के पीछे भारत द्वारा ईरानी कच्चे तेल की खरीद बंद करना एक प्रमुख कारण रहा है। ऐसे में ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ने का असर ऐसे समय में सामने आ रहा है जब दोनों देशों के बीच व्यापार पहले के मुकाबले काफी सीमित हो चुका है। इसके बावजूद कृषि उत्पाद, बासमती चावल और कुछ अन्य वस्तुओं के कारोबार में ईरान भारतीय निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है।
भारतीय कारोबारियों पर बढ़ा अनुपालन जोखिम
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर केवल ईरान को भेजे जाने वाले माल तक सीमित नहीं हो सकता। ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रो-रसायन कारोबार से जुड़े 4 भारतीय कारोबारों पर अमेरिका पहले ही प्रतिबंध लगा चुका है। ऐसे कदम भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में अनुपालन संबंधी जोखिम बढ़ा सकते हैं। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना पड़ सकता है कि उनके कारोबारी साझेदार, बैंकिंग चैनल, जहाज और भुगतान व्यवस्था किसी प्रतिबंधित इकाई से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े न हों। इससे कारोबार की लागत बढ़ने के साथ लेनदेन पूरा होने में लगने वाला समय भी बढ़ सकता है।
समुद्री रास्तों पर बढ़ रहा दबाव
पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव का असर समुद्री परिवहन पर भी दिखाई दे रहा है। बाब-अल-मंदेब से होकर गुजरने वाले जहाजों की संख्या में भारी कमी आने के कारण कई कंपनियां अफ्रीका के दक्षिणी छोर से होते हुए केप ऑफ गुड होप के लंबे समुद्री मार्ग का इस्तेमाल कर रही हैं। लंबा रास्ता अपनाने से माल पहुंचने में अधिक समय लगता है और ईंधन तथा बीमा लागत भी बढ़ सकती है। भारत जैसे बड़े आयात-निर्यात देश के लिए इसका प्रभाव केवल ईरान के साथ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पश्चिम एशिया और यूरोप से जुड़े व्यापक समुद्री व्यापार पर भी पड़ सकता है।
ऊर्जा क्षेत्र पर भी मंडरा रहा जोखिम
भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व ऊर्जा सुरक्षा के कारण भी बेहद अधिक है। क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव रहने से समुद्री परिवहन, बीमा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं। हालांकि कमजोर वैश्विक मांग और पहले से कम तेल आपूर्ति के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल बहुत बड़ी तेजी की संभावना सीमित मानी जा रही है, लेकिन स्थिति तेजी से बदल सकती है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गंभीर व्यवधान पैदा होने पर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में भारत के आयात बिल, परिवहन लागत और मुद्रास्फीति पर अप्रत्यक्ष असर पड़ने की आशंका रहेगी।
भारत के लिए असली चुनौती प्रतिबंधों का विस्तार
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल ईरान के साथ व्यापार में संभावित गिरावट नहीं है। इससे बड़ी चिंता यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा ईरान से आगे बढ़कर रूस जैसे भारत के अन्य प्रमुख साझेदारों तक फैल सकता है। इसके साथ पश्चिम एशिया में लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव वैश्विक आपूर्ति शृंखला और समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकता है। भारत को ऐसे माहौल में अपने व्यापारिक साझेदारों, भुगतान तंत्र और समुद्री मार्गों में विविधता बनाए रखने की जरूरत होगी। बासमती चावल जैसे निर्यात क्षेत्रों के लिए वैकल्पिक बाजार तलाशना और ऊर्जा क्षेत्र में आपूर्ति के सुरक्षित विकल्प बनाए रखना आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकता है।