छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग में आरक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रमोशन प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन की आशंका को गंभीर मानते हुए फिलहाल पदोन्नति आदेश जारी करने पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। यह मामला केवल कुछ पुलिसकर्मियों के प्रमोशन तक सीमित नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ पुलिस में वरिष्ठता तय करने के नियमों और भविष्य की पदोन्नति प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है। खास बात यह है कि इस मामले में कोरबा जिले के 73 पुलिस आरक्षकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
क्या है पूरा मामला?
छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय ने आरक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की थी। इसके तहत वरिष्ठता सूची के आधार पर प्रमोशन दिए जाने थे। लेकिन कोरबा जिले के कई पुलिस आरक्षकों ने आरोप लगाया कि विभाग प्रमोशन में सेवा नियमों का पालन नहीं कर रहा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन पुलिसकर्मियों ने अपनी इच्छा से दूसरे जिले में ट्रांसफर कराया, उन्हें भी उनकी मूल नियुक्ति की तारीख के आधार पर वरिष्ठ मानते हुए प्रमोशन देने की तैयारी की जा रही है। उनका आरोप है कि इससे वर्षों से उसी जिले में कार्यरत सीधे भर्ती हुए आरक्षकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि पदोन्नति प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की आशंका है। इसके बाद अदालत ने आदेश दिया कि-
विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) अपनी प्रक्रिया जारी रख सकती है।
लेकिन कोर्ट की अगली अनुमति तक किसी भी कर्मचारी का अंतिम प्रमोशन आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
यानी फिलहाल प्रमोशन की पूरी प्रक्रिया कानूनी जांच के दायरे में रहेगी।
विवाद की असली वजह क्या है?
पूरा विवाद छत्तीसगढ़ पुलिस एग्जीक्यूटिव फोर्स कॉन्स्टेबल भर्ती, पदोन्नति एवं सेवा शर्त नियम-2007 के संशोधित प्रावधानों से जुड़ा है। इन नियमों के अनुसार-
यदि कोई पुलिस कर्मचारी स्वेच्छा से दूसरे जिले में ट्रांसफर लेता है, तो नए जिले की वरिष्ठता सूची में उसका नाम सबसे नीचे माना जाएगा। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि विभाग इस नियम को लागू नहीं कर रहा और ट्रांसफर होकर आए कर्मचारियों को पुरानी नियुक्ति तिथि के आधार पर वरिष्ठ मानकर प्रमोशन देने की तैयारी कर रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने क्या दलील दी?
याचिका में कहा गया है कि-
नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है।
सीधे भर्ती होकर वर्षों से सेवा दे रहे कॉन्स्टेबलों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
वरिष्ठता सूची तैयार करने में पारदर्शिता नहीं बरती गई।
प्रमोशन प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से पूरी प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने क्यों माना मामला गंभीर?
अदालत ने माना कि यह मामला केवल प्रमोशन का नहीं बल्कि सेवा नियमों के पालन का है। यदि नियमों के विपरीत वरिष्ठता तय कर दी जाती है तो इससे भविष्य में हजारों पुलिस कर्मचारियों की पदोन्नति प्रभावित हो सकती है। इसी कारण अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए प्रमोशन आदेशों पर रोक लगा दी।
1 जून को जारी होनी थी फाइनल प्रमोशन लिस्ट
पुलिस विभाग की ओर से आरक्षकों की फाइनल फिट लिस्ट 1 जून को जारी की जानी थी। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह सूची कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद ही जारी की जा सकेगी।
याचिकाकर्ता पक्ष के वकील ने क्या कहा?
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता धीरज कुमार वानखेड़े ने कोर्ट में कहा कि-
विभाग सेवा नियमों की अनदेखी कर रहा है।
स्वैच्छिक ट्रांसफर लेने वालों को गलत तरीके से वरिष्ठ माना जा रहा है।
इससे सीधे भर्ती हुए आरक्षकों के प्रमोशन पर असर पड़ रहा है।
पूरी प्रक्रिया मनमानी और नियमों के विपरीत है।
राज्य सरकार को देना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब मांगा है। सरकार को बताना होगा कि-
वरिष्ठता सूची किस आधार पर तैयार की गई।
ट्रांसफर वाले कर्मचारियों को किस नियम के तहत वरीयता दी गई।
सेवा नियमों का पालन क्यों नहीं हुआ।
पुलिस विभाग पर क्या पड़ेगा असर?
यदि कोर्ट अंतिम सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देता है तो-
पूरी वरिष्ठता सूची दोबारा बन सकती है।
प्रमोशन प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ सकती है।
भविष्य की पदोन्नति नीति में भी बदलाव संभव है।
कई कर्मचारियों के प्रमोशन प्रभावित हो सकते हैं।
आगे क्या होगा?
फिलहाल विभागीय प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन किसी भी कर्मचारी को प्रमोशन का अंतिम आदेश नहीं दिया जाएगा। अब सभी की नजर 15 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां राज्य सरकार अपना पक्ष रखेगी और कोर्ट आगे का फैसला सुनाएगा।