पैरों की त्वचा के नीचे छोटी और सतही शिराओं का एक जाल होता है, जो शरीर के निचले हिस्से से रक्त को पैरों की गहराई में मौजूद बड़ी शिराओं तक पहुंचाने का काम करता है। सामान्य स्थिति में रक्त इन शिराओं के रास्ते ऊपर की ओर जाता है और अंततः हृदय तथा फेफड़ों तक पहुंचता है। जब इस रक्त प्रवाह में किसी कारण से रुकावट या असामान्यता पैदा होती है, तो सतही शिराओं पर दबाव बढ़ सकता है। इसका परिणाम त्वचा के ऊपर नीली, उभरी हुई और कभी-कभी जाल जैसी नसों के रूप में दिखाई देता है। ऐसी नसें खासकर पैरों, टखनों, पिंडलियों और जांघों के आसपास अधिक स्पष्ट नजर आ सकती हैं। हर उभरी नस गंभीर बीमारी का संकेत हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन अगर इनमें लगातार बदलाव हो रहा हो या इनके साथ दूसरे लक्षण भी दिखाई दें तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
क्रोनिक वीनस इनसफिशिएंसी भी हो सकती है वजह
पैरों पर उभरी हुई नसों का एक प्रमुख कारण क्रोनिक वीनस इनसफिशिएंसी यानी सीवीआई हो सकता है। पैरों की शिराओं में मौजूद छोटे कपाट रक्त को ऊपर की दिशा में ले जाने और उसे वापस नीचे आने से रोकने में मदद करते हैं। जब ये कपाट कमजोर हो जाते हैं तो रक्त का कुछ हिस्सा ऊपर जाने के बजाय वापस नीचे की ओर लौटने लगता है। यह प्रक्रिया बार-बार होने पर पैरों की शिराओं में रक्त का दबाव बढ़ता जाता है और सतही नसें फैलकर त्वचा के ऊपर अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर पैरों में भारीपन, दर्द, सूजन, खुजली या थकान जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं। चिकित्सकीय भाषा में इस तरह फैली और उभरी नसों को वैरिकोज वेन्स कहा जाता है।
डीप वेन थ्रोंबोसिस को लेकर क्यों सतर्क रहें
कुछ मामलों में पैरों की सतह पर अचानक अधिक नसें उभरने के पीछे गहरी शिराओं में रक्त के थक्के यानी डीप वेन थ्रोंबोसिस, डीवीटी की समस्या भी हो सकती है। इसमें पैर की किसी गहरी शिरा में रक्त का थक्का बनने से सामान्य रक्त प्रवाह प्रभावित हो जाता है। इसके कारण शरीर सतही शिराओं के माध्यम से रक्त को आगे पहुंचाने की कोशिश करता है और ये नसें सामान्य से अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकती हैं। डीवीटी एक ऐसी स्थिति है जिसमें समय पर चिकित्सकीय जांच बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि रक्त का थक्का अपनी जगह से खिसककर फेफड़ों तक पहुंच जाए तो गंभीर जटिलता पैदा कर सकता है। खासतौर पर यदि एक पैर में अचानक सूजन, दर्द, गर्माहट या त्वचा के रंग में बदलाव के साथ नसें उभरती दिखाई दें तो इसे सामान्य मानकर छोड़ना उचित नहीं है।
इलाज में देरी से त्वचा पर भी पड़ सकता है असर
पैरों की नसों में लंबे समय तक रक्त का दबाव बढ़ा रहने पर समस्या केवल नसों तक सीमित नहीं रह सकती। लगातार रक्त जमाव और रक्त प्रवाह में गड़बड़ी के कारण प्रभावित हिस्से की त्वचा में बदलाव आने लग सकते हैं। कुछ लोगों में त्वचा का रंग गहरा पड़ना, खुजली, सूखापन या एक्जिमा जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। स्थिति अधिक गंभीर होने पर पैरों के निचले हिस्से में ऐसे घाव भी बन सकते हैं जिन्हें भरने में काफी समय लग सकता है। इसलिए केवल बाहरी रूप से दिखाई देने वाली नसों को कॉस्मेटिक समस्या मानकर उपचार टालना सही नहीं है। विशेष रूप से जब नसों का आकार लगातार बढ़ रहा हो, दर्द या सूजन हो अथवा त्वचा में बदलाव दिखाई दे रहे हों, तब विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी हो जाता है।
किन संकेतों पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें
यदि पैरों की नसें लंबे समय से दिखाई दे रही हैं लेकिन उनमें कोई बदलाव नहीं है, तब भी उनकी स्थिति पर नजर रखना उपयोगी है। लेकिन अचानक एक पैर में सूजन, तेज दर्द, असामान्य गर्माहट, त्वचा का लाल या नीला पड़ना, चलने में परेशानी अथवा तेजी से नसों का उभरना अधिक गंभीर समस्या की ओर संकेत कर सकता है। ऐसी स्थिति में स्वयं दवा लेने या केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। चिकित्सक आवश्यकता के अनुसार शारीरिक जांच और शिराओं की जांच के लिए डॉप्लर अल्ट्रासाउंड जैसी जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि समस्या सतही नसों की है, शिराओं के कपाट ठीक से काम नहीं कर रहे हैं या कहीं गहरी शिराओं में रुकावट अथवा थक्का तो नहीं है।
हर नीली नस बीमारी नहीं, लेकिन बदलाव को नजरअंदाज न करें
पैरों पर नसों का दिखाई देना कई बार त्वचा के नीचे मौजूद सामान्य शिराओं, उम्र, शरीर की बनावट या लंबे समय तक खड़े रहने जैसी वजहों से भी हो सकता है। इसलिए केवल नीली नस दिखाई देने से किसी गंभीर बीमारी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। चिंता की बात तब अधिक होती है जब नसें पहले की तुलना में तेजी से उभरने लगें या उनके साथ दर्द, सूजन, भारीपन, त्वचा में बदलाव अथवा घाव जैसी समस्या जुड़ जाए। खासकर डीवीटी के संभावित लक्षण अचानक दिखाई देने पर तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है। पैरों की नसों में होने वाले बदलाव को समय रहते पहचानना और सही कारण की जांच कराना आगे होने वाली जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।