नई दिल्ली। हाई ब्लड प्रेशर यानी बीपी की दवा लेने वाले लोगों से जुड़ी एक अहम रिपोर्ट सामने आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर रिसर्च एजेंसी इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड, वोरिकोनाजोल और टैक्रोलिमस को इंसानों में कैंसर पैदा करने वाले एजेंट्स की ग्रुप-1 श्रेणी में रखा है। यह जानकारी IARC के मोनोग्राफ वॉल्यूम 137 में प्रकाशित हुई है।
हालांकि, इस वर्गीकरण का मतलब यह नहीं है कि इन दवाओं का सेवन करने वाले हर व्यक्ति को कैंसर हो जाएगा। IARC का वर्गीकरण यह बताता है कि किसी एजेंट में कैंसर पैदा करने की क्षमता के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं। इससे किसी व्यक्ति के लिए वास्तविक कैंसर जोखिम कितना है, यह तय नहीं होता। विशेषज्ञों ने भी मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद नहीं करने की सलाह दी है।
हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड क्या है और क्यों चर्चा में है
हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड एक डाययूरेटिक यानी 'वॉटर पिल' है, जिसका इस्तेमाल हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यह शरीर से अतिरिक्त नमक और पानी बाहर निकालने में मदद करती है और कई बार इसे दूसरी बीपी की दवाओं के साथ भी दिया जाता है।
IARC की समीक्षा में हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड के लंबे समय तक इस्तेमाल और त्वचा के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा तथा होंठ के कैंसर के बीच पर्याप्त वैज्ञानिक सबूत पाए गए। एजेंसी ने यह भी बताया कि इस दवा के इस्तेमाल और पराबैंगनी यानी UV किरणों के प्रभाव के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आया है।
धूप के संपर्क को लेकर भी सावधानी जरूरी
हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड त्वचा को सूर्य की UV किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती है। लंबे समय तक धूप के संपर्क और दवा के इस्तेमाल को लेकर त्वचा कैंसर के जोखिम पर वैज्ञानिकों ने विशेष ध्यान दिया है। इसलिए लंबे समय से यह दवा लेने वाले लोगों के लिए धूप से बचाव और त्वचा में असामान्य बदलावों पर नजर रखना महत्वपूर्ण हो सकता है।
वोरिकोनाजोल भी IARC की ग्रुप-1 सूची में
वोरिकोनाजोल बीपी की दवा नहीं है। इसका इस्तेमाल गंभीर फंगल संक्रमण के इलाज में किया जाता है, खासकर उन मरीजों में जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। IARC की समीक्षा में वोरिकोनाजोल के इस्तेमाल और त्वचा के स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के बीच पर्याप्त सबूत पाए गए हैं।
टैक्रोलिमस का इस्तेमाल ट्रांसप्लांट मरीजों में
टैक्रोलिमस भी बीपी की दवा नहीं है। यह एक इम्यूनोसप्रेसेंट दवा है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से अंग प्रत्यारोपण के बाद शरीर को नए अंग को अस्वीकार करने से रोकने के लिए किया जाता है।
IARC के अनुसार, टैक्रोलिमस के इस्तेमाल और नॉन-हॉजकिन लिंफोमा तथा पोस्ट-ट्रांसप्लांट लिम्फोप्रोलिफेरेटिव डिसऑर्डर के बीच पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मिले हैं। कुछ अन्य कैंसरों के साथ इसके संबंध को लेकर सीमित प्रमाण भी सामने आए हैं।
ग्रुप-1 का मतलब क्या होता है
IARC की ग्रुप-1 श्रेणी का अर्थ है कि उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर संबंधित एजेंट को इंसानों के लिए कैंसरकारी माना गया है। लेकिन यह वर्गीकरण कैंसर होने की संभावना या व्यक्तिगत जोखिम की मात्रा नहीं बताता।
यानी किसी पदार्थ को ग्रुप-1 में रखना यह नहीं बताता कि उसे लेने वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा। वास्तविक जोखिम दवा की मात्रा, इस्तेमाल की अवधि, व्यक्ति की स्थिति और अन्य जोखिम कारकों पर निर्भर कर सकता है।
क्या बीपी की दवा तुरंत बंद कर दें
इस रिपोर्ट के बाद सबसे जरूरी बात यह है कि मरीज अपनी बीपी की दवा खुद से बंद न करें। हाई ब्लड प्रेशर को अचानक अनियंत्रित छोड़ना भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।
अगर किसी मरीज की दवा में हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड शामिल है और वह रिपोर्ट को लेकर चिंतित है, तो अपने डॉक्टर से बात करके दवा के फायदे और संभावित जोखिम का आकलन कराना बेहतर है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार दवा जारी रखने, खुराक बदलने या किसी दूसरे विकल्प पर विचार कर सकते हैं।
लंबे समय से दवा ले रहे मरीज क्या करें
लंबे समय से हाइड्रोक्लोरोथायाजाइड लेने वाले मरीजों को बिना चिकित्सकीय सलाह के इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए। धूप में लंबे समय तक रहने से बचाव, त्वचा की सुरक्षा और त्वचा पर लंबे समय तक बने रहने वाले असामान्य घाव या बदलाव नजर आने पर डॉक्टर से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।