हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बाढ़, भूस्खलन, हिमनदों के पिघलने और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। नए अध्ययन में कहा गया है कि ग्रीष्म मानसून के दौरान चरम मौसमी घटनाएं अधिक तीव्र और लगातार होती दिखाई दे रही हैं। इसका सीधा असर हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक भौगोलिक संरचना पर पड़ रहा है, जहां ढलान, नदियां, हिमनद और मानव बस्तियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलती जलवायु इस पूरे क्षेत्र के लिए एक वास्तविक और गंभीर चुनौती है, लेकिन आपदाओं की पूरी व्याख्या केवल इसी एक कारण से नहीं की जा सकती।
अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों में डॉ. नित्यानंद हिमालयी शोध एवं अध्ययन संस्थान के भूविज्ञान विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक वाई. पी. सुंद्रियाल, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के डॉ. एस. पी. सती तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक नवीन जुयाल शामिल हैं। अनुसंधानकर्ताओं ने हिंदू कुश हिमालय के विभिन्न हिस्सों में बदलते मौसम और आपदाओं के पैटर्न का विश्लेषण करते हुए हिमालय की बढ़ती संवेदनशीलता को रेखांकित किया है। उनके अनुसार, बढ़ते तापमान और वर्षा के बदलते स्वरूप के साथ-साथ मानवीय हस्तक्षेप भी आपदाओं के प्रभाव को कई गुना बढ़ा रहा है।
शुष्क हिमालयी क्षेत्रों में भी बढ़ीं विनाशकारी घटनाएं
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अपेक्षाकृत शुष्क और पश्चिमी विक्षोभ से प्रभावित उत्तर-पश्चिमी हिमालय में भी 2010 के बाद विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है। यह बदलाव बताता है कि हिमालय के अलग-अलग हिस्सों में मौसमीय व्यवहार तेजी से बदल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमनदों के तेजी से पिघलने, अस्थिर हिमनद झीलों की संख्या बढ़ने और वर्षा के पैटर्न में बदलाव ने कई क्षेत्रों में प्राकृतिक जोखिम को अधिक जटिल बना दिया है।
तापमान बढ़ने के कारण ऊंचाई वाले इलाकों में जहां पहले बर्फबारी होती थी, वहां अब अधिक वर्षा होने की परिस्थितियां बन रही हैं। इससे पर्वतीय ढलानों पर जमा चट्टानें, मिट्टी और मलबा अस्थिर हो सकता है, जिसके कारण भूस्खलन और मलबा बहने की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। हिमालय की भौगोलिक संरचना पहले से ही अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है, इसलिए मौसम में छोटे दिखने वाले बदलाव भी यहां बड़े पैमाने पर असर डाल सकते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से लेने के साथ-साथ स्थानीय भूगोल और मानव गतिविधियों को भी समझने पर जोर दे रहे हैं।
केदारनाथ से दक्षिण ल्होनक तक आपदाओं ने दिखाई नाजुकता
अनुसंधानकर्ताओं ने 2013 की केदारनाथ आपदा, 2014 की ग्या झील आपदा, 2021 की ऋषिगंगा बाढ़ और 2023 में दक्षिण ल्होनक झील के फटने जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को रेखांकित किया है। इसके अलावा 2025 में हिमाचल प्रदेश की ब्यास नदी, उत्तराखंड के धराली और थराली तथा जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में हुई आपदाओं को भी इस व्यापक परिदृश्य के संदर्भ में देखा गया है। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि हिमालयी आपदाओं का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों में भले ही भिन्न हो, लेकिन प्राकृतिक खतरे और स्थानीय संवेदनशीलता का मेल विनाश को बढ़ा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी भी आपदा को समझने के लिए केवल घटना के तात्कालिक कारण पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि प्रभावित क्षेत्र में किस तरह का निर्माण हुआ, वहां आबादी कितनी बढ़ी, नदी और जलधाराओं के प्राकृतिक प्रवाह में कितना हस्तक्षेप किया गया तथा स्थानीय ढलानों और भूगर्भीय परिस्थितियों का कितना अध्ययन किया गया। यदि जोखिम वाले क्षेत्र में तेजी से निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ती हैं, तो एक प्राकृतिक घटना भी बड़े मानवीय संकट का रूप ले सकती है।
छोटी जलधाराएं बन रहीं बड़े विनाश का कारण
अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि कई विनाशकारी बाढ़ मुख्य नदियों से नहीं, बल्कि छोटी हिमनदीय या बरसाती जलधाराओं से उत्पन्न हुईं। आमतौर पर इन छोटी धाराओं को कम खतरनाक माना जाता है, लेकिन अचानक अत्यधिक बारिश या पानी के तेज बहाव की स्थिति में यही धाराएं भारी मात्रा में चट्टानें, बोल्डर और मलबा लेकर नीचे की ओर बढ़ सकती हैं। संकरी हिमालयी घाटियों में इस तरह का मलबा और पानी बेहद तेज गति से आगे बढ़ता है और कुछ ही समय में पुलों, सड़कों, घरों तथा अन्य बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
यही कारण है कि आपदा जोखिम आकलन केवल बड़ी नदियों और प्रमुख जलाशयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। छोटी नदियों, मौसमी नालों और हिमनदीय जलधाराओं की भी वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। कई बार इन क्षेत्रों के आसपास बस्तियां और पर्यटन या व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से विकसित हो जाती हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर संभावित जल प्रवाह और मलबे के रास्ते का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया जाता। वैज्ञानिकों का संकेत है कि भविष्य की आपदा नीति में इन छोटी जलधाराओं को भी उतनी ही गंभीरता से शामिल करना होगा।
खतरा तब बनता है आपदा, जब बढ़ती है संवेदनशीलता
वैज्ञानिकों का मुख्य तर्क है कि केवल प्राकृतिक खतरा अपने आप में हमेशा बड़ी आपदा नहीं बनता। गंभीर संकट तब पैदा होता है, जब खतरा और संवेदनशीलता एक-दूसरे से मिलते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी, सड़क निर्माण, होटल, पर्यटन गतिविधियों और अन्य व्यावसायिक परियोजनाओं के कारण लोग और बुनियादी ढांचा अस्थिर ढलानों तथा नदियों के बाढ़ क्षेत्रों के अधिक करीब पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति में अचानक आने वाली बाढ़ या भूस्खलन का असर कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।
अध्ययन में उत्तराखंड के बाढ़ मैदान क्षेत्रीकरण अधिनियम, 2012 का भी उल्लेख किया गया है, जिसके तहत नदी के मध्य बिंदु से 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक का प्रावधान है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि कानून और नियम होने के बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन जमीन पर एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यदि संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण और अतिक्रमण जारी रहता है, तो केवल आपदा आने के बाद राहत और पुनर्वास पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।
हर आपदा के बाद सिर्फ जलवायु परिवर्तन को दोष देना समाधान नहीं
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और हिमालय पर इसके प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। लेकिन हर बाढ़, भूस्खलन या हिमनदीय घटना के बाद केवल जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराना समस्या की पूरी तस्वीर को नजरअंदाज कर सकता है। ऐसा करने से अनियोजित निर्माण, कमजोर भू-उपयोग नीति, नदी तटों पर बढ़ते अतिक्रमण और जोखिम वाले क्षेत्रों में मानव गतिविधियों जैसे महत्वपूर्ण कारणों पर पर्याप्त ध्यान नहीं जाता।
हिमालय को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिकों ने प्रतिक्रिया आधारित व्यवस्था के बजाय पहले से तैयारी और जोखिम कम करने की नीति पर जोर दिया है। इसके लिए जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान, निर्माण गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण, छोटी और बड़ी जलधाराओं की निगरानी तथा मौजूदा कानूनों का सख्ती से पालन आवश्यक माना गया है। अध्ययन का संदेश साफ है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना जरूरी है, लेकिन हिमालयी आपदाओं का प्रभाव कम करने के लिए प्रकृति के साथ मानवीय व्यवहार और विकास के मौजूदा मॉडल पर भी गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा।