स्वतंत्रता आंदोलन के महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जब गोरखपुर जेल में बंद थे और उन्हें फांसी दिए जाने का समय निकट था, तब उन्होंने अपनी मां को एक भावुक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने अपनी अधूरी इच्छा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे जीवनभर अपनी मां की सेवा करना चाहते थे, लेकिन अब यह संभव नहीं दिखता। उन्होंने अपनी मां से धैर्य रखने की अपील करते हुए कहा कि उनका जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित हो रहा है और यही उनके जीवन का सबसे बड़ा गर्व है। इस पत्र में एक ओर पुत्र का वात्सल्य दिखाई देता है तो दूसरी ओर देशभक्ति की वह ज्वाला भी, जिसने उन्हें हंसते-हंसते बलिदान देने के लिए तैयार कर दिया।
जेल में मां को देखकर रो पड़े थे बिस्मिल
जब फांसी का आदेश सुनाए जाने के बाद उनकी मां गोरखपुर जेल में उनसे मिलने पहुंचीं, तब राम प्रसाद बिस्मिल अपनी मां को देखकर भावुक हो उठे और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले क्रांतिकारियों को कठोर और निडर माना जाता था, लेकिन मां के सामने पुत्र का कोमल हृदय छलक उठा। हालांकि उनकी मां ने उस क्षण जिस दृढ़ता और साहस का परिचय दिया, उसने इतिहास में एक नई मिसाल कायम कर दी। उन्होंने अपने बेटे को कमजोर पड़ने से रोका और उसे उसकी क्रांतिकारी पहचान का स्मरण कराया।
मां के शब्दों ने बना दिया बलिदान को अमर गाथा
बिस्मिल की मां ने उनसे कहा कि उन्हें तो लगता था उनका बेटा बहुत बहादुर है, जिसके नाम से अंग्रेज भी कांपते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उनका पुत्र मृत्यु से डरता है। उन्होंने कठोर लेकिन प्रेरणादायक शब्दों में पूछा कि यदि रोकर ही मरना था तो फिर क्रांतिकारी बनने की आवश्यकता क्या थी। मां के इन शब्दों ने केवल राम प्रसाद बिस्मिल को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी यह संदेश दिया कि सच्चा देशप्रेम व्यक्तिगत भय और मोह से ऊपर होता है। यह संवाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक प्रसंगों में गिना जाता है।
“मैं तुम्हारे चरणों को आंसुओं से धोना चाहता हूं”
अपनी मां के शब्द सुनने के बाद राम प्रसाद बिस्मिल ने स्पष्ट किया कि उन्हें मृत्यु से कोई भय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके आंसू डर के नहीं, बल्कि मां के प्रति सम्मान और प्रेम के प्रतीक हैं। उन्होंने अपनी मां से कहा कि वे केवल उनके चरणों को अपने आंसुओं से धोना चाहते हैं और उन्हें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उनका पुत्र मातृभूमि के लिए बलिदान देने जा रहा है। इस उत्तर ने यह साबित कर दिया कि एक सच्चा क्रांतिकारी मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का सर्वोच्च अवसर मानता है।
फांसी से पहले मां की आखिरी बात ने सबको कर दिया भावुक
फांसी के दिन जब उनकी मां फिर जेल पहुंचीं, तब वे भावुक होकर रोने लगीं। यह देखकर बिस्मिल ने उनसे पूछा कि क्या वे उन्हें बचाने के लिए क्षमा मांगने आई हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि मां कहेंगी तो वे क्षमा याचना भी कर लेंगे, क्योंकि वे अपनी मां की आंखों में आंसू नहीं देख सकते। तब उनकी मां ने जो उत्तर दिया, वह भारतीय इतिहास में अमर हो गया। उन्होंने कहा कि वे अपने बेटे की फांसी पर नहीं रो रहीं, बल्कि इसलिए दुखी हैं कि भविष्य में जब दूसरी मांएं अपने बेटों को देश पर न्यौछावर करेंगी, तब उनके पास फिर से बलिदान देने के लिए अपना पुत्र नहीं होगा। यह वाक्य मातृत्व, राष्ट्रभक्ति और त्याग की उस ऊंचाई को दर्शाता है, जिसकी मिसाल इतिहास में बहुत कम मिलती है।
आज भी प्रेरणा देता है बिस्मिल और उनकी मां का साहस
राम प्रसाद बिस्मिल और उनकी मां का यह प्रसंग केवल एक भावुक कथा नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा का जीवंत उदाहरण है। यह घटना बताती है कि देश की आजादी केवल क्रांतिकारियों के साहस से नहीं, बल्कि उन माताओं के त्याग और संकल्प से भी मिली जिन्होंने अपने पुत्रों को राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। आज भी यह प्रसंग युवाओं को राष्ट्रप्रेम, साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है और भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में गर्व के साथ याद किया जाता है।