कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने आरएनए आधारित उपचार की एक ऐसी संभावित पद्धति पर काम किया है, जिसे शरीर के भीतर मौजूद किसी जैविक ‘बायपास’ की तरह समझा जा सकता है। यह तकनीक उन आनुवंशिक बदलावों से पैदा होने वाली समस्याओं को दूर करने का प्रयास करती है, जिनमें प्रोटीन बनने की प्रक्रिया समय से पहले रुक जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि कोशिकाओं को इस गलत रुकावट के आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके, तो शरीर दोबारा उन जरूरी प्रोटीनों का निर्माण कर सकता है जिनकी कमी बीमारी का कारण बनती है। यह खोज कई आनुवंशिक विकारों के लिए भविष्य में नए उपचार का रास्ता खोल सकती है।
इस शोध में वैज्ञानिकों ने Suppressor transfer RNA यानी sup-tRNA की क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया है। सामान्य तौर पर कोशिका में प्रोटीन निर्माण की प्रक्रिया आनुवंशिक निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ती है, लेकिन कुछ आनुवंशिक बदलाव ऐसे होते हैं जिनसे बीच में ही गलत ‘स्टॉप सिग्नल’ आ जाता है। परिणामस्वरूप प्रोटीन अधूरा रह जाता है और अपना सामान्य काम नहीं कर पाता। वैज्ञानिकों की नई रणनीति का उद्देश्य इसी समय से पहले आने वाले रुकावट संकेत को पार कर प्रोटीन निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।
क्या होता है नॉनसेंस म्यूटेशन
इस तकनीक को समझने के लिए नॉनसेंस म्यूटेशन को समझना जरूरी है। सामान्य रूप से आनुवंशिक कोड में 3 न्यूक्लियोटाइड का एक क्रम किसी विशेष अमीनो एसिड का निर्देश देता है या प्रोटीन निर्माण की शुरुआत और समाप्ति का संकेत देता है। लेकिन जब आनुवंशिक बदलाव किसी सामान्य अमीनो एसिड वाले कोड को समय से पहले आने वाले ‘स्टॉप कोडॉन’ में बदल देता है, तो प्रोटीन का निर्माण निर्धारित समय से पहले रुक जाता है। इसी तरह के बदलाव को नॉनसेंस म्यूटेशन कहा जाता है।
इस तरह की आनुवंशिक गड़बड़ी के कारण बनने वाला प्रोटीन छोटा या अधूरा हो सकता है और कई बार वह शरीर के लिए आवश्यक कार्य करने में सक्षम नहीं रहता। ऐसे बदलाव अलग-अलग विरासत में मिलने वाली बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि sup-tRNA का उद्देश्य कोशिका की प्रोटीन निर्माण प्रणाली को इस समय से पहले आने वाले स्टॉप सिग्नल के आगे पढ़ने में मदद करना है। इसे एक ऐसे जैविक रास्ते के रूप में देखा जा रहा है, जो गलत तरीके से बंद हुई प्रक्रिया को दोबारा आगे बढ़ाने में सहायता कर सकता है।
जीन एडिटिंग से अलग है यह तरीका
शोध की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि यह रणनीति सीधे डीएनए को बदलने पर निर्भर नहीं करती। शोधपत्र के प्रमुख लेखक प्रोफेसर बोवेन ली के अनुसार, tRNA को भविष्य में आनुवंशिक चिकित्सा के एक नए माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। उनका कहना है कि जीन एडिटिंग की तुलना में यह तरीका डीएनए के स्तर पर बदलाव करने के बजाय प्रोटीन निर्माण के स्तर पर काम करता है और कोशिका को समय से पहले आने वाले स्टॉप सिग्नल को पढ़कर आगे बढ़ने में मदद करता है।
इस अंतर का चिकित्सकीय महत्व काफी बड़ा हो सकता है। जीन एडिटिंग में आनुवंशिक सामग्री को सीधे बदलने की कोशिश की जाती है, जबकि आरएनए आधारित रणनीति अपेक्षाकृत अलग स्तर पर हस्तक्षेप करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ऐसी तकनीक उन मरीजों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनकी बीमारी किसी विशेष नॉनसेंस म्यूटेशन के कारण होती है। हालांकि, प्रयोगशाला स्तर की सफलता को सुरक्षित और प्रभावी मानव उपचार में बदलने के लिए अभी कई चरणों से गुजरना होगा।
सिस्टिक फाइब्रोसिस समेत कई बीमारियों पर नजर
वैज्ञानिकों ने इस रणनीति की संभावित उपयोगिता को केवल एक बीमारी तक सीमित नहीं माना है। प्रोफेसर बोवेन ली के अनुसार, सामान्य रणनीति उन कई बीमारियों में लागू की जा सकती है जिनकी वजह नॉनसेंस म्यूटेशन होते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि तकनीक की प्रभावशीलता और सुरक्षा को आगे के अध्ययनों में साबित किया जाता है, तो भविष्य में इसका इस्तेमाल अलग-अलग आनुवंशिक विकारों के उपचार में किया जा सकता है।
सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसे आनुवंशिक विकारों के संदर्भ में भी इस तरह की तकनीक महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि कुछ मामलों में बीमारी का संबंध ऐसे आनुवंशिक बदलावों से होता है जो आवश्यक प्रोटीन के निर्माण को बाधित करते हैं। हालांकि, किसी भी संभावित उपचार को सीधे मरीजों के लिए उपलब्ध कराने से पहले उसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा, सही खुराक और शरीर के भीतर पहुंचाने की क्षमता का विस्तृत परीक्षण आवश्यक होगा। इसलिए वर्तमान खोज को उपचार उपलब्ध होने की घोषणा के बजाय एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति के रूप में देखना अधिक उचित है।
शरीर के भीतर पहुंचाना अब भी बड़ी चुनौती
वैज्ञानिकों के सामने केवल समय से पहले आने वाले स्टॉप सिग्नल को पार कराने की चुनौती नहीं है। sup-tRNA की वास्तविक चिकित्सकीय उपयोगिता के लिए इसे शरीर के सही हिस्से और सही कोशिकाओं तक प्रभावी तरीके से पहुंचाना भी जरूरी होगा। शोधकर्ताओं ने माना है कि मौजूदा समय में इसकी चिकित्सकीय उपयोगिता सीमित होने की एक वजह कम प्रभावशीलता और शरीर के भीतर प्रभावी ढंग से पहुंचाने की कठिनाई है।
यही कारण है कि इस खोज के बाद आगे का शोध बेहद महत्वपूर्ण होगा। वैज्ञानिकों को यह निर्धारित करना होगा कि आरएनए अणुओं को शरीर में कितनी मात्रा में और किस तरीके से पहुंचाया जाए, वे कितने समय तक प्रभावी रहें और क्या वे केवल लक्षित कोशिकाओं पर अपेक्षित असर डालें। इसके साथ ही अनचाहे प्रभावों की संभावना को भी समझना होगा। इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रयोगशाला में दिखाई देने वाली यह क्षमता वास्तविक चिकित्सा में कितनी उपयोगी साबित हो सकती है।
आनुवंशिक चिकित्सा के बदलते दौर में अहम कदम
आरएनए आधारित उपचार पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा विज्ञान के तेजी से विकसित होते क्षेत्रों में शामिल हुआ है। नई खोज इस क्षेत्र को एक और दिशा दे सकती है, क्योंकि यहां लक्ष्य किसी आनुवंशिक त्रुटि को स्थायी रूप से बदलने के बजाय कोशिका को सही प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया जारी रखने में मदद करना है। यदि sup-tRNA आधारित रणनीति को सुरक्षित, प्रभावी और शरीर में पर्याप्त मात्रा में पहुंचाने योग्य बनाया जा सका, तो नॉनसेंस म्यूटेशन से जुड़ी कई बीमारियों के लिए उपचार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
फिलहाल वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि संभावित उपचार की दिशा में एक शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण कदम है। इसके व्यापक चिकित्सकीय इस्तेमाल से पहले और शोध, प्रीक्लिनिकल परीक्षण तथा मानव परीक्षणों की आवश्यकता होगी। फिर भी, कोशिकाओं में गलत ‘स्टॉप सिग्नल’ को पार कर जरूरी प्रोटीन निर्माण बहाल करने का विचार आनुवंशिक चिकित्सा के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यह खोज इस संभावना को मजबूत करती है कि भविष्य में डीएनए को सीधे बदले बिना भी कुछ आनुवंशिक बीमारियों के मूल कारणों पर प्रभाव डाला जा सकता है।