नई दिल्ली. भारत में डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में तेज विस्तार के दौर में प्रवेश कर सकता है। बाजार शोध कंपनी रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के अनुमान के मुताबिक, देश में डेटा सेंटर की स्थापित क्षमता 2030 तक बढ़कर करीब 5-6 गीगावाट हो सकती है। 2025 में यह क्षमता लगभग 1.65 गीगावाट थी, यानी अगले कुछ वर्षों में इसमें करीब 3 गुना तक वृद्धि की संभावना जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह विस्तार केवल डिजिटल सेवाओं की सामान्य मांग का नतीजा नहीं होगा, बल्कि डेटा स्थानीयकरण, बढ़ती इंटरनेट खपत और कृत्रिम मेधा से जुड़ी कंप्यूटिंग जरूरतें भी इसकी रफ्तार बढ़ाएंगी।
रेडसीर की ‘इंडिया डेटा सेंटर्स’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 के दशक में डेटा सेंटर क्षमता में करीब 27-32% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर देखने को मिल सकती है। भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के तेजी से विस्तार के कारण बड़ी मात्रा में डेटा का निर्माण और प्रसंस्करण हो रहा है। बैंकिंग, बीमा, ई-कॉमर्स, मनोरंजन, दूरसंचार और क्लाउड सेवाओं जैसे क्षेत्रों में डिजिटल गतिविधियां बढ़ने के साथ डेटा को सुरक्षित और तेजी से उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय डेटा सेंटरों की जरूरत भी लगातार बढ़ रही है।
डेटा स्थानीयकरण से बढ़ रही मांग
भारत में डेटा सेंटर की मांग बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में डेटा स्थानीयकरण से जुड़े नियम महत्वपूर्ण हैं। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक और बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण के क्षेत्रीय नियमों के तहत कुछ प्रकार के डेटा को देश के भीतर रखने की जरूरत बढ़ी है। इससे कंपनियों के लिए भारत में ही डेटा भंडारण और प्रसंस्करण की क्षमता विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। डेटा को स्थानीय स्तर पर रखने से नियामकीय अनुपालन के साथ डेटा तक पहुंच और उसकी सुरक्षा को लेकर भी कंपनियों को अधिक नियंत्रण मिल सकता है।
इसके अलावा भारत में इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं के उपयोग का दायरा लगातार बढ़ रहा है। करोड़ों उपयोगकर्ता रोजाना वीडियो, सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन खरीदारी और क्लाउड आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, जिससे लगातार बड़ी मात्रा में डेटा तैयार होता है। इस डेटा को संग्रहित करने, संसाधित करने और जरूरत के समय तेजी से उपलब्ध कराने के लिए मजबूत डेटा सेंटर ढांचे की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर को भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
कृत्रिम मेधा से बढ़ेगी कंप्यूटिंग की जरूरत
कृत्रिम मेधा का तेजी से विस्तार डेटा सेंटर उद्योग के लिए एक और बड़ा विकास क्षेत्र बनकर उभरा है। एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने और उन्हें संचालित करने के लिए पारंपरिक डिजिटल सेवाओं की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत पड़ती है। इसके लिए उच्च क्षमता वाले सर्वर, उन्नत चिप, तेज नेटवर्क और लगातार बिजली आपूर्ति वाले डेटा सेंटर जरूरी होते हैं। भारत में एआई आधारित सेवाओं, स्वचालन और डिजिटल कारोबार के बढ़ने के साथ इस तरह की उच्च-क्षमता वाली कंप्यूटिंग सुविधाओं की मांग भी बढ़ने की संभावना है।
एआई के अलावा क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल उद्यमों का विस्तार भी डेटा सेंटर बाजार को गति दे रहा है। कंपनियां अपने तकनीकी बुनियादी ढांचे को पारंपरिक कार्यालय आधारित सर्वर से क्लाउड और बड़े डेटा सेंटरों की ओर स्थानांतरित कर रही हैं। इससे डेटा सेंटर संचालकों के लिए नए निवेश और विस्तार के अवसर पैदा हो रहे हैं। आने वाले समय में एआई, क्लाउड और डेटा-गहन सेवाओं का मेल भारत में डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में शामिल रह सकता है।
प्रति मेगावाट लागत भारत को दे रही बढ़त
रिपोर्ट में भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत को भी अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी बताया गया है। रेडसीर के अनुसार देश में डेटा सेंटर स्थापित करने की लागत करीब 80 लाख डॉलर प्रति मेगावाट है। वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर निवेश में जमीन, बिजली, नेटवर्क, शीतलन व्यवस्था और अन्य बुनियादी ढांचे की लागत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में अपेक्षाकृत कम स्थापना लागत और विशाल डिजिटल बाजार का संयोजन देश को डेटा सेंटर निवेश के लिए आकर्षक गंतव्य बना सकता है।
हालांकि, डेटा सेंटर की वास्तविक क्षमता बढ़ाने के लिए केवल इमारत और सर्वर स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। लगातार बिजली आपूर्ति, उच्च क्षमता वाले विद्युत नेटवर्क, विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी और उन्नत शीतलन व्यवस्था भी जरूरी होगी। एआई आधारित डेटा सेंटरों में ऊर्जा की खपत सामान्य डेटा सेंटरों की तुलना में काफी अधिक हो सकती है। इसलिए आने वाले वर्षों में भारत को डेटा सेंटर विस्तार के साथ ऊर्जा और ग्रिड बुनियादी ढांचे में भी समानांतर निवेश करना होगा।
2030 तक बिजली की मांग भी बढ़ेगी
डेटा सेंटर क्षमता में वृद्धि का सीधा असर बिजली की जरूरत पर पड़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक 5-6 गीगावाट की आईटी लोड क्षमता के लिए डेटा सेंटरों को ग्रिड से करीब 7-9 गीगावाट बिजली लेने की जरूरत हो सकती है। इसका मतलब है कि डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार के साथ बिजली उत्पादन और वितरण व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। मौजूदा करीब 2.7 गीगावाट के स्तर से आगे बढ़ते हुए लगभग 5 गीगावाट अतिरिक्त ग्रिड क्षमता को सुरक्षित, अनुबंधित और चालू करने की जरूरत बताई गई है।
इस बढ़ती ऊर्जा जरूरत के बीच विश्वसनीय और टिकाऊ बिजली आपूर्ति भी महत्वपूर्ण होगी। डेटा सेंटर ऐसे बुनियादी ढांचे हैं जिन्हें लगातार संचालित रखना पड़ता है और बिजली की थोड़ी देर की बाधा भी महंगी हो सकती है। इसलिए भविष्य में डेटा सेंटर निवेश केवल जमीन और तकनीक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बिजली उपलब्धता, ग्रिड कनेक्टिविटी और ऊर्जा दक्षता भी कंपनियों के फैसलों में अहम भूमिका निभाएगी। यही कारण है कि डेटा सेंटर विस्तार को देश की ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचा नीति के साथ जोड़कर देखना जरूरी होगा।
मुंबई और चेन्नई बने हुए हैं प्रमुख केंद्र
भारत में डेटा सेंटर क्षमता का भौगोलिक वितरण भी इस उद्योग की तस्वीर को समझने में महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार देश की मौजूदा स्थापित डेटा सेंटर क्षमता में मुंबई की हिस्सेदारी करीब 50% है। मुंबई की मजबूत दूरसंचार कनेक्टिविटी, बड़े कारोबारी बाजार और समुद्री केबल नेटवर्क से निकटता ने इसे डेटा सेंटर उद्योग का प्रमुख केंद्र बनाने में मदद की है। वहीं चेन्नई भी तेजी से महत्वपूर्ण डेटा सेंटर केंद्र के रूप में उभरा है।
मुंबई और चेन्नई को मिलाकर देश की करीब 66% डेटा सेंटर क्षमता मौजूद है। हालांकि, भविष्य की मांग को देखते हुए उद्योग के दूसरे शहरों और क्षेत्रों में भी विस्तार की संभावना बढ़ सकती है। डेटा सेंटरों को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित करने से नेटवर्क क्षमता बढ़ाने, आपदा जोखिम कम करने और देश के विभिन्न हिस्सों में डिजिटल सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। 2030 तक 5-6 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य भारत के डिजिटल बुनियादी ढांचे के अगले चरण की दिशा में एक बड़ा संकेत माना जा सकता है।