नई दिल्ली. लंबे इंतजार के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 4 जून को केरल में दस्तक दे दी, जिसके साथ ही देश में वर्षा ऋतु का औपचारिक आगमन हो गया। मानसून का आगमन भारतीय कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल संसाधनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि देश की बड़ी आबादी और कृषि क्षेत्र अब भी वर्षा पर काफी हद तक निर्भर हैं। मानसून के आगे बढ़ने के साथ दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर राज्यों और तटीय क्षेत्रों में बारिश की गतिविधियां तेज हुई हैं। हालांकि मानसून के आगमन की खुशी के बीच मौसम विभाग के संशोधित अनुमान ने कई नए सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
मौसम विभाग ने घटाया वर्षा का अनुमान
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने अपने नवीनतम दीर्घकालिक पूर्वानुमान में मानसूनी वर्षा के अनुमान को पहले के मुकाबले कम कर दिया है। वर्ष की शुरुआत में जहां जून से सितंबर के बीच वर्षा को दीर्घकालिक औसत का 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था, वहीं अब इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया है। मौसम विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अनुमान में चार प्रतिशत तक की त्रुटि सीमा संभव है। यह संशोधन भले ही आंकड़ों में छोटा दिखाई देता हो, लेकिन कृषि और जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से इसका महत्व काफी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि मानसून में मामूली कमी भी कई क्षेत्रों की खेती को प्रभावित कर सकती है।
आखिर क्या होता है एलपीए और क्यों महत्वपूर्ण है यह आंकड़ा?
एलपीए अर्थात लॉन्ग पीरियड एवरेज, किसी क्षेत्र में लंबे समय तक दर्ज की गई औसत वर्षा का मानक होता है। भारत में 1971 से 2020 के बीच दर्ज मानसूनी वर्षा के आंकड़ों के आधार पर जून से सितंबर तक की औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर निर्धारित की गई है। जब मौसम विभाग कहता है कि इस वर्ष वर्षा एलपीए के 90 प्रतिशत के बराबर रह सकती है, तो इसका अर्थ है कि देशभर में औसत से कम बारिश होने की संभावना है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य या जिले में वर्षा समान रूप से कम हो। कई क्षेत्रों में सामान्य या अधिक वर्षा भी हो सकती है, जबकि कुछ इलाके सूखे जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं।
किसानों के लिए क्यों अहम है यह पूर्वानुमान?
भारत की लगभग आधी से अधिक कृषि भूमि आज भी सिंचाई के बजाय वर्षा पर निर्भर है। खरीफ फसलों विशेषकर धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों की बुआई मानसून की प्रगति और वर्षा की मात्रा पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो बुआई का क्षेत्र प्रभावित हो सकता है और फसलों की उत्पादकता पर भी असर पड़ सकता है। कम वर्षा की स्थिति में किसानों की लागत बढ़ती है क्योंकि उन्हें अतिरिक्त सिंचाई, डीजल और बिजली पर अधिक खर्च करना पड़ता है। यही कारण है कि मौसम विभाग का प्रत्येक संशोधित पूर्वानुमान किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
जलाशयों और पेयजल व्यवस्था पर भी पड़ सकता है असर
मानसून केवल खेती के लिए ही नहीं बल्कि देश के जल भंडारण तंत्र के लिए भी जीवनरेखा है। बांधों, जलाशयों, नदियों और भूजल स्रोतों का पुनर्भरण मुख्य रूप से मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो कई राज्यों में जल संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण इलाकों में सिंचाई व्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम वर्षा वाले वर्षों में जल संरक्षण और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
क्षेत्रवार वर्षा में दिख सकता है बड़ा अंतर
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा का औसत कम रहने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में समान स्थिति होगी। भारत का मानसून अत्यंत जटिल और विविधतापूर्ण है। कई बार पड़ोसी जिलों में भी वर्षा के पैटर्न में भारी अंतर देखने को मिलता है। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है जबकि दूसरे क्षेत्रों में वर्षा की कमी बनी रह सकती है। यही वजह है कि राज्य सरकारें और कृषि विशेषज्ञ स्थानीय स्तर के पूर्वानुमानों को अधिक महत्व देते हैं और किसानों को क्षेत्रीय मौसम अपडेट पर लगातार नजर रखने की सलाह देते हैं।
कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों पर रहेगी नजर
कमजोर मानसून की आशंका केवल कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। कृषि उत्पादन घटने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे महंगाई पर दबाव बनता है। ग्रामीण आय प्रभावित होने पर उपभोग और मांग में भी कमी आ सकती है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारें मानसून की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि आने वाले महीनों में वर्षा का वितरण संतुलित रहता है तो कम औसत वर्षा के बावजूद फसलों को बड़ा नुकसान नहीं होगा, लेकिन यदि जुलाई और अगस्त में बारिश कमजोर रही तो किसानों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।