Pakistan Bayraktar TB2 Drones: भारत-पाकिस्तान सीमा और नियंत्रण रेखा (LoC) के आसपास ड्रोन गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता बढ़ गई है। खुफिया सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान की ओर तुर्किये में निर्मित Bayraktar TB2 ड्रोन की मौजूदगी देखे जाने की बात कही जा रही है। दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधी तनाव के बीच ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी और सैन्य अभियानों में लगातार बढ़ रहा है। पाकिस्तान की ओर से ड्रोन क्षमता बढ़ाने और तुर्किये के साथ रक्षा सहयोग को देखते हुए भारतीय सुरक्षा एजेंसियां सीमा पर होने वाली गतिविधियों पर विशेष नजर रख रही हैं। हालांकि, किसी भी संभावित ड्रोन गतिविधि को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित सुरक्षा एजेंसियों की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्पष्ट होगी।
सीमा पर ड्रोन निगरानी क्यों बढ़ी चिंता?
सीमा के संवेदनशील इलाकों में ड्रोन का इस्तेमाल सुरक्षा व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ऐसे मानवरहित विमान लंबे समय तक किसी इलाके के ऊपर उड़ान भरकर निगरानी कर सकते हैं और कैमरों तथा अन्य सेंसर के जरिए तस्वीरें और वीडियो जुटा सकते हैं। Bayraktar TB2 की खासियत यह है कि इसे केवल निगरानी के लिए ही इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह एक सशस्त्र ड्रोन भी है, इसलिए इसकी मौजूदगी को लेकर सुरक्षा एजेंसियां केवल सर्विलांस के नजरिए से ही नहीं, बल्कि संभावित सैन्य उपयोग के लिहाज से भी सतर्क रहती हैं। यही वजह है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर ड्रोन की गतिविधियां सामने आने के बाद सुरक्षा तंत्र में इसकी क्षमता, उड़ान क्षेत्र और संभावित उद्देश्य को लेकर लगातार निगरानी की जाती है।
क्या है Bayraktar TB2?
Bayraktar TB2 तुर्किये द्वारा विकसित एक मध्यम ऊंचाई पर लंबे समय तक उड़ान भरने वाला मानवरहित लड़ाकू विमान (UCAV) है। इसे मुख्य रूप से निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक सैन्य कार्रवाई के लिए विकसित किया गया है। इस ड्रोन की लंबी उड़ान क्षमता इसे सीमा निगरानी के लिए उपयोगी बनाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, TB2 करीब 20 से 27 घंटे तक हवा में रह सकता है। इसकी अधिकतम गति लगभग 130 किलोमीटर प्रति घंटा बताई जाती है। यह ड्रोन अपने ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से लंबी दूरी के अभियानों में इस्तेमाल किया जा सकता है और इसमें निगरानी के लिए आधुनिक कैमरा तथा सेंसर लगाए जा सकते हैं।
हथियार ले जाने में भी सक्षम
Bayraktar TB2 को केवल निगरानी प्लेटफॉर्म मानना सही नहीं होगा। यह हथियार ले जाने में भी सक्षम है और सटीक निशाना लगाने वाली प्रणालियों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके पेलोड की क्षमता करीब 150 किलोग्राम बताई जाती है। इसमें लेजर-गाइडेड हथियार भी शामिल किए जा सकते हैं। यही क्षमता इसे सामान्य निगरानी ड्रोन से अलग बनाती है। हालांकि किसी खास सीमा क्षेत्र में इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह संबंधित सैन्य और सुरक्षा एजेंसियों के आकलन पर निर्भर करता है।
दिन-रात निगरानी की क्षमता
TB2 में अलग-अलग परिस्थितियों में निगरानी के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इंफ्रारेड सेंसर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके जरिए दिन और रात दोनों समय इलाके की निगरानी संभव होती है। थर्मल इमेजिंग जैसी तकनीक कम रोशनी या रात के समय भी गतिविधियों की पहचान में मदद कर सकती है। इससे ड्रोन को सीमा के संवेदनशील इलाकों की निगरानी के लिए उपयोगी प्लेटफॉर्म माना जाता है।
पाकिस्तान के कौन से एयरबेस महत्वपूर्ण माने जाते हैं?
पाकिस्तान की ड्रोन और सैन्य गतिविधियों के संदर्भ में मुरीद एयरबेस का उल्लेख महत्वपूर्ण केंद्र के तौर पर किया जाता है। इसके अलावा रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और दक्षिणी पाकिस्तान में रहीम यार खान जैसे सैन्य ठिकाने भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हालांकि किसी विशेष एयरबेस से किसी विशेष ड्रोन मिशन का संचालन होने की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से अलग-अलग मामले में ही की जा सकती है।
भारत ने भी बढ़ाई काउंटर-ड्रोन तैयारी
पाकिस्तान की ओर से ड्रोन क्षमता में बढ़ोतरी के बीच भारत ने भी सीमा पर काउंटर-ड्रोन सिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया है। संवेदनशील इलाकों में ड्रोन की पहचान और निगरानी के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें एंटी-ड्रोन सिस्टम, सेंसर, CCTV और PTZ कैमरों के साथ एकीकृत कमांड एवं कंट्रोल व्यवस्था शामिल है। इस तरह का नेटवर्क संदिग्ध मानवरहित विमानों की गतिविधियों पर नजर रखने और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा बलों को तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करता है।
जम्मू-कश्मीर में भी सामने आ चुकी हैं ड्रोन गतिविधियां
जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में समय-समय पर संदिग्ध ड्रोन देखे जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। अगस्त 2026 में कठुआ के हीरानगर सेक्टर में भी संदिग्ध ड्रोन दिखाई देने के बाद सुरक्षा बलों की ओर से तलाशी अभियान चलाए जाने की जानकारी सामने आई थी। ऐसी घटनाओं के बाद सीमा से लगे क्षेत्रों में सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाता है। ड्रोन के छोटे आकार और हवा में अपेक्षाकृत कम आवाज के कारण इन्हें समय रहते पहचानना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती हो सकता है।
तुर्किये-पाकिस्तान रक्षा सहयोग भी अहम
पाकिस्तान और तुर्किये के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में चर्चा में रहा है। ऐसे में तुर्किये निर्मित ड्रोन की संभावित मौजूदगी को दोनों देशों के सैन्य सहयोग के व्यापक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भारत के लिए चिंता का प्रमुख पहलू यह है कि सीमा क्षेत्र में आधुनिक ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से निगरानी और संभावित सुरक्षा खतरों का स्वरूप बदल सकता है। यही कारण है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियां तकनीकी निगरानी और काउंटर-ड्रोन क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रही हैं।
भारत-पाक सीमा पर क्यों अहम है ड्रोन निगरानी?
सीमा पर ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल पारंपरिक निगरानी के मुकाबले कई मायनों में अलग है। मानवरहित विमान लंबे समय तक हवा में रह सकते हैं और बिना पायलट के संवेदनशील इलाकों की निगरानी कर सकते हैं। इससे सीमा चौकियों, सैन्य गतिविधियों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की जानकारी जुटाने की कोशिश की जा सकती है। इसी वजह से आधुनिक सीमा सुरक्षा में ड्रोन डिटेक्शन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम की भूमिका लगातार बढ़ रही है।