नई दिल्ली. प्रश्नपत्र लीक की बढ़ती घटनाओं और उनसे प्रभावित होने वाली सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस गंभीर मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर जनहित याचिका पर केंद्र तथा सभी राज्यों को नोटिस जारी किया। याचिका में प्रश्नपत्र लीक करने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ उनकी संपत्तियों पर भी कार्रवाई का निर्देश देने का आग्रह किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को निर्धारित की गई है।
सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र की गोपनीयता और निष्पक्षता पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का आधार होती है। प्रश्नपत्र लीक होने पर केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों अभ्यर्थियों की मेहनत, समय और भविष्य से जुड़ी उम्मीदों पर असर पड़ता है। ऐसे मामलों में परीक्षा रद्द होने या दोबारा कराने से विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक और मानसिक दबाव पड़ता है। इसी व्यापक प्रभाव को देखते हुए प्रश्नपत्र लीक को केवल सामान्य आपराधिक गतिविधि के बजाय सार्वजनिक व्यवस्था और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़े गंभीर अपराध के रूप में देखने की मांग लगातार उठती रही है।
दोषियों के साथ परिजनों की संपत्ति पर भी कार्रवाई की मांग
याचिका में प्रश्नपत्र लीक में शामिल अपराधियों के साथ उनके परिजनों की चल और अचल संपत्ति जब्त करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि प्रश्नपत्र लीक के पीछे सक्रिय संगठित नेटवर्क को आर्थिक रूप से कमजोर किए बिना ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल हो सकता है। संपत्ति जब्ती की मांग का उद्देश्य कथित तौर पर उन आर्थिक लाभों को खत्म करना है जो प्रश्नपत्र लीक जैसे अपराधों के जरिए अर्जित किए जाते हैं।
हालांकि किसी व्यक्ति की संपत्ति जब्त करना गंभीर कानूनी परिणाम वाला कदम है और इसके लिए स्पष्ट वैधानिक आधार, स्वामित्व की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया जैसी संवैधानिक सुरक्षा महत्वपूर्ण होती है। खासकर परिवार के ऐसे सदस्यों के मामले में, जिनके खिलाफ स्वयं अपराध में संलिप्तता का कोई आरोप या प्रमाण नहीं है, कार्रवाई का प्रश्न कानूनी रूप से बेहद संवेदनशील हो सकता है। इसलिए इस मांग पर होने वाली सुनवाई में व्यक्तिगत अधिकारों, संपत्ति संबंधी कानून और सार्वजनिक परीक्षा की निष्पक्षता के बीच संतुलन महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
याचिकाकर्ता ने जांच और मुकदमे पर अपनी मांग बदली
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने प्रश्नपत्र लीक मामलों में जांच और मुकदमे को निश्चित समयसीमा के भीतर पूरा कराने से जुड़ी अपनी मांग पर जोर नहीं दिया। इसका कारण यह बताया गया कि संसद में ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित हो चुका है। याचिकाकर्ता के अनुसार नए कानूनी प्रावधानों से प्रश्नपत्र लीक और सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के खिलाफ मौजूदा व्यवस्था को और कठोर बनाया गया है।
इस बदलाव से यह संकेत मिलता है कि अब याचिका का जोर केवल जांच और मुकदमे में तेजी लाने तक सीमित नहीं है। इसमें उन आर्थिक और संरचनात्मक पहलुओं पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जो प्रश्नपत्र लीक के पीछे काम करने वाले कथित नेटवर्क को प्रभावित कर सकते हैं। यदि किसी परीक्षा में संगठित तरीके से प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने, उसे बेचने या उससे आर्थिक लाभ कमाने का तंत्र विकसित हो जाता है तो केवल व्यक्तिगत गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होने की दलील दी जाती रही है। इसी संदर्भ में संपत्ति जब्ती जैसे कठोर उपायों पर न्यायिक विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
सजा को लगातार भुगतने की मांग भी उठी
याचिका में यह भी मांग की गई है कि प्रश्नपत्र लीक जैसे मामलों में दोषी पाए जाने वाले लोगों को मिलने वाली अलग-अलग सजाएं एक साथ चलने के बजाय एक के बाद एक भुगतने का प्रावधान किया जाए। इस मांग का उद्देश्य अपराध की गंभीरता के अनुपात में दंडात्मक प्रभाव को बढ़ाना है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति पर एक से अधिक गंभीर अपराध सिद्ध होते हैं तो सजा की प्रकृति ऐसी होनी चाहिए जिससे उसका निवारक प्रभाव मजबूत हो और भविष्य में ऐसे अपराध करने वालों के बीच कानून का भय कायम रहे।
हालांकि अलग-अलग अपराधों में मिलने वाली सजाओं का एक साथ या क्रमिक रूप से चलना विस्तृत कानूनी सिद्धांतों और न्यायालय के विवेक से जुड़ा विषय है। इसमें अपराधों की प्रकृति, आरोपों की संख्या, लागू कानून और न्यायिक आदेश जैसे कई पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए इस मांग पर अंतिम निर्णय केवल प्रश्नपत्र लीक के सामाजिक प्रभाव को देखकर नहीं, बल्कि आपराधिक न्याय व्यवस्था के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप ही लिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा इसी व्यापक कानूनी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का अध्ययन कराने का विकल्प
याचिका में एक वैकल्पिक मांग भी रखी गई है। इसमें कहा गया है कि यदि प्रश्नपत्र लीक पर कठोर और प्रभावी व्यवस्था तैयार करने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं हैं तो विधि आयोग को अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों का अध्ययन करने का निर्देश दिया जाए। याचिकाकर्ता ने तीन महीने के भीतर इस विषय पर रिपोर्ट तैयार करने का सुझाव भी दिया है। इसका उद्देश्य दूसरे देशों में सार्वजनिक परीक्षाओं की गोपनीयता बनाए रखने, प्रश्नपत्र सुरक्षा सुनिश्चित करने और परीक्षा संबंधी अपराधों पर कार्रवाई के लिए अपनाई जाने वाली व्यवस्थाओं का अध्ययन करना है।
दुनिया के कई देशों में सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा के लिए डिजिटल प्रश्नपत्र प्रणाली, बहुस्तरीय गोपनीयता प्रोटोकॉल, सीमित अभिगम, निगरानी व्यवस्था और परीक्षा सामग्री की सुरक्षित आपूर्ति जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में भी परीक्षा प्रक्रियाओं के बढ़ते डिजिटलीकरण के साथ साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का अध्ययन केवल कठोर सजा तय करने तक सीमित न रहकर प्रश्नपत्र की तैयारी से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने पर केंद्रित हो सकता है।
पेपर लीक से लाखों अभ्यर्थियों पर पड़ता है असर
प्रश्नपत्र लीक का सबसे बड़ा नुकसान उन विद्यार्थियों को होता है जो महीनों या वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। परीक्षा में अनुचित लाभ लेने वाले कुछ लोगों की गतिविधि के कारण पूरी परीक्षा प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है। परीक्षा रद्द होने पर अभ्यर्थियों को दोबारा तैयारी करनी पड़ती है, यात्रा और आवेदन से जुड़े अतिरिक्त खर्च उठाने पड़ते हैं तथा भर्ती या प्रवेश की पूरी प्रक्रिया में देरी होती है। कई युवाओं के लिए यह देरी उनके रोजगार और करियर की योजना पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
इसलिए प्रश्नपत्र सुरक्षा को केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की प्रशासनिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह लाखों अभ्यर्थियों के समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के अधिकार से जुड़ा विषय है। यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र पहले से कुछ लोगों के पास पहुंच जाता है तो पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यही कारण है कि प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ कठोर कानून के साथ-साथ ऐसी तकनीकी और प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें लीक की संभावना को शुरुआत में ही न्यूनतम किया जा सके।
अब 25 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को निर्धारित की है। इस दौरान सरकारों का जवाब यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगा कि प्रश्नपत्र लीक के मामलों से निपटने के लिए वर्तमान कानूनी व्यवस्था कितनी प्रभावी है और संपत्ति जब्ती जैसे अतिरिक्त उपायों की आवश्यकता को किस दृष्टि से देखा जा रहा है। अदालत के सामने यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहेगा कि कठोर कार्रवाई करते समय दोषी और निर्दोष के बीच कानूनी अंतर को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि प्रश्नपत्र लीक की समस्या अब केवल किसी एक परीक्षा या किसी एक राज्य तक सीमित मुद्दे के रूप में नहीं देखी जा रही है। सार्वजनिक परीक्षाओं का विस्तार बढ़ने के साथ उनकी सुरक्षा भी राष्ट्रीय महत्व का विषय बन गई है। सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई आने वाले समय में प्रश्नपत्र लीक के मामलों में दंड, संपत्ति जब्ती, जांच प्रक्रिया और परीक्षा सुरक्षा को लेकर व्यापक कानूनी बहस का आधार बन सकती है। फिलहाल 25 सितंबर की सुनवाई पर सभी की नजर रहेगी, जहां केंद्र और राज्यों के जवाब से आगे की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।