अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उल्लेख ऐसे समय किया है, जब अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता के प्रमाण से जुड़े नियमों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। ट्रंप ने भारत का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां इतने बड़े पैमाने पर चुनाव होने के बावजूद मतदाताओं की पहचान के लिए फोटो पहचान-पत्र जैसी व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का भी संदर्भ दिया और अमेरिकी चुनाव व्यवस्था में अधिक कड़े पहचान संबंधी प्रावधानों की जरूरत पर जोर दिया। उनका यह तर्क प्रस्तावित सेव अमेरिका अधिनियम के समर्थन से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य संघीय चुनावों में मतदाता की पात्रता और नागरिकता के प्रमाण से संबंधित नियमों को अधिक कठोर बनाना है। इस संदर्भ में भारत का उल्लेख केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि दो अलग-अलग लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की तुलना के रूप में भी देखा जा रहा है।
64.64 करोड़ मतदाताओं की भागीदारी का पैमाना
भारत के चुनावी तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसका असाधारण पैमाना है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में 97.98 करोड़ से अधिक मतदाता सूचीबद्ध थे और 64.64 करोड़ मत पड़े। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इनमें 64.21 करोड़ मत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के माध्यम से दर्ज हुए, जबकि लगभग 42.82 लाख मत डाक मतपत्रों से पड़े। कुल मतदान 66.10 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा अपने आप में उस प्रशासनिक चुनौती को सामने रखता है जिसके भीतर देश के दूरदराज इलाकों, पर्वतीय क्षेत्रों, जंगलों, द्वीपों और महानगरों तक मतदान केंद्रों का संचालन किया गया। निर्वाचन आयोग के आंकड़े यह भी बताते हैं कि 2024 में डाले गए मतों की संख्या 2019 के 61.47 करोड़ से बढ़कर 64.64 करोड़ हुई।
इतने बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास में केवल मतदान कराना ही चुनौती नहीं है, बल्कि मतदाता सूची तैयार करने से लेकर पहचान सत्यापन, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मशीनों की सुरक्षा, मतदान कर्मियों की तैनाती, मतों के परिवहन और अंततः मतगणना तक पूरी प्रक्रिया को एक साथ संचालित करना पड़ता है। वर्ष 2024 के आम चुनाव में 10.52 लाख से अधिक मतदान केंद्र बनाए गए और 8,360 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इस दृष्टि से ट्रंप द्वारा भारत का उदाहरण दिया जाना उस विशाल प्रशासनिक क्षमता की ओर भी संकेत करता है जिसके सहारे दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया को संचालित किया जाता है।
पहचान-पत्र से आगे है भारतीय चुनावी व्यवस्था
हालांकि ट्रंप के बयान में मतदाता पहचान-पत्र विशेष रूप से प्रमुख रहा, भारतीय चुनाव व्यवस्था को केवल पहचान-पत्र की व्यवस्था तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। यहां मतदाता की पहचान, मतदाता सूची, मतदान केंद्र, मतदान कर्मियों, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, वीवीपैट, सुरक्षा व्यवस्था और मतगणना तक कई स्तरों पर प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली में मतदाता द्वारा बटन दबाने के बाद वीवीपैट पर उम्मीदवार का क्रमांक, नाम और चुनाव चिह्न वाली पर्ची कुछ सेकंड के लिए दिखाई देती है, जिससे मतदाता अपने मत की पुष्टि कर सकता है। इसके बाद यह पर्ची सुरक्षित डिब्बे में चली जाती है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसका सत्यापन किया जा सकता है।
भारतीय व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन किसी खुले नेटवर्क से जुड़ी सामान्य कंप्यूटिंग प्रणाली की तरह काम नहीं करती। निर्वाचन आयोग के अनुसार वर्तमान एम-3 मॉडल की मशीनें स्वतंत्र और नेटवर्क से अलग इकाइयां हैं। मशीनों की प्रथम स्तर की जांच, उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में प्रक्रिया, मशीनों का दो स्तर पर यादृच्छिकीकरण, मतदान से पहले मॉक पोल और मतदान के बाद सीलबंदी जैसे कई प्रशासनिक सुरक्षा उपाय निर्धारित हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल तकनीकी सुरक्षा नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में विभिन्न राजनीतिक पक्षों की निगरानी और भागीदारी को भी सुनिश्चित करना है।
फिर भारत में चुनाव व्यवस्था पर सवाल क्यों?
यहीं से भारतीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। किसी विदेशी नेता द्वारा भारतीय चुनाव व्यवस्था का उदाहरण दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि भारत में चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाना अनुचित हो जाता है। लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना, उसके निर्णयों पर सवाल और पारदर्शिता की मांग राजनीतिक तथा नागरिक अधिकारों का हिस्सा हैं। किसी चुनावी संस्था की विश्वसनीयता केवल इस आधार पर तय नहीं हो सकती कि विदेश में कोई नेता उसकी प्रशंसा कर रहा है या उसे अपने देश के लिए उदाहरण बता रहा है। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि देश के नागरिकों, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनावी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय दिखाई देती है।
इसीलिए भारत में चुनाव आयोग को लेकर उठने वाले सवालों और ट्रंप की टिप्पणी को एक ही तराजू में रखना उचित नहीं होगा। विपक्षी दलों ने समय-समय पर मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया, चुनावी आचार संहिता, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से संबंधित चिंताएं उठाई हैं। दूसरी ओर निर्वाचन आयोग अपनी प्रक्रियाओं और सुरक्षा उपायों का हवाला देते हुए चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता का बचाव करता रहा है। इसलिए मूल प्रश्न यह नहीं है कि ट्रंप ने भारत की व्यवस्था की सराहना की या भारतीय विपक्ष ने उसकी आलोचना की, बल्कि यह है कि क्या चुनावी संस्थाएं अपने बारे में उठने वाले हर गंभीर प्रश्न का पर्याप्त, तथ्यात्मक और सार्वजनिक उत्तर देने में सक्षम हैं।
पवन खेड़ा के तंज ने बहस को दिया राजनीतिक रंग
ट्रंप की टिप्पणी सामने आने के बाद कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अमेरिका ले जाने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें भी वहां भेजने की बात कही। उनका बयान वस्तुतः ट्रंप के भारत संबंधी उदाहरण पर राजनीतिक कटाक्ष था और इसके पीछे भारतीय विपक्ष की वह पुरानी आपत्ति दिखाई देती है जिसमें चुनाव आयोग और इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। इस टिप्पणी ने बहस को केवल चुनावी तकनीक तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भारत की घरेलू राजनीति और अमेरिका की चुनावी बहस से भी जोड़ दिया।
इस पूरे घटनाक्रम में व्यंग्य और राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन लोकतांत्रिक बहस का स्तर इससे आगे जाना चाहिए। यदि किसी दल को चुनाव आयोग की किसी प्रक्रिया पर आपत्ति है तो उसके लिए आंकड़ों, दस्तावेजों, कानूनी प्रावधानों और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर सवाल उठाना अधिक प्रभावी रास्ता है। इसी तरह यदि निर्वाचन आयोग को अपनी विश्वसनीयता पर उठ रहे प्रश्नों का सामना करना है तो केवल संस्थागत बयान पर्याप्त नहीं होंगे; उसे अपनी प्रक्रियाओं, आंकड़ों और सत्यापन व्यवस्था को जितना संभव हो उतना सार्वजनिक और समझने योग्य बनाना होगा। लोकतंत्र में भरोसा आदेश से नहीं, बल्कि लगातार दिखाई देने वाली पारदर्शिता से मजबूत होता है।
ईवीएम की बहस में तथ्य और धारणा दोनों महत्वपूर्ण
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर भारत में बहस लंबे समय से जारी है। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार वीवीपैट व्यवस्था मतदाता को उसके मत की तत्काल दृश्य पुष्टि उपलब्ध कराती है। आयोग यह भी बताता है कि मशीनों की जांच, यादृच्छिकीकरण, मॉक पोल और मतगणना के दौरान सत्यापन जैसी अनेक प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। आयोग के अनुसार अब तक बड़ी संख्या में चुनी गई वीवीपैट पर्चियों और इलेक्ट्रॉनिक गणना के मिलान में किसी उम्मीदवार के मत को दूसरे उम्मीदवार को स्थानांतरित किए जाने का मामला सामने नहीं आया है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी तकनीकी व्यवस्था की सुरक्षा के बारे में आधिकारिक दावे और जनता के मन में मौजूद धारणा एक ही चीज नहीं होते। लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए दोनों महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी प्रक्रिया पर लगातार संदेह व्यक्त किया जा रहा है, तो उसका समाधान केवल यह कहकर नहीं हो सकता कि व्यवस्था सुरक्षित है। उसके साथ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है, कौन-कौन से स्वतंत्र स्तर पर जांच की जाती है, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को किन चरणों में निरीक्षण का अवसर मिलता है और किसी विवाद की स्थिति में कौन-सी कानूनी प्रक्रिया लागू होती है। यही वह पारदर्शिता है जो तकनीकी विश्वसनीयता को लोकतांत्रिक विश्वास में बदलती है।
ट्रंप की टिप्पणी से भारत के लिए क्या संदेश निकलता है?
ट्रंप द्वारा भारत का उदाहरण देना निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय चुनावी प्रशासन की एक सकारात्मक छवि की ओर संकेत करता है। भारत में 64.64 करोड़ मतों का पड़ना, लगभग 98 करोड़ मतदाताओं की चुनावी सूची और लाखों चुनावकर्मियों के जरिए विशाल चुनावी अभ्यास को पूरा करना अपने आप में असाधारण प्रशासनिक उपलब्धि है। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में भारतीय चुनाव में पड़े मतों की संख्या दुनिया के कई बड़े लोकतांत्रिक समूहों की संयुक्त चुनावी भागीदारी से भी अधिक थी।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा को घरेलू जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। भारत को अपनी चुनाव व्यवस्था पर गर्व होना चाहिए, लेकिन उसी के साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हर नागरिक को यह विश्वास हो कि उसका मत सुरक्षित है, उसकी पहचान सही तरीके से दर्ज है और चुनावी संस्थाएं सभी राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखती हैं। ट्रंप का बयान भारत की चुनाव व्यवस्था के लिए एक सकारात्मक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ जरूर बन सकता है, मगर भारतीय लोकतंत्र की अंतिम कसौटी वाशिंगटन, लंदन या किसी अन्य राजधानी की राय नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता का भरोसा है। यही भरोसा चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है और इसे बनाए रखना किसी भी राजनीतिक दल से कहीं अधिक स्वयं चुनावी संस्था की जिम्मेदारी है।