देश में चिकित्सा व्यवसायियों के पंजीकरण और चिकित्सा अभ्यास की व्यवस्था को अधिक एकरूप बनाने की दिशा में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा है। आयोग ने प्रत्येक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी के लिए केंद्रीय स्तर पर तैयार की जाने वाली एक विशिष्ट पहचान संख्या की व्यवस्था प्रस्तावित की है। इस संख्या के माध्यम से चिकित्सकों को अलग-अलग राज्यों में नए सिरे से पंजीकरण अथवा अलग लाइसेंस प्राप्त करने की आवश्यकता से राहत मिल सकती है। प्रस्ताव का मूल उद्देश्य चिकित्सा व्यवसायियों के पंजीकरण को राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत करना और देशभर में चिकित्सा सेवा प्रदान करने के लिए एक स्पष्ट तथा सुव्यवस्थित ढांचा तैयार करना है।
2026 के मसौदा नियमों में शामिल है नई व्यवस्था
यह प्रस्ताव राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा 11 अगस्त को अधिसूचित मसौदा ‘पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी एवं चिकित्सा अभ्यास लाइसेंस विनियम, 2026’ का हिस्सा है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, किसी व्यक्ति अथवा विदेशी चिकित्सा स्नातक के संबंधित राज्य चिकित्सा रजिस्टर में पंजीकृत होने के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड केंद्रीय स्तर पर उसकी विशिष्ट पहचान संख्या तैयार करेगा। इसके बाद संबंधित चिकित्सा व्यवसायी को राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर में भी दर्ज किया जाएगा और उसे भारत में कहीं भी चिकित्सा अभ्यास करने की पात्रता प्राप्त होगी।
राज्य पंजीकरण से राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर तक सीधा जुड़ाव
मसौदा विनियम में राज्य चिकित्सा रजिस्टर और राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर के बीच प्रत्यक्ष तथा समन्वित व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। किसी चिकित्सक का राज्य स्तर पर पंजीकरण होने के बाद उसे राष्ट्रीय स्तर के रजिस्टर में शामिल करने की प्रक्रिया केंद्रीय रूप से संचालित की जाएगी। इस प्रकार अलग-अलग राज्यों में कार्य करने के लिए बार-बार पंजीकरण कराने की जटिलता कम हो सकती है। राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर में दर्ज होने वाली पहचान संख्या पूरे भारत में चिकित्सा अभ्यास के लिए मान्य होगी, जिससे चिकित्सकों की पेशेवर गतिशीलता और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
पहचान संख्या में राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश का संकेत
प्रस्तावित विशिष्ट पहचान संख्या में संबंधित राज्य अथवा केंद्रशासित प्रदेश का कोड और राज्य चिकित्सा रजिस्टर द्वारा दिया गया पंजीकरण क्रमांक शामिल किया जाएगा। इससे राष्ट्रीय स्तर पर एक समान पहचान व्यवस्था विकसित होने के साथ-साथ चिकित्सक के मूल पंजीकरण की जानकारी भी संरक्षित रहेगी। यह ढांचा पंजीकरण विवरण के सत्यापन को सरल बनाने में सहायक हो सकता है। मरीजों, स्वास्थ्य संस्थानों और नियामक एजेंसियों के लिए भी किसी पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी की स्थिति और पंजीकरण संबंधी विवरण तक अधिक व्यवस्थित पहुंच संभव हो सकेगी।
रजिस्टर में बदलाव होते ही दोनों स्तरों पर होगा अद्यतन
मसौदा नियमों में राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पंजीकरण अभिलेखों के बीच समन्वय पर विशेष जोर दिया गया है। नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड यह सुनिश्चित करेगा कि दोनों रजिस्टर इस प्रकार समन्वित रहें कि किसी एक रजिस्टर में होने वाला परिवर्तन स्वतः दूसरे में भी प्रदर्शित हो जाए। इस व्यवस्था से पंजीकरण की स्थिति, लाइसेंस की सक्रियता अथवा अन्य प्रशासनिक परिवर्तनों के संबंध में अलग-अलग अभिलेखों के बीच अंतर की संभावना कम करने का लक्ष्य रखा गया है। चिकित्सा क्षेत्र में नियामकीय पारदर्शिता और वास्तविक समय के अनुरूप अभिलेख तैयार करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी बनेगा केंद्रीय रिकॉर्ड
प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर को केवल चिकित्सकों के नाम और पंजीकरण संख्या तक सीमित नहीं रखा जाएगा। इसे पंजीकरण से संबंधित विवरण और अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के केंद्रीय भंडार के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है। राज्य चिकित्सा परिषदों, नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड अथवा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा लाइसेंस निलंबित करने, नाम हटाने अथवा पुनर्बहाली से संबंधित आदेशों का विवरण भी इसमें दर्ज किया जा सकेगा। चिकित्सक के लाइसेंस की सक्रिय अथवा निष्क्रिय स्थिति और उसके विरुद्ध हुई किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानकारी भी इस केंद्रीय व्यवस्था का हिस्सा होगी।
राज्यों की चिकित्सा परिषदों पर बढ़ेगी केंद्रीय निगरानी
प्रस्तावित विनियमों के तहत नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड तथा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को राज्य चिकित्सा परिषदों को आवश्यक निर्देश देने, सूचना और अभिलेख मांगने तथा नियमों के अनुपालन की निगरानी करने की शक्तियां भी प्रदान की जा सकती हैं। इसका उद्देश्य देशभर में चिकित्सा व्यवसायियों के नियमन के लिए एकरूपता, पारदर्शिता और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना है। यदि यह प्रस्ताव अंतिम नियमों का रूप लेता है, तो भारत की चिकित्सा पंजीकरण प्रणाली में राज्य आधारित संरचना और केंद्रीय डिजिटल निगरानी के बीच एक नया संतुलन विकसित हो सकता है।
चिकित्सकों और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए क्या बदल सकता है
प्रस्तावित व्यवस्था का सबसे बड़ा संभावित प्रभाव चिकित्सकों की देशव्यापी पेशेवर गतिशीलता पर पड़ सकता है। किसी राज्य में पंजीकरण के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर से जुड़ने वाला चिकित्सक दूसरे राज्य में सेवा देने के लिए अलग पंजीकरण की जटिल प्रक्रिया से बच सकता है। साथ ही केंद्रीय स्तर पर अद्यतन रिकॉर्ड उपलब्ध होने से फर्जी पंजीकरण, निष्क्रिय लाइसेंस अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े मामलों की निगरानी अधिक व्यवस्थित हो सकती है। हालांकि अंतिम स्वरूप, क्रियान्वयन की प्रक्रिया और राज्य चिकित्सा परिषदों के साथ समन्वय से जुड़े प्रावधान मसौदा नियमों पर विचार और अंतिम अधिसूचना के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होंगे।