दिल्ली में यमुना का जलस्तर इस साल मानसून के दौरान असामान्य रूप से कम बना हुआ है। सामान्य तौर पर 4 महीने के मानसून के दौरान ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश बढ़ने के साथ नदी का प्रवाह भी तेज होता है और दिल्ली में इसका जलस्तर ऊपर जाता है। लेकिन इस बार नदी अभी तक अपने अपेक्षाकृत सामान्य चेतावनी स्तर तक भी नहीं पहुंच पाई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार गुरुवार रात 9 बजे पुराने रेलवे पुल पर यमुना का जलस्तर 202.52 मीटर दर्ज किया गया, जबकि यहां चेतावनी स्तर 204.50 मीटर और खतरे का स्तर 205.33 मीटर निर्धारित है।
पुराने रेलवे पुल पर होती है जलस्तर की निगरानी
दिल्ली में यमुना के जलस्तर की निगरानी के लिए पुराने रेलवे पुल को प्रमुख संदर्भ बिंदु माना जाता है। इसे लोहे का पुल भी कहा जाता है और इसी स्थान पर दर्ज जलस्तर के आधार पर नदी के बढ़ने या घटने की स्थिति का आकलन किया जाता है। केंद्रीय जल आयोग के पूर्वानुमान के मुताबिक अगले एक सप्ताह में जलस्तर में किसी बड़ी वृद्धि की संभावना नहीं है। इसका मतलब यह है कि मानसून के मौजूदा दौर में नदी के चेतावनी स्तर तक पहुंचने की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों के लिए चिंता केवल बाढ़ का खतरा कम रहने की नहीं, बल्कि नदी में पर्याप्त प्राकृतिक प्रवाह नहीं आने की भी है।
इस बार मानसून में नहीं मिला पर्याप्त ‘फ्लश’
दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल से जुड़े विशेषज्ञ भीम सिंह रावत के अनुसार, यमुना ने इस मानसून असामान्य रूप से सूखे हालात का सामना किया है। उनका कहना है कि नदी के 204.50 मीटर के चेतावनी स्तर तक पहुंचने का एक भी उदाहरण इस साल सामने नहीं आया है। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अनियमित बारिश ने स्थिति को और प्रभावित किया है। नदी में मानसूनी उफान का एक महत्वपूर्ण काम यह भी होता है कि पर्याप्त मात्रा में पानी प्रदूषकों और गाद को बहाकर नीचे की ओर ले जाए, जिससे नदी को कुछ समय के लिए प्राकृतिक सफाई का अवसर मिलता है।
हथिनीकुंड से पानी के बंटवारे पर भी उठे सवाल
विशेषज्ञों ने यमुना के कम प्रवाह के पीछे ऊपरी हिस्से में पानी के वितरण को भी एक संभावित कारण बताया है। उनके अनुसार हथिनीकुंड बैराज से छोड़े जाने वाले पानी का बड़ा हिस्सा पूर्वी और पश्चिमी यमुना नहरों की ओर मोड़ दिया जाता है, जबकि नदी की मुख्य धारा में अपेक्षाकृत कम पानी पहुंचता है। हालांकि नदी के प्रवाह पर बारिश और जलग्रहण क्षेत्र की परिस्थितियों सहित कई कारकों का असर होता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के दौरान नदी में पर्याप्त प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखना उसकी सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। लगातार कम प्रवाह रहने से नदी की पारिस्थितिकी पर दीर्घकालिक दबाव बढ़ सकता है।
बाढ़ का पानी ही नहीं, नदी का प्राकृतिक उफान भी जरूरी
यमुना के मानसूनी जलस्तर में वृद्धि को अक्सर दिल्ली के लिए बाढ़ के खतरे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक नदी का प्राकृतिक रूप से फूलना केवल आपदा का संकेत नहीं है। मानसून के दौरान बढ़ा हुआ प्रवाह नदी के भीतर जमा प्रदूषकों को नीचे की ओर बहाने में मदद करता है और जलीय जीवन के लिए बेहतर परिस्थितियां पैदा कर सकता है। इसके अलावा बाढ़ क्षेत्र में फैलने वाला पानी जमीन के भीतर मौजूद जलभंडारों के पुनर्भरण में भी भूमिका निभाता है। इसलिए नदी को केवल बाढ़ नियंत्रण के नजरिये से देखने के बजाय उसके प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिक जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी माना जाता है।
भूजल पुनर्भरण पर पड़ सकता है असर
यमुना के बाढ़ क्षेत्र का भूजल दिल्ली की जल व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। मानसून के दौरान नदी और उससे जुड़े बाढ़ क्षेत्र में पर्याप्त पानी पहुंचने से जमीन के भीतर जल का पुनर्भरण होता है। यदि नदी में लंबे समय तक सामान्य से कम प्रवाह बना रहता है, तो इस प्राकृतिक प्रक्रिया की क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी में पानी की मात्रा और उसके प्रवाह की निरंतरता केवल सतही जल का सवाल नहीं है, बल्कि इसका संबंध भूजल, जलीय जीवों और पूरे बाढ़ क्षेत्र की पारिस्थितिकी से है। इसलिए इस साल का कम प्रवाह आने वाले समय में व्यापक पर्यावरणीय प्रभावों का संकेत बन सकता है।
प्रदूषण से जूझती यमुना के लिए चिंता और बढ़ी
दिल्ली की यमुना पहले से ही गंभीर प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में मानसून के दौरान मिलने वाला अतिरिक्त पानी नदी के लिए प्राकृतिक रूप से प्रदूषण को पतला करने और बहाकर आगे ले जाने का अवसर देता है। यदि यह प्रवाह पर्याप्त नहीं रहता, तो नदी की खुद को साफ करने की प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ सकती है। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यमुना का स्वास्थ्य केवल नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली के बाढ़ क्षेत्र, भूजल और जलीय जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है। कम मानसूनी प्रवाह इस पूरी प्राकृतिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
यमुना को सिर्फ बाढ़ के खतरे से देखने की जरूरत नहीं
इस साल यमुना का चेतावनी स्तर से नीचे रहना पहली नजर में दिल्ली के लिए राहत की खबर लग सकता है, क्योंकि ऊंचे जलस्तर के कारण होने वाली बाढ़ का खतरा कम रहता है। लेकिन नदी विशेषज्ञों के लिए तस्वीर इतनी सरल नहीं है। नदी का अत्यधिक बढ़ना नुकसानदेह हो सकता है, वहीं मानसून में उसका पर्याप्त रूप से न बढ़ना भी पारिस्थितिक दृष्टि से समस्या पैदा कर सकता है। यमुना के लिए जरूरी है कि जल प्रबंधन में बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रवाह, भूजल पुनर्भरण और नदी की प्राकृतिक सफाई जैसी जरूरतों को भी महत्व दिया जाए।