Hal Shashti: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला हलषष्ठी पर्व संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से जुड़ा प्रमुख व्रत माना जाता है। कई क्षेत्रों में इसे हलछठ या ललई छठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है और उनका प्रमुख अस्त्र हल एवं मूसल बताया गया है। इसी वजह से उन्हें हलधर भी कहा जाता है और उनके जन्मोत्सव से जुड़े इस पर्व को हलषष्ठी नाम मिला।
बलराम से जुड़ा है हलषष्ठी का धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान बलराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जबकि कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आता है। बलराम का संबंध हल से माना जाता है। इसी कारण हलषष्ठी के दिन हल की पूजा करने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन माताएं संतान की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना से व्रत रखती हैं।
संतान के कष्ट दूर होने की मान्यता
हलषष्ठी व्रत को मुख्य रूप से संतान की मंगलकामना से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से संतान के जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं और इनके पीछे वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं किया जाता।
हल से जुती फसलों का सेवन क्यों नहीं किया जाता?
हलषष्ठी व्रत की सबसे खास परंपराओं में से एक है कि व्रत रखने वाली महिलाएं हल से जुती जमीन में पैदा होने वाली फसलों का सेवन नहीं करती हैं। इसके पीछे धार्मिक रूप से भगवान बलराम और हल से जुड़े संबंध को प्रमुख माना जाता है। इस दिन ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने की परंपरा है, जो हल से जुती भूमि से प्राप्त न हों। इसी वजह से हलषष्ठी के व्रत में सामान्य दिनों से अलग आहार नियम देखने को मिलते हैं।
महुआ और विशेष खाद्य पदार्थों की परंपरा
कई क्षेत्रों में हलषष्ठी के दिन महुआ की दातुन और महुआ खाने की परंपरा भी है। व्रत और पूजा से जुड़ी स्थानीय परंपराओं के अनुसार महिलाएं तिन्नी का चावल, जिसे कुछ जगह पसही या पसई का चावल भी कहा जाता है, महुआ तथा भैंस के दूध-दही का सेवन करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में हलषष्ठी से जुड़ी परंपराओं और व्रत के नियमों में कुछ अंतर भी देखने को मिल सकता है।
सात अनाज से लगाया जाता है भोग
हलछठ के अवसर पर छठी मैया की पूजा करने की भी परंपरा है। कई जगहों पर घर में गोबर से छठी मैया की आकृति बनाई जाती है। पूजा के दौरान उन्हें सात प्रकार के अनाज का भोग लगाने की परंपरा बताई गई है। इसमें जौ, मक्का, धान, गेहूं, चना, मूंग, सेमी और अरहर की दाल शामिल हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार भोग और पूजा सामग्री में क्षेत्र के हिसाब से थोड़ा अंतर हो सकता है।
जन्माष्टमी से भी है पर्व का संबंध
हलषष्ठी के कुछ दिन बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी मनाई जाती है। दिए गए विवरण के अनुसार, 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में घरों और मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। बाल गोपाल यानी लड्डू गोपाल के लिए झूले सजाए जाते हैं और श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव देता है धर्म और कर्म का संदेश
भोपाल के बांके बिहारी मार्कंडेय मंदिर के पंडित रामनारायण आचार्य के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मध्यरात्रि में मनाया जाता है। सनातन परंपरा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को अधर्म पर धर्म की विजय और निष्काम कर्म के संदेश से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि जन्माष्टमी केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि जीवन में कर्तव्य और धर्म के महत्व की याद दिलाने वाला पर्व भी माना जाता है।