देहरादून. पुरानी मसूरी रोड पर स्थित देहरादून का थानी गांव पहली नजर में उत्तराखंड के किसी शांत और खूबसूरत पहाड़ी गांव जैसा ही दिखाई देता है। चारों ओर हरियाली, ठंडी हवा और अपेक्षाकृत शांत गलियां इसकी पहचान हैं, लेकिन शाम ढलते ही यहां का माहौल बदलने लगता है। घरों के भीतर जहां रात के खाने की तैयारियां शुरू होती हैं, वहीं गांव की कई महिलाएं अपने घरेलू काम निपटाकर लाठी हाथ में लेकर गलियों में निकल आती हैं। कुछ महिलाएं शाम की निगरानी संभालती हैं, जबकि कामकाजी महिलाएं देर रात अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर पहरे में शामिल होती हैं।
इन महिलाओं की निगरानी का मकसद किसी सामान्य सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। वे गांव में आने-जाने वाले संदिग्ध लोगों पर नजर रखती हैं और जरूरत पड़ने पर उनसे पूछताछ भी करती हैं। किसी अनजान व्यक्ति को रोककर वे जानना चाहती हैं कि वह कहां जा रहा है, किससे मिलने आया है और गांव में आने की वजह क्या है। महिलाओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी निर्दोष व्यक्ति को परेशान करना नहीं, बल्कि उन लोगों को गांव की गलियों तक पहुंचने से रोकना है जो नशीले पदार्थों की तलाश में इलाके में आते हैं।
एक पोस्टर ने बयां कर दी गांव की चिंता
गांव में प्रमुख स्थान पर लगा एक पोस्टर वहां की वास्तविक चिंता को साफ तौर पर सामने लाता है। पोस्टर पर गांजा और मादक पदार्थों की बिक्री को प्रतिबंधित बताते हुए विक्रेताओं और खरीदारों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। इसी पोस्टर के आसपास अक्सर महिलाओं को निगरानी करते हुए देखा जा सकता है। किसी व्यक्ति की गतिविधियां संदिग्ध लगने पर वे उसे रोककर सवाल करती हैं और जरूरत महसूस होने पर आगे बढ़ने से भी रोकती हैं।
यह पहल किसी सरकारी अभियान का हिस्सा नहीं है, बल्कि गांव की महिलाओं ने खुद मिलकर इसे शुरू किया है। नारी जागृति संगठन के बैनर तले चल रही यह नागरिक निगरानी व्यवस्था करीब 2 महीने पहले शुरू हुई। महिलाओं का कहना है कि जब उन्हें लगा कि नशे से जुड़ी समस्या धीरे-धीरे उनके रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रही है और शिकायतों के बावजूद हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं आ रहा, तब उन्होंने खुद सड़कों पर उतरने का फैसला किया। यह कदम गांव में सामुदायिक भागीदारी का एक अलग उदाहरण बन गया है।
नशे की समस्या ने घर से बाहर निकलना मुश्किल किया
स्थानीय निवासी सुधा बधानी के मुताबिक स्थिति इतनी चिंताजनक हो गई थी कि महिलाओं और बच्चों के लिए सामान्य गतिविधियां भी मुश्किल लगने लगी थीं। उनका कहना है कि लोगों को सड़क पर निकलने, बच्चों को दुकान तक भेजने और सामान्य रूप से टहलने तक में डर महसूस होने लगा था। महिलाओं ने बताया कि थानी के आसपास ऐसे इलाके भी हैं, जहां लंबे समय से नशीले पदार्थों की बिक्री को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। उनके अनुसार, वहां नशा खरीदने के लिए आने वाले कुछ लोग थानी गांव से होकर गुजरते हैं।
स्थानीय निवासियों का दावा है कि कुछ नशे के आदी लोग इस उम्मीद में भी गांव की ओर आते हैं कि उन्हें यहां नशीले पदार्थ मिल सकते हैं। इससे ग्रामीणों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी। महिलाओं का कहना है कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान स्थिति और खराब हुई थी। शुरुआत में उन्होंने पुलिस और प्रशासन से शिकायत की, आवेदन दिए और कार्रवाई की उम्मीद रखी, लेकिन जब उन्हें लगा कि समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो रही है, तो उन्होंने सामूहिक रूप से निगरानी शुरू करने का निर्णय लिया।
व्हाट्सऐप संदेश मिलते ही जुट जाती हैं महिलाए
महिलाओं की यह निगरानी किसी एक तय समय या एक ही समूह तक सीमित नहीं है। गांव की महिलाएं अलग-अलग समूहों में बंटकर सुबह से लेकर देर रात तक नजर रखती हैं। यदि किसी महिला को कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई देता है तो वह तुरंत उनके व्हाट्सऐप समूह में संदेश भेजती है। एक संदेश के बाद दूसरी महिलाएं तेजी से उस स्थान पर पहुंच जाती हैं। इस तरह गांव की सामुदायिक निगरानी व्यवस्था कुछ ही मिनटों में सक्रिय हो जाती है।
इस व्यवस्था की खास बात यह है कि इसमें अलग-अलग उम्र और परिस्थितियों की महिलाएं शामिल हैं। 20 वर्ष की महिलाएं जहां 60 और 70 वर्ष की महिलाओं के साथ खड़ी होकर पहरा देती हैं, वहीं कामकाजी महिलाएं नौकरी से लौटने के बाद अपनी भूमिका निभाती हैं। गृहिणियां सामान्य तौर पर शाम की निगरानी संभालती हैं, जबकि कामकाजी महिलाओं की भागीदारी अक्सर रात के समय बढ़ जाती है। कई बार पहरा आधी रात तक चलता है और कुछ मौकों पर महिलाएं इससे भी अधिक देर तक गांव की गलियों में मौजूद रहती हैं।
घरेलू काम के बीच भी नहीं टूटती जिम्मेदारी
इस अभियान ने महिलाओं के दैनिक जीवन में एक अतिरिक्त जिम्मेदारी जोड़ दी है, लेकिन वे इसे गांव की सुरक्षा से जोड़कर देखती हैं। किसी संदिग्ध व्यक्ति की सूचना मिलते ही एक महिला खाना बनाना बीच में छोड़कर बाहर निकल आती है तो दूसरी अपने बच्चों को घर के भीतर रहने के लिए कहती है। नौकरी करने वाली महिलाएं काम से लौटते ही निगरानी दल में शामिल हो जाती हैं। इस तरह व्यक्तिगत जिम्मेदारियों और सामुदायिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए महिलाएं लगातार अभियान चला रही हैं।
थानी की महिलाओं की यह पहल इस बात का उदाहरण भी है कि नशे जैसी सामाजिक समस्या के खिलाफ स्थानीय समुदाय किस तरह अपनी भूमिका तय कर सकता है। हालांकि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन ग्रामीणों की सामूहिक जागरूकता समस्या की पहचान और सूचना पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। महिलाओं का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी से टकराव करना नहीं, बल्कि अपने बच्चों, परिवारों और गांव के माहौल को नशे के प्रभाव से बचाना है। लाठी लेकर निकलने वाली इन महिलाओं का संदेश साफ है कि वे अपने गांव की शांति और सुरक्षा को लेकर अब चुप बैठने के लिए तैयार नहीं हैं।