कोलकाता: पश्चिम बंगाल में मस्जिदों से अजान के लाउडस्पीकर हटाए जाने के मौखिक पुलिसिया निर्देशों के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) को [कलकत्ता हाईकोर्ट]ने खारिज कर दिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति अतनु बनर्जी की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि आरोप बेहद अस्पष्ट हैं और इसके समर्थन में कोई लिखित सरकारी आदेश या ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया गया है।यह याचिका एडवोकेट मोहम्मद दानिश फारूकी की ओर से दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य पुलिस अधिकारी हाल के हफ्तों में मस्जिद कमेटियों और इमामों के साथ बैठकें कर रहे हैं और उन्हें मौखिक रूप से लाउडस्पीकर हटाने के निर्देश दे रहे हैं।
राज्य सरकार ने आरोपों को बताया निराधार
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता (Advocate General) सुरजीत नाथ मित्रा ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त करते हुए बताया कि राज्य प्रशासन या पुलिस की तरफ से मस्जिदों के प्रतिनिधियों के साथ ऐसी कोई बैठक नहीं की गई है और न ही लाउडस्पीकर हटाने का कोई मौखिक या लिखित निर्देश दिया गया है।राज्य सरकार ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह याचिका पूरी तरह से केवल समाचार पत्रों की रिपोर्टों पर आधारित है और जिन इमामों या मस्जिद कमेटियों के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, उनमें से कोई भी पक्ष खुद कोर्ट के समक्ष नहीं आया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि पुलिस लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के तय डेसिबल नियमों का उल्लंघन साबित किए बिना ही मौखिक आदेश देकर लाउडस्पीकर हटवा रही है। उन्होंने तर्क दिया कि जनहित याचिका कोई दीवानी या आपराधिक मुकदमा नहीं है जहां शुरुआत में ही शत-प्रतिशत प्राथमिक सबूत की जरूरत हो।
अदालत का स्पष्ट रुख
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अदालत केवल मौखिक निर्देशों, समाचारों या आशंकाओं के आधार पर कोई आदेश पारित नहीं कर सकती। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई लिखित आदेश या प्रभावित पक्षों द्वारा सीधा मामला अदालत के समक्ष नहीं लाया जाता, तब तक इस याचिका में कोई कानूनी मेरिट नहीं है।