कोलकाता: कोलकाता हाईकोर्ट ने पिनकॉन स्पिरिट लिमिटेड (PSL) के निदेशक मोनोरंजन रॉय को बड़ी राहत देते हुए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा 2 दिसंबर 2025 को जारी फ्रॉड वर्गीकरण संबंधी कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने कहा कि जिस फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर नोटिस जारी किया गया, वह कंपनी के पूरे वित्तीय रिकॉर्ड के बिना तैयार की गई थी, इसलिए उसे अंतिम और निर्णायक आधार नहीं माना जा सकता।
क्या था पूरा विवाद?
SBI ने 18 नवंबर 2025 को पहली बार नोटिस जारी किया था। यह नोटिस 4 जून 2025 की फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट पर आधारित था। मोनोरंजन रॉय ने 29 नवंबर को जवाब देते हुए बताया कि 2017 में आर्थिक अपराध निदेशालय (DEO) ने कंपनी के सभी दस्तावेज, कार्यालय और उत्पादन इकाइयों को अपने कब्जे में ले लिया था। इसी वजह से कंपनी जरूरी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं करा सकी। इसके बावजूद SBI ने पहला नोटिस वापस लेकर 2 दिसंबर 2025 को लगभग समान आरोपों के साथ नया नोटिस जारी कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
फोरेंसिक ऑडिट पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि फोरेंसिक ऑडिटर को कंपनी की लेखा-पुस्तकें, लेजर, इनवॉइस, समझौते और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज नहीं मिले थे। ऑडिटर ने स्वयं अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि निष्कर्ष केवल सीमित दस्तावेजों पर आधारित हैं और पूरे रिकॉर्ड मिलने के बाद जांच के निष्कर्ष बदल सकते हैं। यही वजह रही कि हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को निर्णायक मानने से इनकार कर दिया।
लिक्विडेशन के बाद रिकॉर्ड किसके पास होते हैं?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी के लिक्विडेशन में जाने के बाद उसके सभी वित्तीय रिकॉर्ड, लेखा दस्तावेज और परिचालन संबंधी अभिलेखों की जिम्मेदारी केवल लिक्विडेटर की होती है। यदि बैंक को फोरेंसिक जांच पूरी करनी थी तो पहले लिक्विडेटर या आर्थिक अपराध निदेशालय से दस्तावेज हासिल करने चाहिए थे।
फोरेंसिक रिपोर्ट में क्या-क्या आरोप लगाए गए थे?
फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कंपनी ने करीब 27.03 करोड़ रुपये ऐसी कंपनियों को भुगतान किए जो कथित तौर पर निष्क्रिय (Strike Off) थीं। रिपोर्ट में एक पूर्व निदेशक को 40 लाख रुपये के भुगतान, व्यापारिक देनदारियों में असामान्य वृद्धि और मुख्य कारोबार से असंबंधित कंपनियों को भुगतान जैसे कई वित्तीय लेनदेन पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि अदालत ने कहा कि ये निष्कर्ष पूरे रिकॉर्ड के बिना तैयार किए गए हैं और इन्हें अंतिम नहीं माना जा सकता।
SBI ने क्या दलील दी?
SBI ने अदालत में कहा कि फोरेंसिक रिपोर्ट याचिकाकर्ता को पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी थी और उन्हें जवाब देने का पूरा अवसर भी दिया गया था। बैंक का यह भी कहना था कि RBI के नियमों के अनुसार अंतिम फैसला लेने से पहले सुनवाई होगी, इसलिए याचिका समय से पहले दायर की गई है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने आगे के लिए क्या कहा?
हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 का कारण बताओ नोटिस रद्द कर दिया, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि SBI चाहे तो कानून के अनुसार दोबारा कार्रवाई शुरू कर सकता है। हालांकि नई कार्रवाई से पहले बैंक को फोरेंसिक ऑडिटर के माध्यम से लिक्विडेटर या आर्थिक अपराध निदेशालय से सभी आवश्यक रिकॉर्ड हासिल कर जांच पूरी करनी होगी। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि ऑडिटर दस्तावेज मांगता है और मोनोरंजन रॉय के पास वे उपलब्ध हैं, तो लिक्विडेटर के सत्यापन के बाद उन्हें उपलब्ध कराया जाएगा।
किन वकीलों ने की पैरवी?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जॉयदीप कर और रुद्रमन भट्टाचार्य समेत कई अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा। SBI की ओर से अनिर्बान प्रमाणिक, अमन अग्रवाल, देबब्रत दास और अरुणाभ सरकार ने दलीलें दीं, जबकि RBI की ओर से पैट्रिक आचार्जी पेश हुए।