कोलकाता: न्यू टाउन के विश्व बांग्ला कन्वेंशन सेंटर में 3 और 4 जुलाई को आयोजित दो दिवसीय 'लेजिस्लेटिव बिजनेस' ओरिएंटेशन प्रोग्राम के पहले ही दिन एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। लोकसभा सचिवालय (PRIDE) और पश्चिम बंगाल विधानसभा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम से बेलियाघाटा के नवनिर्वाचित टीएमसी विधायक कुणाल घोष अचानक वॉकआउट कर गए। कार्यक्रम शुरू होने के कुछ ही देर बाद उनका इस तरह बाहर आना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
हालांकि, खुद कुणाल घोष ने जल्द ही इस पूरे विवाद और अटकलों पर से पर्दा उठा दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कार्यक्रम में शामिल होना उनका कर्तव्य था, लेकिन वहां बैठकर वह किन लोगों के भाषण सुनेंगे और किनके नहीं, यह पूरी तरह से उनका अपना निजी फैसला है।
लोकसभा और विधानसभा अध्यक्ष पर साधा निशाना
प्रशिक्षण शिविर से बाहर आने के बाद कुणाल घोष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथेंद्रनाथ बसु (रथेंद्र बोस) पर तीखा हमला बोला।
लोकसभा अध्यक्ष पर आरोप: कुणाल घोष ने आरोप लगाया, "लोकसभा अध्यक्ष ने एक ऐसे गुट को बढ़ावा दिया और एंटरटेन किया जो तृणमूल कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह टीएमसी को तोड़ने की कोशिश करने वाले सांसदों को बर्खास्त करने के बजाय ढील दे रहे हैं।"
विधानसभा अध्यक्ष पर नाराजगी: उन्होंने राज्य विधानसभा के अध्यक्ष पर भी पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा, "मैं व्यक्तिगत तौर पर उनके पद का सम्मान करता हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह निष्पक्ष होकर काम कर रहे हैं। पिछले दिनों सदन में उन्होंने मुझे अनैतिक रूप से बोलने का मौका नहीं दिया था। जो मुझे बोलने नहीं देते, अब वही हमें लोकतंत्र और संसदीय नियमों की नीति सिखाएंगे, यह मैं बैठकर नहीं सुन सकता।" इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह संस्था भी अब अपनी निष्पक्षता खो चुकी है और एक खास राजनीतिक दल के इशारों पर काम कर रही है।
सोशल मीडिया पर बयां किया अपना रुख
कुणाल घोष ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर फेसबुक (सोशल मीडिया) पर भी एक लंबा पोस्ट साझा किया। उन्होंने लिखा:"मेरा कर्तव्य था आज विधानसभा अध्यक्ष द्वारा आयोजित विधायकों की कार्यशाला में उपस्थित रहना। वंदे मातरम, जन गण मन और दीप प्रज्वलन तक मैं वहां मौजूद था। मैं लोकसभा, विधानसभा के अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री की कुर्सियों का पूरा सम्मान करता हूं। लेकिन यह मेरा फैसला है कि मैं कुछ खास व्यक्तियों के भाषण सुनूं या नहीं। और मैंने तय किया कि मैं नहीं सुनूंगा। इसीलिए मैं विश्व बांग्ला कन्वेंशन सेंटर से बाहर आ गया।"
"मुझे दूसरों से नीति कथाएं सीखने की जरूरत नहीं"
अपने पत्रकारिता और राजनीतिक करियर का हवाला देते हुए कुणाल घोष ने कहा कि उन्हें संसदीय राजनीति की बारीकियां सीखने के लिए वहां बैठने की कोई जरूरत नहीं थी। उन्होंने कहा, "अगर मुझे संसदीय राजनीति के गुर सीखने ही हैं, तो मैं पूर्व स्पीकर विमान बनर्जी और वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय से सीख रहा हूं। मैं 1990 से एक पत्रकार (रिपोर्टर) के रूप में विधानसभा कवर कर रहा हूं और मैंने पूर्व अध्यक्ष हासिम अब्दुल हलीम साहब को लंबे समय तक करीब से काम करते देखा है। इसके बाद मैंने पत्रकार के रूप में संसद भी कवर की और खुद राज्यसभा का सदस्य भी रहा हूं। इसलिए मुझे संसदीय प्रणाली का अच्छा-खासा अंदाजा है। बाकी कुछ सीखने के लिए मुझे आज वहां बैठकर भाषण सुनने की जरूरत महसूस नहीं हुई।"
यह ओरिएंटेशन प्रोग्राम नए विधायकों को विधायी कामकाज सिखाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था, लेकिन पहले ही दिन कुणाल घोष के इस वॉकआउट और उनके द्वारा उठाए गए तीखे सवालों ने देश के दो बड़े संवैधानिक पदों (लोकसभा और विधानसभा स्पीकर) पर एक नया राजनीतिक विवाद छेड़ दिया है।