अलीपुरद्वार: उत्तर बंगाल में इंसानों और हाथियों के बीच का संघर्ष (Human-Elephant Conflict) अब जानलेवा मोड़ ले चुका है। महज दो हफ्ते के भीतर करंट लगने से एक और जंगली हाथी (दंतैल) की दर्दनाक मौत का मामला सामने आया है। वन विभाग के मुताबिक, फसलों को बचाने के लिए खेतों के चारों ओर बिछाए गए बिजली के तारों के फंदे में आने से हाथी ने दम तोड़ दिया।
यह ताजा घटना गुरुवार सुबह बक्सा टाइगर रिजर्व (Buxa Tiger Reserve) के पास लेफ्रागुड़ी वन बस्ती इलाके की है। यहां खेत में एक नर हाथी का शव बरामद किया गया। जांच में सामने आया कि हाथी की सूंड सीधे तौर पर बिजली के चालू तार के संपर्क में आ गई थी। घटना की सूचना मिलते ही बक्सा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र निदेशक कुमार बिमल और उप-क्षेत्र निदेशक देबाशीष शर्मा मौके पर पहुंचे।
पूछताछ के बाद आरोपी गिरफ्तार
वन विभाग के अधिकारियों ने स्थानीय निवासी मिथुन और उसके पड़ोसी पलाश राभा को आमने-सामने बिठाकर कड़ी पूछताछ की। जांच में पता चला कि इस पूरी साजिश के पीछे पलाश राभा का हाथ था, जिसके बाद शाम को उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना पर सख्त रुख अपनाते हुए वन मंत्री मनोज कुमार उरांव ने कहा, "हाथी की हत्या के मामले में शामिल किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।"
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोले राज
इससे पहले, बीती 17 जून को अलीपुरद्वार के मंडलपारा में भी एक हाथी का शव मिला था। शुरुआती तौर पर वन अधिकारियों को लगा था कि मौत आकाशीय बिजली गिरने से हुई है, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आते ही अधिकारियों के होश उड़ गए। रिपोर्ट में साफ हुआ कि हाथी को बेहद सुनियोजित तरीके से करंट देकर मारा गया था। इस घटना की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि लेफ्रागुड़ी में दूसरी वारदात हो गई।
10 साल में 24 हाथियों की मौत, क्या है असली वजह?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में उत्तर बंगाल में करंट लगने से 24 जंगली हाथियों की मौत हो चुकी है। वन कर्मियों के लगातार जागरूकता अभियान और कड़े कानूनों के बावजूद यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
मुआवजा नीति में खामी और किसानों का गुस्सा
नाम न छापने की शर्त पर राज्य के एक सेवानिवृत्त शीर्ष वन अधिकारी ने बताया कि इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं। उन्होंने कहा, *"हाथियों द्वारा फसलों को पहुंचाए गए नुकसान के मुआवजे की कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है। सब कुछ रेंज अधिकारी की मर्जी पर निर्भर करता है। नियम के मुताबिक, नुकसान के 5 दिनों के भीतर जमीन के दस्तावेज और प्रमाण के साथ लिखित शिकायत देनी होती है, जो एक गरीब किसान के लिए बेहद जटिल प्रक्रिया है। वन विभाग भी अपने रिकॉर्ड को साफ रखने के लिए राजकोष से अतिरिक्त मुआवजा देने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। इसी नुकसान और गुस्से की परिणति हाथियों की हत्या के रूप में सामने आती है।"
दक्षिण पोरो बस्ती के एक स्थानीय किसान ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, "पहले मैं 25 बीघा जमीन पर धान की खेती करता था। हाथियों के आतंक से परेशान होकर अब सिर्फ 5 बीघा में खेती करता हूं। फसल घर तक पहुंचती ही नहीं, तो मेहनत क्यों करें? घर चलाने के लिए अपने तीन बेटों को हरियाणा में मजदूरी करने भेजना पड़ा है।"
क्या कहता है कानून?
वन्यजीव प्रेमियों के लिए राहत की बात यह है कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) के तहत ब्याधुओं पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है।
सजा: इस कानून के तहत अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।उत्तर बंगाल का ट्रैक रिकॉर्ड: यहां हाथियों की मौत के 24 मामलों में से 20 में केस दर्ज किया गया। 4 मामलों में सबूतों के अभाव के कारण केस नहीं चल सका। अब तक 13 मामलों में अदालत अंतिम फैसला (सजा) सुना चुकी है, जबकि 5 मामले अभी भी विचाराधीन हैं।
वन मंत्री ने आश्वासन दिया है कि किसानों को फसलों के नुकसान का उचित मुआवजा समय पर मिले, इसके लिए वन विभाग नई नीतियों पर विचार कर रहा है ताकि इस बेजुबान वन्यजीवों की जान बचाई जा सके।