कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति ने सोमवार को एक ऐसा ऐतिहासिक और नाटकीय मोड़ लिया, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव थी। कभी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से दल-विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए ऋतब्रत बनर्जी ने अब 'पावर गेम' में पूरी बाजी पलट दी है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाली 'असली तृणमूल' ने 'कालीघाट टीएमसी' के सेकंड-इन-कमांड और ममता के सबसे भरोसेमंद सेनापति अभिषेक बनर्जी को पार्टी से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया है। इसके साथ ही बंगाल की सियासत का एक बड़ा चक्र पूरा हो गया है, जहां निकालने वाले को ही आज पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ताश के पत्तों की तरह बिखरी ममता की टीएमसी
राज्य में हुए हालिया राजनीतिक बदलाव के बाद से ही ममता बनर्जी के दशकों के संघर्ष की फसल 'टीएमसी' ताश के पत्तों की तरह ढहती जा रही है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अब तक 64 से अधिक विधायकों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है, जिसके चलते विधायी दल पर से ममता का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है। इतना ही नहीं, लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 सांसद एनडीए (NDA) का समर्थन करने के लिए 'एनसीपीआई' (NCPI) नामक एक नए दल में शामिल हो चुके हैं। फिरहाद हाकिम के मेयर पद से इस्तीफे के बाद कोलकाता नगर निगम (छोटा लालबाड़ी) भी ममता के हाथ से निकल चुका है। संकट की शुरुआत में जो नेता ममता के साथ खड़े थे, वे भी अब एक-एक कर ऋतब्रत खेमे में शामिल हो चुके हैं।
अरूप राय बने नए चेयरपर्सन, ममता सिर्फ 'सलाहकार'
न्यूटाउन के पांच सितारा होटल में आयोजित पार्षदों और विधायकों के विशेष अधिवेशन में 'असली' तृणमूल की नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की घोषणा की गई। इस नई कमेटी में हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय को पार्टी का नया चेयरपर्सन (अध्यक्ष) घोषित किया गया है। वहीं, ममता के बेहद करीबी रहे फिरहाद हाकिम, अरूप विश्वास और रथिन घोष को पार्टी का वाइस चेयरमैन (उपाध्यक्ष) बनाया गया है। नवगठित कमेटी में जावेद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मिन और खुद ऋतब्रत बनर्जी को सामान्य सचिव (जनरल सेक्रेटरी) की जिम्मेदारी दी गई है।
इस नई व्यवस्था के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि फिर ममता बनर्जी की स्थिति क्या है? नई कमेटी के अनुसार, ममता बनर्जी के पास अब चेयरपर्सन का पद भी नहीं रहा। बागी गुट अब ममता बनर्जी को पार्टी में सिर्फ एक 'मार्गदर्शक या सलाहकार' (एडवाइजर) के रूप में रखना चाहता है। बैठक में शामिल एक पार्षद ने बेबाकी से कहा, "ममता बनर्जी शायद कभी तकनीकी रूप से अध्यक्ष थीं ही नहीं। आज नई कमेटी बनी है और अरूप राय हमारे नए अध्यक्ष हैं।"
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ क्यों फूटा गुस्सा?
नई कमेटी का गठन होते ही बकायदा प्रस्ताव पेश कर अभिषेक बनर्जी को सस्पेंड करने का फैसला लिया गया। राजनीतिक गलियारों में अभिषेक बनर्जी को टीएमसी के सर्वेसर्वा और भविष्य के नेता के तौर पर देखा जाता था। भले ही कागजों पर ममता बनर्जी सर्वोच्च पद पर थीं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से पार्टी की पूरी कमान व्यावहारिक रूप से अभिषेक के हाथों में आ गई थी।
सूत्रों के मुताबिक, इसी 'युवराज संस्कृति' के कारण पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में भारी असंतोष था। जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने वाले वरिष्ठ नेताओं को अभिषेक बनर्जी से मिलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था, जिससे वरिष्ठ नेता खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे। सत्ता परिवर्तन होते ही यह दबा हुआ गुस्सा एक बड़ी बगावत के रूप में सामने आ गया और अंततः अभिषेक बनर्जी को पार्टी से सस्पेंड कर ऋतब्रत गुट ने ममता बनर्जी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है।