शिवकाशी: भारत में दिवाली का त्योहार पटाखों के बिना अधूरा माना जाता है। हर साल दिवाली के मौके पर देशभर में करोड़ों रुपये के पटाखों की बिक्री होती है। तमिलनाडु का शिवकाशी शहर इस कारोबार का सबसे बड़ा केंद्र है, जहां देश के कुल पटाखा उत्पादन का करीब 85 से 90 फीसदी हिस्सा तैयार होता है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पटाखों की मौजूदगी बेहद सीमित है। दूसरी ओर, चीन दुनिया के पटाखा कारोबार पर अपना दबदबा बनाए हुए है और हर साल अरबों डॉलर के पटाखों का निर्यात करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस उद्योग का भारत में इतना बड़ा घरेलू बाजार है, वह वैश्विक बाजार में अपनी पहचान क्यों नहीं बना पा रहा है? आखिर कौन-सी चुनौतियां भारतीय पटाखा उद्योग की राह में बाधा बन रही हैं?
भारत की पटाखा राजधानी है तमिलनाडु का शिवकाशी
तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से में स्थित शिवकाशी को भारत की 'पटाखा नगरी' के नाम से जाना जाता है। यह शहर देश के आतिशबाजी उद्योग की रीढ़ माना जाता है। यहां पटाखों के निर्माण के साथ-साथ माचिस और प्रिंटिंग का कारोबार भी बड़े पैमाने पर होता है। इसी वजह से शिवकाशी को भारत का 'छोटा जापान' भी कहा जाता है।ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, 15वीं शताब्दी में पांड्य राजा हरिकेसरी परक्किरमा पांडियन ने इस शहर को बसाया था। कहा जाता है कि काशी से शिवलिंग लाने के बाद इसका नाम शिवकाशी रखा गया, जिसका अर्थ है 'शिव की काशी'। समय के साथ यह शहर औद्योगिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन गया और खासतौर पर पटाखा निर्माण के लिए देशभर में प्रसिद्ध हो गया। आज भारत में बनने वाले कुल पटाखों का लगभग 85 से 90 फीसदी उत्पादन इसी शहर और इसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। यहां हजारों छोटे-बड़े कारखाने इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। पटाखा कारोबार न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है, बल्कि बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का भी प्रमुख साधन है।
7,000 करोड़ रुपये का है भारत का घरेलू पटाखा बाजार
भारत में पटाखों की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका घरेलू बाजार करीब 7,000 करोड़ रुपये का बताया जाता है। तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TANFAMA) के अनुसार, पटाखा कारखानों में होने वाले उत्पादन का मूल्य लगभग 2,000 करोड़ रुपये है। वहीं, थोक कारोबार, माल ढुलाई और खुदरा बिक्री के जरिए करीब 5,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त कारोबार होता है। इस उद्योग की सबसे बड़ी ताकत भारत का विशाल घरेलू बाजार है। देश में बनने वाले 99 फीसदी से अधिक पटाखों की खपत भारत में ही हो जाती है। खास बात यह है कि कुल घरेलू कारोबार का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा यानी करीब 4,000 करोड़ रुपये की बिक्री दिवाली से पहले के लगभग 30 दिनों में होती है। हालांकि, पटाखों की मांग केवल दिवाली तक सीमित नहीं रहती। केरल में विशु, महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी और देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले अन्य त्योहारों के दौरान भी आतिशबाजी की मांग बनी रहती है। इस तरह स्थानीय बाजार ही भारतीय निर्माताओं के उत्पादन का बड़ा हिस्सा खपा देता है।
दुनिया के पटाखा बाजार में चीन का एकतरफा राज
भारतीय पटाखा उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा है। जहां भारत का घरेलू बाजार हजारों करोड़ रुपये का है, वहीं वैश्विक निर्यात में उसकी हिस्सेदारी बेहद कम है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय पटाखा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज 0.042 फीसदी के आसपास है। वहीं, चीन हर साल करीब 1.1 अरब से 1.23 अरब डॉलर मूल्य के पटाखों का निर्यात करता है। चीन ने अपनी मजबूत उत्पादन व्यवस्था, आधुनिक तकनीक और व्यापक वितरण नेटवर्क के दम पर वैश्विक बाजार में मजबूत पकड़ बना ली है। अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे बड़े बाजारों में भी चीनी पटाखों की अच्छी पहुंच है। चीन की इस सफलता के पीछे केवल बड़े पैमाने पर उत्पादन ही नहीं, बल्कि सरकारी सहयोग, कच्चे माल की उपलब्धता, अपेक्षाकृत कम उत्पादन लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बेहतर व्यवस्था भी अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि चीन भारतीय निर्माताओं के मुकाबले वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना हुआ है।
चीन का लियुयांग है दुनिया की पटाखा राजधानी
जिस तरह भारत में शिवकाशी को पटाखों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, उसी तरह चीन का हुनान प्रांत स्थित लियुयांग शहर दुनिया की पटाखा राजधानी के रूप में मशहूर है। लियुयांग में बड़े पैमाने पर आतिशबाजी का उत्पादन होता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, चीन की घरेलू पटाखा आपूर्ति में इस शहर की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी है, जबकि वैश्विक निर्यात में भी इसका योगदान लगभग 70 फीसदी बताया जाता है। इस शहर में पटाखा निर्माण का मजबूत औद्योगिक ढांचा विकसित किया गया है। यहां कच्चे माल की उपलब्धता, विशेष औद्योगिक क्लस्टर, कुशल श्रमिक और सरकारी स्तर पर मिलने वाला सहयोग उत्पादन को आसान बनाते हैं। इसके अलावा, वर्षों से विकसित अंतरराष्ट्रीय कारोबारी संपर्क और वितरण नेटवर्क ने चीनी कंपनियों को विदेशी बाजारों तक पहुंचने में मदद की है।
कड़े नियम और लालफीताशाही भारतीय निर्यात की राह में बड़ी बाधा
भारत में पटाखा उद्योग के वैश्विक विस्तार में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक कड़े नियामकीय प्रावधान हैं। पटाखे विस्फोटक श्रेणी से जुड़े उत्पाद हैं, इसलिए इनके निर्माण, भंडारण, परिवहन और निर्यात के लिए कई तरह की अनुमतियों की जरूरत पड़ती है उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, एक्सप्लोसिव्स रूल्स, 2008 के तहत पटाखों को कम खतरे वाले विस्फोटकों की श्रेणी में रखा गया है, जबकि तमिलनाडु में इन्हें रेड कैटेगरी में वर्गीकृत किया गया है। उद्योग से जुड़े संगठनों की मांग है कि पटाखों को कम जोखिम वाले पाइरोटेक्निक उत्पादों के रूप में वर्गीकृत किया जाए, ताकि इनके परिवहन और बंदरगाहों से निर्यात की प्रक्रिया आसान हो सके।निर्माताओं का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई स्तरों पर मंजूरी लेनी पड़ती है। इसके कारण माल को बंदरगाह तक पहुंचाने, खतरनाक कार्गो के रूप में संभालने और उसका बीमा कराने की लागत बढ़ जाती है। नतीजतन, भारतीय पटाखे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के मामले में भी प्रतिस्पर्धा करने में पीछे रह जाते हैं।
बेरियम नाइट्रेट पर प्रतिबंध से भी बढ़ी मुश्किलें
भारतीय पटाखा उद्योग के सामने दूसरी बड़ी चुनौती रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़ी पाबंदियां हैं। साल 2018 में प्रदूषण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों में बेरियम नाइट्रेट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। इस फैसले का असर पटाखा निर्माताओं की उत्पादन प्रक्रिया पर भी पड़ा। उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के आतिशबाजी बाजार में बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता रहा है। ऐसे में इस रसायन पर प्रतिबंध के बाद भारतीय निर्माताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करना चुनौतीपूर्ण हो गया। दूसरी ओर, पश्चिमी देशों में पोटेशियम परक्लोरेट जैसे वैकल्पिक रासायनिक पदार्थों की मांग भी सामने आती है। हालांकि, भारत में इनके इस्तेमाल पर भी नियामकीय पाबंदियां हैं। इस वजह से भारतीय कंपनियों के लिए अलग-अलग देशों के सुरक्षा और उत्पाद मानकों के मुताबिक पटाखे तैयार करना आसान नहीं रह जाता।
छोटे उद्योग और अंतरराष्ट्रीय मानकों की चुनौती
भारत का पटाखा उद्योग मुख्य रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर आधारित है। शिवकाशी में बड़ी संख्या में छोटे कारखाने इस कारोबार से जुड़े हुए हैं। ये इकाइयां घरेलू बाजार की मांग पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े ऑर्डर मिलने पर इनके सामने उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती है। अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बाजारों में पटाखों के लिए कड़े सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रमाणन मानक लागू हैं। इन मानकों को पूरा करने के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर उत्पादन सुविधाओं और पर्याप्त निवेश की जरूरत होती है। छोटे कारखानों के लिए इन सभी व्यवस्थाओं को विकसित करना महंगा साबित होता है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय खरीदार नियमित आपूर्ति, उत्पादों की एक समान गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी की उम्मीद करते हैं। छोटे स्तर पर बंटे भारतीय उद्योग के लिए इन सभी शर्तों को एक साथ पूरा करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि भारतीय निर्माता बड़े विदेशी ऑर्डर हासिल करने में अक्सर पिछड़ जाते हैं।
क्या वैश्विक बाजार में चमक पाएगा भारत का पटाखा उद्योग?
भारत के पास पटाखा निर्माण का लंबा अनुभव, मजबूत घरेलू मांग और शिवकाशी जैसा स्थापित औद्योगिक केंद्र मौजूद है। इसके बावजूद वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बेहद कम होना कई सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े लोगों के सामने सबसे बड़ी जरूरत नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने, सुरक्षित उत्पादन तकनीक को बढ़ावा देने, निर्यात के लिए बेहतर लॉजिस्टिक्स विकसित करने और छोटे निर्माताओं को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की है। अगर भारतीय पटाखा उद्योग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है, तो केवल उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने, निर्यात से जुड़ी लागत कम करने और विदेशी बाजारों में मजबूत वितरण नेटवर्क विकसित करने की भी जरूरत होगी।
फिलहाल, भारत में दिवाली के दौरान पटाखों की बिक्री हजारों करोड़ रुपये का कारोबार करती है, लेकिन विदेशों में भारतीय पटाखों की मांग उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में शिवकाशी की असली चुनौती अब केवल देश का पटाखा बाजार संभालना नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार में चीन को टक्कर देना भी है।