भारतीय रुपया मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। 12 मई को रुपया 19 पैसे टूटकर 95.50 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के चलते भारतीय मुद्रा पर भारी दबाव देखा जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले दिनों में देश में महंगाई और बढ़ सकती है। पेट्रोल-डीजल से लेकर मोबाइल, लैपटॉप और विदेश यात्रा तक सब कुछ महंगा होने का खतरा बढ़ गया है।
डोनाल्ड ट्रम्प के बयान के बाद बढ़ा दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के ईरान संघर्ष को लेकर दिए गए बयान के बाद वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ गई। ट्रम्प ने ईरान के साथ संघर्ष विराम को कमजोर बताया, जिसके बाद मध्य पूर्व में तनाव और गहरा गया। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा और ब्रेंट क्रूड ऑयल 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हो गया।
रुपए में गिरावट के बड़े कारण
जियोपॉलिटिकल तनाव
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के चलते निवेशकों ने सुरक्षित निवेश की ओर रुख किया। इससे उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने लगी।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
भारत लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से इंपोर्ट बिल बढ़ा और डॉलर की मांग तेज हो गई।
डॉलर की मजबूती
वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित करेंसी माना जाता है। डॉलर की बढ़ती मांग से रुपया और कमजोर हुआ।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली
विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया, जिससे बाजार में डॉलर की कमी बढ़ी।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
पेट्रोल-डीजल और गैस महंगी हो सकती है
कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद महंगे होंगे
मोबाइल, लैपटॉप और अन्य आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी
विदेश जाने वाले छात्रों और यात्रियों को अब डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ेंगे।
महंगाई बढ़ने का खतरा
इंपोर्टेड सामान महंगा होने से खुदरा महंगाई में तेजी आ सकती है।
ओपेक उत्पादन में गिरावट से बढ़ी चिंता
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल में ओपेक देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों के सबसे निचले स्तर पर रहा। सऊदी अरामको के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट के कारण वैश्विक सप्लाई सामान्य होने में 2027 तक का समय लग सकता है। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट में भी अनुमान लगाया गया है कि तेल की कीमतें इस साल 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं।
प्रधानमंत्री ने की थी संयम बरतने की अपील
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और गैर जरूरी खर्चों में कटौती की अपील की थी। सरकार का कहना है कि ऊर्जा बचत से विदेशी मुद्रा पर दबाव कम किया जा सकता है।
करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?
किसी देश की मुद्रा की कीमत उसकी मांग और सप्लाई पर निर्भर करती है। अगर डॉलर की मांग बढ़ती है और विदेशी मुद्रा भंडार घटता है, तो रुपया कमजोर होता है। वहीं विदेशी निवेश और निर्यात बढ़ने पर रुपया मजबूत हो सकता है।