देश में डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुका UPI आज वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी सफलता का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के हालिया आंकड़े यह संकेत देते हैं कि इस सफलता की सबसे बड़ी ताकत कुछ चुनिंदा महानगर हैं। रिपोर्ट के अनुसार बेंगलुरु, मुंबई और पुणे जैसे बड़े आर्थिक केंद्र देश में होने वाले कुल UPI लेन-देन का बड़ा हिस्सा संभाल रहे हैं। इन शहरों में उच्च आय वर्ग, तकनीक के प्रति जागरूक आबादी, स्टार्टअप संस्कृति और डिजिटल सेवाओं का व्यापक प्रसार UPI को दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बना चुका है।
बेंगलुरु सबसे आगे, मुंबई और पुणे भी मजबूत स्थिति में
आंकड़ों के अनुसार बेंगलुरु शहरी क्षेत्र देश के कुल UPI लेन-देन में लगभग 2.86 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर है। इसके बाद मुंबई उपनगरीय क्षेत्र 2.49 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि पुणे 1.86 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर मौजूद है। यह आंकड़े केवल जनसंख्या नहीं बल्कि आर्थिक गतिविधियों की तीव्रता को भी दर्शाते हैं। इन शहरों में लाखों नौकरीपेशा लोग, उद्यमी, विद्यार्थी और सेवा क्षेत्र से जुड़े उपभोक्ता हर दिन छोटे-बड़े भुगतान के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं।
राज्यों के भीतर भी दिख रहा डिजिटल असंतुलन
रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हुआ है कि कई राज्यों में डिजिटल भुगतान का अधिकांश हिस्सा कुछ जिलों तक सीमित है। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में शीर्ष तीन जिले ही कुल UPI लेन-देन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा संभाल रहे हैं। हैदराबाद, बेंगलुरु शहरी और बेंगलुरु ग्रामीण क्षेत्र अपने-अपने राज्यों में डिजिटल भुगतान गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं। इसी तरह महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में भी कुछ बड़े आर्थिक जिलों का वर्चस्व दिखाई देता है। यह स्थिति बताती है कि डिजिटल भुगतान का विस्तार अभी पूरे राज्य या ग्रामीण क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है।
छोटे कस्बों में अब भी नकदी पर भरोसा कायम
महानगरों की तुलना में छोटे शहरों और कस्बों की तस्वीर अलग दिखाई देती है। वहां UPI का उपयोग बढ़ तो रहा है, लेकिन नकदी अभी भी प्रमुख भुगतान माध्यम बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार कस्बाई क्षेत्रों में लोग दैनिक छोटे खर्चों के लिए नकद भुगतान को अधिक सुविधाजनक मानते हैं, जबकि अपेक्षाकृत बड़ी राशि के लेन-देन के लिए UPI का सहारा लेते हैं। इस व्यवहारिक अंतर के कारण वहां लेन-देन की संख्या महानगरों की तुलना में काफी कम रहती है। स्थानीय व्यापारियों और ग्राहकों की आदतें भी इस प्रवृत्ति को प्रभावित करती हैं।
डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढांचा बने बड़ी चुनौती
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्मार्टफोन की उपलब्धता और डिजिटल साक्षरता अभी भी महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं। कई स्थानों पर नेटवर्क की अस्थिरता और साइबर धोखाधड़ी का डर भी लोगों को पूरी तरह डिजिटल भुगतान अपनाने से रोकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डिजिटल इंडिया अभियान को जमीनी स्तर तक सफल बनाना है तो केवल तकनीक उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लोगों में विश्वास और जागरूकता भी विकसित करनी होगी।
भविष्य की राह: गांवों और कस्बों तक पहुंचानी होगी डिजिटल क्रांति
UPI ने भारतीय भुगतान प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इसकी वास्तविक क्षमता तब सामने आएगी जब छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसका उपयोग समान रूप से बढ़ेगा। वित्तीय समावेशन, डिजिटल शिक्षा और बेहतर इंटरनेट बुनियादी ढांचे के जरिए ही यह अंतर कम किया जा सकता है। आने वाले वर्षों में यदि डिजिटल भुगतान की पहुंच देश के अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हो जाती है, तो भारत वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।