राजधानी भोपाल के कुटुंब न्यायालय में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने रिश्तों और समझौते की परिभाषा को नई बहस में डाल दिया। एक 42 वर्षीय सरकारी कर्मचारी अपनी ही विभाग की वरिष्ठ महिला अधिकारी के साथ रिश्ते में था। समय के साथ पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ गईं और विवाद इतना गंभीर हुआ कि मामला अदालत तक पहुंच गया। घर के तनाव का असर उनकी 16 और 12 साल की बेटियों पर भी पड़ा। बड़ी बेटी ने पहल करते हुए फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। काउंसलिंग के कई दौर चले, लेकिन आखिरकार पति ने साफ कह दिया कि वह अपनी सहकर्मी के साथ रहना चाहता है और तलाक के लिए तैयार है।
आर्थिक सुरक्षा बनी समझौते की शर्त
पत्नी ने तलाक के लिए स्पष्ट शर्त रखी—एक डुप्लेक्स मकान और 27 लाख रुपये नकद। कुल मिलाकर यह राशि लगभग डेढ़ करोड़ रुपये बनी। चौंकाने वाली बात यह रही कि पति की प्रेमिका ने भी बिना किसी हिचक इसे स्वीकार कर लिया। उनका कहना था कि वह नहीं चाहती कि पति का परिवार आर्थिक रूप से असुरक्षित रहे। पांच साल तक चले विवाद के बाद संपत्ति और नकद समझौते के आधार पर दोनों पक्ष अलग होने पर सहमत हो गए।
‘जुदाई’ जैसी कहानी, लेकिन अलग वजह
यह पूरा घटनाक्रम 1997 की फिल्म जुदाई की याद दिलाता है, जिसमें पैसों के बदले रिश्तों का सौदा दिखाया गया था। हालांकि उस फिल्म में लालच कहानी का केंद्र था, इस मामले में बच्चों के भविष्य और आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैवाहिक विवादों का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ता है। ऐसे में कानूनी और आर्थिक रूप से स्पष्ट समाधान कई बार भावनात्मक तनाव से बेहतर साबित होता है।