मध्यप्रदेश के शासकीय कॉलेजों में कार्यरत अतिथि विद्वानों के लिए राहत की उम्मीद जगी है। गेस्ट फैकल्टी व्यवस्था को लेकर प्रदेश में हरियाणा मॉडल लागू किया जा सकता है। इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग द्वारा गठित समिति ने हरियाणा में लागू नियमों और प्रावधानों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंप दी है। अब इस रिपोर्ट के आधार पर विभागीय स्तर पर निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, नीति पर मंथन के बीच जमीनी स्तर पर बड़ी चूक सामने आई है। उच्च शिक्षा मंत्री के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद प्रदेश में 250 से अधिक अतिथि विद्वानों का फॉलन आउट (सेवा समाप्ति) कर दिया गया है, जिससे शिक्षकों में असंतोष बढ़ गया है।
मंत्री के निर्देशों पर नहीं हुआ अमल
उच्च शिक्षा मंत्री ने हाल ही में निर्देश दिए थे कि नियमित नियुक्ति या स्थानांतरण के कारण प्रभावित हो रहे अतिथि विद्वानों को रिक्त पदों के विरुद्ध विकल्प (चॉइस फिलिंग) का अवसर दिया जाए। उद्देश्य यह था कि वर्षों से सेवाएं दे रहे शिक्षकों को अचानक बाहर न किया जाए और उन्हें राहत मिल सके। लेकिन कई कॉलेजों में इन निर्देशों का पालन नहीं हुआ और बड़ी संख्या में अतिथि विद्वानों को सेवा से हटा दिया गया।
वर्षों की सेवा, फिर भी असुरक्षा
फॉलन आउट हुए अतिथि विद्वानों का कहना है कि उन्होंने 10 से 15 वर्षों तक न्यूनतम मानदेय पर कॉलेजों में पढ़ाया। जब नियमित स्टाफ की कमी थी, तब संस्थानों की शैक्षणिक जिम्मेदारी उन्होंने संभाली। अब स्थायी भर्ती की प्रक्रिया शुरू होते ही उन्हें सामान्य अभ्यर्थियों की तरह प्रतिस्पर्धा में खड़ा कर दिया गया है, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।
हरियाणा मॉडल से क्या बदलेगा?
हरियाणा में गेस्ट फैकल्टी के लिए अपेक्षाकृत स्थिर और पारदर्शी व्यवस्था लागू है, जिसमें अनुभव को महत्व देने और सेवा निरंतरता पर जोर दिया गया है। मध्यप्रदेश में यदि यह मॉडल अपनाया जाता है, तो अतिथि विद्वानों को सेवा सुरक्षा,चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता,और अनुभव का लाभ मिलने की संभावना है।
निर्णय पर टिकी निगाहें
समिति की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद अब सभी की नजरें उच्च शिक्षा विभाग के फैसले पर टिकी हैं। यदि समय रहते स्पष्ट नीति नहीं बनी, तो अतिथि विद्वानों का असंतोष और बढ़ सकता है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार को जल्द निर्णय लेकर वर्षों से सेवा दे रहे विद्वानों को न्याय देना चाहिए।
Comments (0)