फुटबॉल की दीवानगी सरहदों को नहीं मानती, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज कई फीफा विश्व कप ऐसे हैं, जिन्होंने खेल के साथ-साथ राजनीति की बिसात भी बिछाई है। दुनिया के सबसे लोकप्रिय इस खेल का इस्तेमाल कई देशों में सत्ताधारी तानाशाहों ने अपनी छवि चमकाने और राजनीतिक वैधता हासिल करने के लिए किया है। IND 24 की इस विशेष पड़ताल में हम उन पलों को याद कर रहे हैं, जब फुटबॉल का मैदान स्टेडियम से बाहर निकलकर सत्ता के गलियारों में बदल गया था।
मुसोलिनी का 'फासीवादी' दांव: 1934 विश्व कप
इतिहास गवाह है कि वर्ष 1934 का फीफा विश्व कप इटली में आयोजित हुआ, जो उस समय बेनिटो मुसोलिनी के फासीवादी शासन के अधीन था। मुसोलिनी ने इस टूर्नामेंट का उपयोग अपनी विचारधारा को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने के लिए एक हथियार के रूप में किया। कई खेल इतिहासकारों का दावा है कि उस दौरान रेफरी से लेकर मैचों के नतीजों तक पर फासीवादी दबाव था। इटली की जीत को आज भी कई विशेषज्ञ केवल खेल कौशल नहीं, बल्कि मुसोलिनी के 'प्रोपोगेंडा' की जीत के रूप में देखते हैं।
अर्जेंटीना 1978: दमन के बीच 'खेल का पर्दा'
जब 1978 में अर्जेंटीना ने विश्व कप की मेजबानी की, तब देश एक क्रूर सैन्य तानाशाही के दौर से गुजर रहा था। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, उस वक्त सरकार का मुख्य उद्देश्य फुटबॉल के जरिए दुनिया की नजरों में अपनी एक सकारात्मक छवि गढ़ना था, ताकि देश के भीतर चल रहे दमनकारी अत्याचारों से ध्यान हटाया जा सके। यह टूर्नामेंट उन लोगों के लिए एक काला अध्याय माना जाता है, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने सरकार का असली चेहरा देखा था, जबकि दुनिया मैदान पर गोल का जश्न मना रही थी।
ब्राज़ील: जब राष्ट्रवाद के नाम पर खेला गया फुटबॉल
1960 और 70 के दशक में ब्राज़ील का सैन्य शासन फुटबॉल की लोकप्रियता का उपयोग 'राजनीतिक ऑक्सीजन' के रूप में करता था। सैन्य शासकों ने बखूबी समझा था कि यदि राष्ट्रीय टीम जीतती है, तो जनता का ध्यान आंतरिक समस्याओं और राजनीतिक विद्रोह से भटकाया जा सकता है। फुटबॉल को 'राष्ट्रीय गर्व' के नाम पर सरकार से जोड़ दिया गया, जिससे जनता को यह विश्वास दिलाया जा सके कि देश की तरक्की और फुटबॉल की सफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
खेल और राजनीति का अटूट 'गठबंधन'
विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व कप जैसे विशाल आयोजन आज भी उन सरकारों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं, जो वैश्विक स्तर पर अपनी साख मजबूत करना चाहती हैं। यह खेल और राजनीति का ऐसा पुराना रिश्ता है जो अक्सर बहस का विषय बनता है। फुटबॉल का मैदान केवल गोल करने के लिए नहीं, बल्कि अक्सर जनता का ध्यान भटकाने और सत्ता को मजबूत करने के लिए भी इस्तेमाल किया गया है। आज भी जब हम विश्व कप देखते हैं, तो इतिहास की ये घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि खेल हमेशा खेल नहीं होता, उसके पीछे अक्सर सियासत की गहरी परतें छिपी होती हैं।