यूनाइटेड नेशन. 23 सितंबर 2026 को जारी बताए जा रहे इस खुले पत्र में ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने बलूचिस्तान की राजनीतिक स्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है। संगठन ने दावा किया है कि बलूचिस्तान का पाकिस्तान में शामिल होना वहां के लोगों की स्वैच्छिक राजनीतिक सहमति का परिणाम नहीं था। पत्र में संयुक्त राष्ट्र से क्षेत्र के इतिहास और वर्तमान राजनीतिक स्थिति की स्वतंत्र जांच कराने तथा बलूच लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर विचार करने की मांग की गई है। ऐसे दावे पहले भी बलूच अलगाववादी संगठनों और राजनीतिक समूहों की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाए जाते रहे हैं। सितंबर 2026 में ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने BRICS देशों से भी बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की आकांक्षाओं को मान्यता देने की अपील की थी।
इस पत्र का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि बलूचिस्तान को लेकर पाकिस्तान की आधिकारिक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान अपने मौजूदा संवैधानिक ढांचे में बलूचिस्तान को देश के एक प्रांत के रूप में मानता है और सरकारी दस्तावेजों में उसे पाकिस्तान का हिस्सा बताया गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की आधिकारिक सामग्री में बलूचिस्तान को देश के प्रांतों में शामिल किया गया है। दूसरी ओर, स्वतंत्रता समर्थक संगठन पाकिस्तान के अधिकार को चुनौती देते हुए इसे ऐतिहासिक और राजनीतिक रूप से अलग इकाई के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
1947-48 का इतिहास बना दावे का आधार
खुले पत्र में 1947 और 1948 की घटनाओं को विशेष महत्व दिया गया है। इसका केंद्र तत्कालीन कलात रियासत और पाकिस्तान के बीच हुए राजनीतिक घटनाक्रम हैं। ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय कलात की स्थिति और उसके पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर राजनीतिक बातचीत हुई थी। बलूच स्वतंत्रता समर्थक पक्ष इस इतिहास की अपनी व्याख्या के आधार पर दावा करता है कि बलूचिस्तान ने पाकिस्तान के साथ स्वैच्छिक विलय स्वीकार नहीं किया था। वहीं पाकिस्तान के आधिकारिक दृष्टिकोण में कलात के पाकिस्तान में विलय को राज्य के एकीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।
कलात के पाकिस्तान में शामिल होने की प्रक्रिया विशेष रूप से विवाद का विषय रही है। उपलब्ध पाकिस्तानी सरकारी सामग्री में भी मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा कलात के विलय के प्रश्न को महत्वपूर्ण और समस्याग्रस्त मुद्दे के रूप में संभालने का उल्लेख मिलता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की एक सामग्री में कहा गया है कि जिन्ना ने उन रियासतों के विलय के प्रश्न को सुलझाया, जिनमें कलात विशेष रूप से कठिन मामला था। इससे यह स्पष्ट होता है कि 1947-48 में कलात को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न मौजूद थे, हालांकि इन घटनाओं की व्याख्या आज भी राजनीतिक पक्षों के बीच अलग-अलग है।
27 मार्च 1948 की घटना पर अलग-अलग दावे
पत्र में 27 मार्च 1948 को कलात के खान द्वारा पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए जाने का उल्लेख करते हुए इसे बलूचिस्तान के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ बताया गया है। स्वतंत्रता समर्थक पक्ष का दावा है कि यह निर्णय स्वैच्छिक परिस्थितियों में नहीं हुआ और उस समय सैन्य दबाव मौजूद था। यही वह बिंदु है जहां ऐतिहासिक घटनाओं के तथ्य और उनकी राजनीतिक व्याख्या एक-दूसरे से अलग दिखाई देती हैं। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक पक्ष के दावे के आधार पर अंतिम रूप से परिभाषित करना विवादित इतिहास को एकतरफा तरीके से प्रस्तुत करना होगा।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की आधिकारिक ऐतिहासिक व्याख्या कलात के विलय को पाकिस्तान के गठन के बाद रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में रखती है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की सामग्री में कलात के विलय को जिन्ना के सामने मौजूद महत्वपूर्ण राज्य-संबंधी प्रश्नों में शामिल किया गया है। इसलिए 1948 की घटना के बारे में दो प्रमुख राजनीतिक व्याख्याएं मौजूद हैं—एक इसे पाकिस्तान में वैधानिक विलय के रूप में देखती है और दूसरी इसे बलूच राजनीतिक इच्छा के विरुद्ध हुआ घटनाक्रम बताती है। इस अंतर को समझे बिना वर्तमान स्वतंत्रता की मांग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को पूरी तरह समझना कठिन होगा।
आत्मनिर्णय के अधिकार पर जोर
‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के पत्र का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक आग्रह बलूच लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार से जुड़ा है। संगठन चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र इस सवाल पर विचार करे कि बलूच लोगों को अपनी राजनीतिक स्थिति तय करने का अधिकार किस तरह लागू किया जा सकता है। पत्र में स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग भी इसी व्यापक दावे से जुड़ी है। संगठन इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों तथा राजनीतिक स्थिति को लेकर हस्तक्षेप की मांग करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र के एक दस्तावेज में बलूचिस्तान से जुड़े एक गैर-सरकारी संगठन के बयान में भी मानवाधिकार उल्लंघनों और स्वतंत्र जांच की मांग दर्ज है, हालांकि ऐसे दस्तावेज संबंधित संगठनों के प्रस्तुत किए गए विचारों को दर्ज करते हैं, संयुक्त राष्ट्र की ओर से उन दावों की पुष्टि नहीं करते।
बलूचिस्तान में मानवाधिकार और राजनीतिक दमन को लेकर अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्टें भी सामने आती रही हैं। उदाहरण के लिए, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2026 में बलूच कार्यकर्ताओं की हिरासत, निष्पक्ष सुनवाई और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त की थी। दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार और उसके अधिकारी बलूचिस्तान में सुरक्षा अभियानों को आतंकवाद और सशस्त्र हिंसा से निपटने की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसलिए क्षेत्र की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए स्वतंत्रता समर्थक संगठनों के दावों के साथ पाकिस्तान सरकार का आधिकारिक पक्ष और स्वतंत्र मानवाधिकार रिपोर्टों को भी अलग-अलग देखना आवश्यक है।
पाकिस्तान की ओर से क्या है आधिकारिक रुख?
पाकिस्तान का आधिकारिक रुख यह है कि बलूचिस्तान देश का संवैधानिक हिस्सा है। सरकारी दस्तावेजों में बलूचिस्तान को पाकिस्तान के प्रांतों में शामिल किया गया है और वहां प्रशासनिक तथा विकास योजनाएं संघीय एवं प्रांतीय ढांचे के तहत संचालित होती हैं। 23 सितंबर 2026 को पाकिस्तान के सरकारी प्रसारक ने भी बलूचिस्तान में विभिन्न विकास परियोजनाओं के पूरा होने और प्रांतीय स्तर पर विकास गतिविधियों की जानकारी दी। यानी पाकिस्तान की सरकारी संस्थाएं बलूचिस्तान को अलग देश नहीं, बल्कि पाकिस्तान के एक प्रांत के रूप में ही प्रस्तुत करती हैं।
सुरक्षा के मुद्दे पर भी पाकिस्तान सरकार का दृष्टिकोण अलग है। पाकिस्तानी अधिकारी बलूचिस्तान में सक्रिय सशस्त्र संगठनों के खिलाफ सैन्य और सुरक्षा कार्रवाई को आतंकवाद से मुकाबले का हिस्सा बताते हैं। सितंबर 2026 में बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री ने भी क्षेत्र में सुरक्षा अभियान जारी रहने और नागरिक तथा सैन्य नेतृत्व के आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात कही थी। दूसरी ओर स्वतंत्रता समर्थक समूह इन अभियानों को बलूच आबादी के राजनीतिक दमन के रूप में देखते हैं। इसलिए मौजूदा संघर्ष केवल क्षेत्रीय प्रशासन का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों, सुरक्षा और आत्मनिर्णय को लेकर गहरे मतभेद हैं।
संयुक्त राष्ट्र से मान्यता की मांग कितनी महत्वपूर्ण है?
खुले पत्र में स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र से विचार करने की अपील की गई है। हालांकि किसी क्षेत्र या राजनीतिक संगठन द्वारा संयुक्त राष्ट्र को पत्र भेजना अपने आप में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्रदान नहीं करता। किसी नए राज्य की अंतरराष्ट्रीय स्थिति का प्रश्न व्यापक कूटनीतिक, राजनीतिक और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ा होता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा की अपनी अलग-अलग भूमिकाएं हैं तथा किसी क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग और उसके वास्तविक अंतरराष्ट्रीय राज्य दर्जे के बीच महत्वपूर्ण अंतर होता है।
बलूचिस्तान के मामले में फिलहाल यह मांग मुख्य रूप से स्वतंत्रता समर्थक संगठनों और राजनीतिक समूहों की ओर से सामने आ रही है। अगस्त और सितंबर 2026 में ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से अमेरिका, चीन और BRICS देशों सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संबोधित अपीलें भी जारी की गई हैं। इनमें संगठन ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र और संप्रभु देश के रूप में मान्यता देने की मांग की है। हालांकि उपलब्ध सामग्री में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा इस मांग को स्वीकार किए जाने या बलूचिस्तान को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दिए जाने की कोई घोषणा सामने नहीं आती।