यूनाइटेड किंगडम में इस वर्ष की गर्मियों ने मौसम के अनेक पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। सामान्यतः हरे-भरे मैदानों, उद्यानों और खुले प्राकृतिक क्षेत्रों के लिए पहचाने जाने वाले इंग्लैंड का बड़ा भूभाग अब सूखे की गंभीर मार झेल रहा है। राजधानी लंदन का ऐतिहासिक ब्लैकहीथ क्षेत्र इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां कभी फैली हरी घास अब पीली पड़ चुकी है और विशाल भूभाग सूखी तथा बंजर भूमि में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि तेजी से बदलते वैश्विक जलवायु परिदृश्य का प्रत्यक्ष संकेत है। पूरे वेल्स तथा इंग्लैंड के लगभग आधे हिस्से में सूखे जैसे हालात बनने से पर्यावरण, कृषि, जैव विविधता और जल संसाधनों पर व्यापक दबाव उत्पन्न हो गया है।
रिकॉर्ड स्तर की कम वर्षा ने बढ़ाई चिंता
इस वर्ष जुलाई महीने में यूनाइटेड किंगडम में सामान्य औसत वर्षा का केवल लगभग 35 प्रतिशत पानी ही बरस सका। वर्ष 1868 से उपलब्ध मौसम अभिलेखों के अनुसार यह जुलाई का सबसे शुष्क महीना माना जा रहा है। वर्षा की भारी कमी के कारण नदियों और जलाशयों का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है, जबकि मिट्टी में नमी लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है। अनेक सार्वजनिक पार्कों, खेल मैदानों और ग्रामीण क्षेत्रों में हरियाली तेजी से समाप्त हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आगामी सप्ताहों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो कई क्षेत्रों में जल संरक्षण संबंधी अतिरिक्त प्रतिबंध लागू करने पड़ सकते हैं। मौसम वैज्ञानिक इसे केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी दीर्घकालिक प्रवृत्ति का हिस्सा मान रहे हैं।
भीषण गर्मी की नई लहर की आशंका, स्वास्थ्य सेवाएं सतर्क
मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि सप्ताहांत से दक्षिण-पूर्वी इंग्लैंड में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच सकता है। इसके मद्देनज़र मंगलवार तक इंग्लैंड के अधिकांश हिस्सों के लिए येलो हीट हेल्थ अलर्ट जारी किया गया है। इस चेतावनी का उद्देश्य अस्पतालों, सामाजिक देखभाल सेवाओं तथा स्थानीय प्रशासन को संभावित दबाव के प्रति पहले से तैयार करना है। विशेष रूप से वृद्धजनों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अत्यधिक गर्मी को बड़ा स्वास्थ्य जोखिम माना गया है। विशेषज्ञ लोगों को पर्याप्त पानी पीने, दोपहर की तेज धूप से बचने तथा आवश्यक होने पर ही बाहर निकलने की सलाह दे रहे हैं।
पांचवीं बड़ी हीटवेव की ओर बढ़ता ब्रिटेन
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले दिनों में इंग्लैंड और वेल्स के अधिकांश क्षेत्रों में तापमान 25 से 29 डिग्री सेल्सियस के बीच बना रहेगा, जबकि कई स्थानों पर यह इससे भी अधिक दर्ज हो सकता है। यूनाइटेड किंगडम में किसी क्षेत्र विशेष के लिए निर्धारित हीटवेव सीमा सामान्यतः 25 से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच होती है, जो स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। यदि लगातार तीन दिनों तक तापमान इस सीमा से ऊपर बना रहता है तो औपचारिक रूप से हीटवेव घोषित की जाती है। वर्तमान पूर्वानुमानों के आधार पर इस वर्ष की पांचवीं व्यापक हीटवेव घोषित होने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है। दूसरी ओर स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड अपेक्षाकृत ठंडे बने रहेंगे, जहां तापमान 17 से 21 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने के साथ बादल, हल्की वर्षा और तेज हवाएं मौसम को कुछ राहत देंगी।
बदलते मौसम ने बढ़ाईं पर्यावरण और अर्थव्यवस्था की चुनौतियां
लगातार पड़ रही गर्मी का प्रभाव केवल मौसम तक सीमित नहीं है। कृषि उत्पादन, पशुपालन, जलापूर्ति, वनस्पति और शहरी जीवन सभी पर इसका प्रतिकूल असर दिखाई देने लगा है। सूखी घास और वनस्पतियों के कारण आग लगने की घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे चरम मौसम की घटनाएं अधिक सामान्य हो सकती हैं, इसलिए जल संरक्षण, हरित क्षेत्रों के विस्तार, टिकाऊ शहरी विकास और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे उपायों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि सामान्य नागरिकों के दैनिक जीवन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
वैश्विक जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी बना ब्रिटेन का अनुभव
इस वर्ष यूनाइटेड किंगडम में गर्मियों का मौसम अनेक ऐतिहासिक रिकॉर्ड दर्ज कर चुका है। जुलाई अब तक का सबसे अधिक धूप वाला महीना रहा है, जबकि इंग्लैंड और वेल्स ने अपने इतिहास का सबसे शुष्क जुलाई देखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की वर्तमान गति जारी रही तो भविष्य में यूरोप के अन्य हिस्सों में भी इसी प्रकार की चरम मौसमीय परिस्थितियां अधिक बार देखने को मिल सकती हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार और पर्यावरण संरक्षण संबंधी नीतियों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।