भोपाल. देश में बढ़ती महंगाई का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं पर भी साफ दिखाई देने लगा है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित कई शहरों में निजी अस्पतालों का खर्च तेजी से बढ़ रहा है। पहले जहां मरीज केवल दवाइयों, जांच और अस्पताल शुल्क को लेकर परेशान रहते थे, वहीं अब अस्पताल में मिलने वाले भोजन का खर्च भी लोगों के लिए बड़ी चिंता बन गया है। लगातार बढ़ती लागत और आवश्यक सेवाओं के महंगे होने के कारण अस्पतालों ने अपने विभिन्न शुल्कों में बदलाव शुरू कर दिया है, जिसका सीधा असर मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।
कमर्शियल गैस महंगी होने से अस्पतालों की रसोई पर बढ़ा दबाव
अस्पताल प्रबंधन से जुड़े लोगों का कहना है कि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि ने अस्पतालों की रसोई व्यवस्था का पूरा बजट प्रभावित कर दिया है। मरीजों के लिए प्रतिदिन तैयार होने वाले भोजन में उपयोग होने वाली गैस, खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी संसाधनों की लागत बढ़ने से अस्पतालों के सामने अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा हो गया है। यही वजह है कि अब कई अस्पतालों ने “पेशेंट डाइट” यानी मरीजों के भोजन शुल्क में वृद्धि करना शुरू कर दिया है।
मरीजों की थाली हुई और महंगी
एमपी नर्सिंग होम एसोसिएशन से जुड़े प्रतिनिधियों के अनुसार नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स यानी एनएबीएच से मान्यता प्राप्त अस्पतालों में मरीजों को दिए जाने वाले भोजन की कीमत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। पहले जिस थाली की कीमत लगभग 120 रुपये थी, वह अब बढ़कर 140 रुपये तक पहुंच गई है। यह लगभग 16.7 प्रतिशत की सीधी वृद्धि मानी जा रही है। अस्पतालों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण यह निर्णय मजबूरी में लेना पड़ा है, लेकिन इसका सबसे अधिक असर उन मरीजों पर पड़ रहा है जो निजी अस्पतालों में अपने खर्च पर इलाज करा रहे हैं।
आयुष्मान योजना से बाहर मरीजों पर बढ़ा आर्थिक बोझ
स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती लागत का सबसे बड़ा दबाव उन लोगों पर दिखाई दे रहा है जो आयुष्मान भारत योजना जैसी सरकारी योजनाओं के दायरे में नहीं आते। निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को पहले ही बेड चार्ज, डॉक्टर फीस, जांच और दवाइयों पर भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। अब भोजन शुल्क में बढ़ोतरी ने उनकी मुश्किल और बढ़ा दी है। कई परिवारों के लिए लंबे इलाज के दौरान हर दिन बढ़ता खर्च आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है। विशेष रूप से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लोग इस दोहरी मार से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
पुरानी बीमारियों से जूझ रहे परिवारों की बढ़ी परेशानी
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि जिन परिवारों में किसी सदस्य को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है, वहां स्थिति और गंभीर हो जाती है। मधुमेह, हृदय रोग, किडनी संबंधी बीमारी या कैंसर जैसी समस्याओं में बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है और दवाइयों का खर्च लगातार बढ़ता रहता है। ऐसे में अस्पतालों में भोजन और अन्य सेवाओं की बढ़ी कीमतें परिवारों की बचत खत्म कर रही हैं। कई लोगों को इलाज जारी रखने के लिए कर्ज तक लेना पड़ रहा है।
सरकारी अस्पतालों में भी पूरी तरह राहत नहीं
हालांकि सरकारी अस्पतालों में इलाज अपेक्षाकृत कम खर्चीला माना जाता है, लेकिन वहां भी जांच, दवाइयों और परिवहन पर होने वाला खर्च आम लोगों की जेब पर भारी पड़ रहा है। कई बार मरीजों को जरूरी दवाइयां बाहर से खरीदनी पड़ती हैं, जबकि बार-बार अस्पताल आने-जाने का खर्च अलग से बढ़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत पर नियंत्रण और गरीब तथा मध्यम वर्ग के लिए बेहतर सहायता व्यवस्था तैयार करना आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।