नई दिल्ली. वायुसेना के अनुसार, IL-76MD ने न्योमा में सफल लैंडिंग के साथ इस विमान के लिए दुनिया की सबसे अधिक ऊंचाई पर उतरने का रिकॉर्ड बनाया है। यह उपलब्धि केवल विमान की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अत्यधिक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उसके चालक दल की दक्षता का भी प्रमाण है। इतनी ऊंचाई पर हवा का घनत्व कम होने से विमान के इंजन, उड़ान और उतरने की प्रक्रिया पर विशेष प्रभाव पड़ता है। ऐसे में भारी परिवहन विमान को सुरक्षित उतारने के लिए सटीक योजना, मौसम का आकलन और असाधारण उड़ान कौशल की आवश्यकता होती है। वायुसेना ने इसे भारत की सामरिक हवाई परिवहन क्षमता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब रणनीतिक रूप से अहम न्योमा
पूर्वी लद्दाख में स्थित न्योमा एयरफील्ड वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के बेहद करीब है। समुद्र तल से लगभग 13,700 फीट की ऊंचाई पर बने इस हवाई क्षेत्र को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। इसके रनवे और आधारभूत ढांचे को सीमा सड़क संगठन (BRO) के प्रोजेक्ट हिमांक ने विकसित किया है। यहां सर्दियों में तापमान बेहद नीचे चला जाता है और मौसम भी तेजी से बदलता है। ऐसे कठिन भौगोलिक और मौसमी हालात में बड़े परिवहन विमान की सफल लैंडिंग इस एयरफील्ड की परिचालन उपयोगिता को नई मजबूती देती है। चीन से लगी सीमा के निकट इसकी स्थिति इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
45 टन तक सैन्य साजो-सामान ले जाने की क्षमता
रूसी मूल का IL-76 भारतीय वायुसेना के भारी परिवहन बेड़े का महत्वपूर्ण विमान है। इसे 1980 के दशक के मध्य में वायुसेना में शामिल किया गया था और तब से यह सैन्य रसद तथा सैनिकों की आवाजाही में अहम भूमिका निभाता रहा है। यह विमान लगभग 45 टन तक भार ले जाने में सक्षम है। इसकी मदद से टैंक, बख्तरबंद वाहन, भारी सैन्य उपकरण और आवश्यक आपूर्ति को दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचाया जा सकता है। लद्दाख और पूर्वोत्तर के कठिन इलाकों में इसकी उपयोगिता पहले भी साबित हो चुकी है। न्योमा में इसकी लैंडिंग से अब ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में भारी सामान पहुंचाने के लिए एक और महत्वपूर्ण हवाई विकल्प उपलब्ध हुआ है।
सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों की आवाजाही होगी अधिक सुगम
न्योमा एयरफील्ड पर भारी परिवहन विमान के संचालन से पूर्वी लद्दाख में सैन्य रसद व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। जरूरत पड़ने पर सैनिकों, उपकरणों और जरूरी सामग्री को अपेक्षाकृत तेजी से अग्रिम क्षेत्रों के करीब पहुंचाया जा सकेगा। इससे सड़क मार्ग पर निर्भरता कम करने और कठिन मौसम में आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। लेह से लगभग 180 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित यह एयरफील्ड सैन्य योजनाओं के लिए अतिरिक्त परिचालन विकल्प तैयार करता है। खासकर तब, जब सीमा पर त्वरित तैनाती या किसी आपात स्थिति में सहायता पहुंचाने की जरूरत हो, ऐसी हवाई सुविधा का महत्व और बढ़ जाता है।
लेह, थॉइस और दौलत बेग ओल्डी से जुड़ती सामरिक कड़ी
लद्दाख में वायुसेना के लिए लेह और थॉइस लंबे समय से महत्वपूर्ण हवाई केंद्र रहे हैं। थॉइस सियाचिन ग्लेशियर में तैनात सैनिकों तक रसद और आवश्यक सामग्री पहुंचाने के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। इसके अलावा फुकचे और दौलत बेग ओल्डी जैसे अग्रिम हवाई ठिकाने भी सीमावर्ती क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों को समर्थन देते हैं। लगभग 16,700 फीट की ऊंचाई पर स्थित दौलत बेग ओल्डी दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टियों में शामिल है। न्योमा में भारी परिवहन विमान की लैंडिंग से इस पूरे क्षेत्र में हवाई संपर्क और सैन्य आपूर्ति के विकल्पों का विस्तार हुआ है। इससे सीमावर्ती बुनियादी ढांचे के महत्व को भी रेखांकित किया गया है।
चंडीगढ़ से संचालित होता है IL-76 का 44वां स्क्वाड्रन
भारतीय वायुसेना के IL-76 विमानों का संचालन नंबर 44 स्क्वाड्रन करता है, जिसका ठिकाना चंडीगढ़ है। यह स्क्वाड्रन देश के भारी परिवहन अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वायुसेना के बेड़े में अमेरिकी कंपनी बोइंग का C-17 ग्लोबमास्टर भी शामिल है, जो भारी सैन्य सामग्री और सैनिकों को लंबी दूरी तक पहुंचाने में सक्षम है। इन विमानों के जरिए भारत की सामरिक हवाई परिवहन क्षमता को व्यापक आधार मिलता है। न्योमा में IL-76MD की ऐतिहासिक लैंडिंग ने यह भी दिखाया है कि मौजूदा परिवहन बेड़े का इस्तेमाल अत्यधिक ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में किस तरह किया जा सकता है। यह उपलब्धि लद्दाख में सैन्य तैयारियों और सीमावर्ती क्षेत्रों तक तेज पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।