वाशिंगटन. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर को समर्थन दिया। यह समर्थन उस रिपोर्ट की तारीफ के बीस दिन बाद आया जिसमें सीरिया को खाड़ी से भूमध्य सागर तक तेल-गैस निकालने का वैकल्पिक कॉरिडोर बताया गया था। पश्चिमी थिंक टैंक सीरिया को आईएमईसी का विकल्प मान रहे थे लेकिन आईएमईसी अधिक व्यवहार्य प्रस्ताव है क्योंकि यह खाड़ी के तेल आपूर्तिकर्ताओं को भारत की रिफाइनरियों और भारतीय उपमहाद्वीप तथा यूरोप के उपभोक्ताओं से जोड़ता है। सीरियाई शासन की स्थिरता अभी भी बड़ा सवाल बनी हुई है भले ही ट्रंप प्रशासन का समर्थन हो।
आईएमईसी का प्रस्तावित मार्ग
आईएमईसी भारत के मुंद्रा पोर्ट को संयुक्त अरब अमीरात के फुजैराह पोर्ट से समुद्री मार्ग से जोड़ता है। फिर पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब, जॉर्डन और इजरायल होते हुए सोलर संचालित रेल नेटवर्क से आगे बढ़ता है। इसके बाद हाइफा पोर्ट से जहाजों के माध्यम से यूरोप के नेपल्स और मार्सेय तक पहुंचता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य और स्वेज नहर-लाल सागर मार्गों दोनों को बायपास करता है। पश्चिम एशियाई राजनीति और झड़पों की अनिश्चितताओं से यह अपेक्षाकृत कम प्रभावित है। फुजैराह पोर्ट होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर ओमान की खाड़ी में स्थित है।
सऊदी अरब की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण
आईएमईसी को हकीकत बनाने की कुंजी सऊदी अरब का अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होना है। राष्ट्रपति ट्रंप रियाद को नागरिक परमाणु समझौता और 24 अरब डॉलर मूल्य के एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने का प्रस्ताव दे रहे हैं। तथ्य यह है कि सऊदी अरब शायद अब्राहम एकॉर्ड्स में शामिल होने के करीब था जब ईरान समर्थित हमास ने 7 अक्टूबर 2023 के आतंकी हमलों से पूरे आईएमईसी को प्रभावित कर दिया। आज आईएमईसी के सामने एक और चुनौती है क्योंकि सऊदी अरब ने तुर्की और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता किया है। अंकारा और इस्लामाबाद दोनों इजरायल के विरोधी हैं।
मक्का रक्षा समझौते की चिंता
ट्रंप प्रशासन हालांकि खुले तौर पर चुप है लेकिन मक्का रक्षा समझौते को लेकर गहरी चिंता रखता है। अब राष्ट्रपति ट्रंप पर निर्भर है कि वे सऊदी अरब को आईएमईसी में शामिल करें अन्यथा पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव प्रभावित हो सकता है। चीन अभी भी इस क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर के रूप में सक्षम नहीं है। सऊदी की भागीदारी के बिना कॉरिडोर की पूर्ण क्षमता साकार होना मुश्किल है। क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव आईएमईसी की प्रगति को प्रभावित कर सकते हैं।
आगे की चुनौतियां और संभावनाए
आईएमईसी खाड़ी के तेल आपूर्तिकर्ताओं को उपभोक्ताओं से जोड़ने का व्यवहार्य मार्ग प्रस्तुत करता है। होर्मुज और स्वेज मार्गों से बचने की इसकी क्षमता इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। लेकिन सऊदी अरब की भूमिका निर्णायक है। अब्राहम एकॉर्ड्स में उसकी भागीदारी और क्षेत्रीय रक्षा समीकरणों का भविष्य तय करेगा कि यह कॉरिडोर कितनी तेजी से आगे बढ़ता है। ट्रंप प्रशासन की कूटनीतिक कोशिशें इस दिशा में महत्वपूर्ण होंगी। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा दोनों के लिए इसकी सफलता मायने रखती है।