नई दिल्ली. वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियों और ऊर्जा बाजार में लगातार बनी अनिश्चितता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्यसभा में केंद्र सरकार ने जानकारी दी कि देश ने कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के आयात स्रोतों का उल्लेखनीय विस्तार किया है, जिससे अब किसी एक क्षेत्र या सीमित आपूर्ति नेटवर्क पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि सरकार का उद्देश्य ऐसी बहुस्तरीय आपूर्ति व्यवस्था तैयार करना है, जिससे वैश्विक संकट की स्थिति में भी देश की ऊर्जा आवश्यकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। यह रणनीति भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
पश्चिम एशिया के तनाव ने सिखाया बड़ा सबक
हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, लाल सागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा संबंधी चुनौतियां तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर उत्पन्न अनिश्चितता ने विश्व ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक आपूर्ति में किसी भी प्रकार का व्यवधान घरेलू बाजार पर सीधा असर डाल सकता है। इसी अनुभव के आधार पर सरकार ने आयात स्रोतों में विविधता लाने की नीति को तेज गति से लागू किया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर वैकल्पिक देशों से निर्बाध आपूर्ति जारी रखी जा सके और घरेलू उपभोक्ताओं को ईंधन की कमी का सामना न करना पड़े।
तेल और एलएनजी आयात का नेटवर्क हुआ कहीं अधिक व्यापक
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। इसी कारण आयात स्रोतों का विस्तार ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पहले जहां भारत केवल छह देशों से एलएनजी आयात करता था, वहीं अब यह संख्या बढ़कर पंद्रह हो गई है। इसी प्रकार कच्चे तेल के आयात स्रोत भी 27 देशों से बढ़कर 41 देशों तक पहुंच गए हैं। इस प्रकार तेल और गैस दोनों को मिलाकर भारत अब 50 से अधिक देशों के साथ ऊर्जा आपूर्ति संबंध स्थापित कर चुका है। इससे वैश्विक बाजार में विकल्पों की संख्या बढ़ेगी और किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम होगी।
उपभोक्ताओं और उद्योगों को मिल सकती है बड़ी राहत
ऊर्जा आपूर्ति में विविधता का सबसे बड़ा लाभ घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं को मिलने की संभावना है। यदि किसी क्षेत्र में युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा समुद्री मार्ग बाधित होने जैसी स्थिति उत्पन्न होती है, तब भी वैकल्पिक स्रोतों से आयात जारी रखा जा सकेगा। इससे सीएनजी, पीएनजी, रसोई गैस, उर्वरक उद्योग, विद्युत उत्पादन संयंत्रों तथा अन्य औद्योगिक इकाइयों को गैस की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी। साथ ही विभिन्न देशों से प्रतिस्पर्धी दरों पर कच्चा तेल खरीदने की सुविधा मिलने से अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि का प्रभाव भी अपेक्षाकृत सीमित किया जा सकता है। इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की संभावना भी कम हो सकती है।
ऊर्जा कूटनीति से मजबूत हो रही वैश्विक साझेदारी
ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि रणनीतिक और विदेश नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। भारत पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम एशिया, अफ्रीका, रूस, अमेरिका, दक्षिण अमेरिका तथा अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ अपने संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है। आयात स्रोतों का विस्तार इस व्यापक ऊर्जा कूटनीति का ही परिणाम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि विविध आपूर्ति नेटवर्क भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में अधिक लचीला और प्रतिस्पर्धी बनाएगा। इससे दीर्घकाल में ऊर्जा लागत के बेहतर प्रबंधन, निवेश आकर्षित करने तथा ऊर्जा अवसंरचना के विकास को भी गति मिल सकती है।
बढ़ती ऊर्जा मांग के बीच आत्मनिर्भरता की ओर संतुलित कदम
भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और इसके साथ ऊर्जा की मांग भी निरंतर बढ़ रही है। सरकार एक ओर घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाने, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार विकसित करने और नवीकरणीय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने पर कार्य कर रही है, वहीं दूसरी ओर आयात स्रोतों का विस्तार कर अल्पकालिक और मध्यम अवधि की ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू उत्पादन, वैकल्पिक ऊर्जा, रणनीतिक भंडारण और विविध आयात स्रोत—इन चार स्तंभों पर आधारित यह नीति भविष्य में भारत को वैश्विक ऊर्जा संकटों का सामना अधिक प्रभावी ढंग से करने में सक्षम बना सकती है।