मुम्बई. भारत में सोना केवल आभूषण या निवेश का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। सदियों से भारतीय परिवारों में सोने को संपत्ति और सम्मान से जोड़कर देखा जाता रहा है। विवाह, त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और पारिवारिक अवसरों पर सोने की खरीद को शुभ माना जाता है। यही कारण है कि भारत आज चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदार बन चुका है। विभिन्न आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार देश हर वर्ष सैकड़ों टन सोने का आयात करता है, जिसकी कीमत अरबों डॉलर में होती है।
भारतीय महिलाओं के पास मौजूद है दुनिया का बड़ा गोल्ड भंडार
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की हालिया रिपोर्ट ने भारत की गोल्ड होल्डिंग क्षमता को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कुल निजी स्वामित्व वाले सोने का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा भारतीय महिलाओं के पास है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय समाज में सोने का महत्व केवल निवेश तक सीमित नहीं बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। तमिलनाडु की महिलाओं को गोल्ड होल्डिंग के मामले में सबसे आगे बताया गया। इसके बावजूद भारत वैश्विक स्तर पर सोने का “प्राइस मेकर” नहीं बन पाया है।
“प्राइस टेकर” होने का क्या मतलब है?
आर्थिक दृष्टि से “प्राइस टेकर” उस देश या बाजार को कहा जाता है जो किसी वस्तु की कीमत स्वयं तय नहीं करता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य को स्वीकार करता है। भारत में सोने की कीमत मुख्य रूप से लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन और न्यूयॉर्क स्थित कॉमेक्स जैसे वैश्विक बाजारों से प्रभावित होती है। चूंकि भारत में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश सोना विदेशों से आयात किया जाता है, इसलिए यहां की कीमतें वैश्विक मांग, डॉलर की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग पर निर्भर रहती हैं। यही सबसे बड़ी वजह है कि भारी खपत के बावजूद भारत कीमत तय करने की स्थिति में नहीं पहुंच पाया।
देश में किस आधार पर तय होता है सोने का भाव?
भारत में सोने की कीमत तय करने के लिए मुख्य रूप से एमसीएक्स और आईबीजेए जैसे बेंचमार्क का उपयोग किया जाता है। हालांकि पूरे देश में कोई एक समान और अनिवार्य प्रणाली लागू नहीं है। आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तय भाव के साथ आयात शुल्क, जीएसटी, डॉलर-रुपया विनिमय दर, बीमा और परिवहन लागत जोड़कर घरेलू कीमत निर्धारित की जाती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय सर्राफा बाजार पर दिखाई देता है। समाचार माध्यम भी अधिकतर इन्हीं बेंचमार्क के आधार पर सोने के दाम प्रकाशित करते हैं।
अलग-अलग दुकानों पर अलग कीमत क्यों मिलती है?
जब उपभोक्ता शादी या निवेश के लिए फिजिकल गोल्ड खरीदने जाते हैं तो अक्सर अलग-अलग ज्वैलर्स अलग भाव बताते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में अभी तक कोई एक राष्ट्रीय गोल्ड प्राइसिंग सिस्टम पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। कई व्यापारी अपनी निजी एप्लीकेशन और अलग डेटा स्रोतों के आधार पर कीमत तय करते हैं। इसके अलावा मेकिंग चार्ज, शुद्धता, स्थानीय मांग और स्टॉक की उपलब्धता भी कीमतों में अंतर पैदा करती है। यही कारण है कि एक ही शहर में अलग-अलग दुकानों पर सोने का भाव अलग दिखाई देता है।
पारदर्शी गोल्ड प्राइसिंग सिस्टम की ओर बढ़ रहे प्रयास
अब सरकार और संबंधित संस्थाएं यह प्रयास कर रही हैं कि देशभर में एक समान और पारदर्शी गोल्ड बेंचमार्क लागू किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को भविष्य में वैश्विक गोल्ड मार्केट में प्रभावशाली भूमिका निभानी है तो उसे घरेलू मूल्य निर्धारण प्रणाली को मजबूत करना होगा। एक समान बेंचमार्क लागू होने से न केवल उपभोक्ताओं को सही कीमत मिलेगी, बल्कि देश के सर्राफा बाजार में पारदर्शिता और भरोसा भी बढ़ेगा। आने वाले समय में भारत की विशाल मांग और बाजार क्षमता उसे वैश्विक गोल्ड व्यापार में अधिक प्रभावशाली स्थान दिला सकती है।