नई दिल्ली. देश के सेब कारोबार में लंबे समय तक हिमाचल प्रदेश की मजबूत पहचान रही है, खासकर शुरुआती सीजन में यहां के सेब को दिल्ली और उत्तर भारत की प्रमुख मंडियों में अच्छी कीमत मिलती थी। लेकिन अब कश्मीर की घाटी से आने वाले सेब इस बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। बेहतर रंगत, आकर्षक आकार, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमतों के कारण खरीदारों की पसंद बदलती दिखाई दे रही है। कश्मीर में बागवानी के आधुनिक तरीकों और बाजार तक बेहतर पहुंच ने इस बदलाव को गति दी है। दूसरी ओर, हिमाचल के बागवान मौसम की अनिश्चितता और उत्पादन में गिरावट से जूझ रहे हैं। नतीजतन, दोनों राज्यों के बीच सेब कारोबार की प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तेज हो गई है।
हाई-डेंसिटी खेती ने कश्मीर के बागवानों को दी नई ताकत
कश्मीर में सेब उत्पादन को बढ़ाने में हाई-डेंसिटी बागवानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस पद्धति में पारंपरिक बागों की तुलना में कम जगह में अधिक पौधे लगाए जाते हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने की संभावना बनती है। आधुनिक किस्मों, वैज्ञानिक ढंग से पौधों की देखभाल, सिंचाई और छंटाई की बेहतर व्यवस्था से फल की गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है। सरकारी सहायता और सब्सिडी ने किसानों को नई तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही बेहतर ग्रेडिंग, पैकिंग और शीत भंडारण सुविधाओं के विस्तार से कश्मीरी सेब को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और बड़े बाजारों तक पहुंचाने में मदद मिली है। इन बदलावों ने कश्मीर के बागवानों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया है।
हिमाचल की मंडियों में कश्मीरी सेब की बढ़ती मौजूदगी
हिमाचल प्रदेश के कोटखाई, जुब्बल, रोहड़ू और कोटगढ़ जैसे प्रमुख बागवानी क्षेत्रों के सेब शुरुआती सीजन में बाजार में विशेष पहचान रखते थे। इन क्षेत्रों से आने वाली टाइडमैन और अर्ली शादू जैसी शुरुआती किस्मों की मांग दिल्ली, परवाणू, पिंजौर और शिमला की मंडियों में रहती थी। लेकिन इस बार पिंजौर की थोक मंडी में तस्वीर बदली हुई नजर आई। वहां सुबह पहुंचने वाले सेब के ट्रकों में कश्मीर के दक्षिणी जिलों से आने वाली खेप की संख्या अधिक दिखाई दी। कारोबारियों के मुताबिक, कश्मीरी सेब बेहतर रंगत और ग्रेडिंग के साथ अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हुए। इसके चलते खरीदारों ने मौसम से प्रभावित और महंगे हिमाचली सेब की तुलना में कश्मीरी उत्पाद को अधिक प्राथमिकता दी।
उत्पादन के आंकड़ों में कश्मीर की बड़ी बढ़त
सेब उत्पादन के मामले में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बीच अंतर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। उपलब्ध कृषि आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में जम्मू-कश्मीर में लगभग 20.45 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह मात्रा करीब 5.83 लाख मीट्रिक टन रही। यह अंतर दोनों राज्यों की बागवानी क्षमता और उत्पादन के पैमाने को दर्शाता है। देश का सेब कारोबार लगभग 7,000 करोड़ रुपये का माना जाता है और इसमें दोनों राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है। हालांकि उत्पादन के आंकड़ों के साथ गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच, भंडारण और परिवहन की लागत भी किसानों की आमदनी तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में कश्मीर की बढ़त केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि बाजार व्यवस्था में आए बदलावों से भी जुड़ी है।
मौसम की मार से हिमाचल के बागवानों पर बढ़ा दबाव
इस सीजन में हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादन पर प्रतिकूल मौसम का गंभीर असर पड़ा है। राज्य के बागवानी विभाग ने शुरुआत में करीब 4.36 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन सीजन के अंत तक मंडियों में केवल लगभग 1.37 करोड़ पेटियां ही पहुंच सकीं। यह पिछले सीजन में भेजी गई 3.49 करोड़ पेटियों के मुकाबले काफी कम है। उत्पादन में इतनी बड़ी गिरावट से बागवानों की आय, कारोबारियों की खरीद और परिवहन से जुड़े व्यवसायों पर भी असर पड़ सकता है। हिमाचल के कई इलाकों में सेब की खेती स्थानीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार का प्रमुख आधार है। ऐसे में मौसम की अनिश्चितता से निपटने के लिए बागों का आधुनिकीकरण, बेहतर जल प्रबंधन और फसल सुरक्षा के उपायों को मजबूत करना जरूरी होता जा रहा है।
बदलती प्रतिस्पर्धा में गुणवत्ता और भंडारण होंगे निर्णायक
कश्मीर और हिमाचल के बीच सेब कारोबार की मौजूदा प्रतिस्पर्धा यह संकेत देती है कि अब केवल उत्पादन की मात्रा से बाजार में बढ़त तय नहीं होगी। फल की गुणवत्ता, आकार, रंगत, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और समय पर आपूर्ति भी खरीदारों के फैसले को प्रभावित कर रहे हैं। हिमाचल के बागवानों के सामने पारंपरिक बागवानी को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और मौसम के जोखिम को कम करने की चुनौती है। वहीं, कश्मीर के लिए भी उत्पादन बढ़ाने के साथ गुणवत्ता बनाए रखना और बाजार में स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी होगा। शीत भंडारण और परिवहन सुविधाओं का विस्तार दोनों क्षेत्रों के किसानों को बेहतर कीमत दिलाने में मदद कर सकता है। आने वाले वर्षों में सेब बाजार की दिशा इस बात से तय होगी कि कौन-सा क्षेत्र बदलती मांग, जलवायु चुनौतियों और आधुनिक बागवानी की जरूरतों के अनुरूप खुद को अधिक प्रभावी ढंग से तैयार करता है।