भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने कम आयु में ही राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्हीं में सबसे प्रेरक नाम अमर शहीद खुदीराम बोस का है। उनका जन्म 3 दिसंबर 1889 को तत्कालीन बंगाल प्रांत के मेदिनीपुर में त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मीप्रिया देवी के घर हुआ था। परिवार पहले ही अपने दो पुत्रों को खो चुका था, इसलिए लोकविश्वास के अनुसार नवजात शिशु को प्रतीकात्मक रूप से बड़ी बहन को तीन मुट्ठी टूटे चावल, जिन्हें बंगाल में ‘खुदी’ कहा जाता है, के बदले सौंप दिया गया। इसी घटना से उनका नाम ‘खुदीराम’ पड़ा। बचपन से ही उनमें तेज बुद्धि, निर्भीक स्वभाव और अन्याय के प्रति असहिष्णुता स्पष्ट दिखाई देती थी। यही गुण आगे चलकर उन्हें भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के अग्रणी युवाओं में शामिल करने वाले बने।
किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन का सक्रिय चेहरा बने
जब अधिकांश किशोर अपनी शिक्षा और भविष्य की योजनाओं में व्यस्त रहते हैं, उस समय खुदीराम बोस अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संगठित क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे थे। लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में वे अनुशीलन समिति से जुड़े, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की विचारधारा को आगे बढ़ा रही थी। उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरोध में पर्चे बांटे, युवाओं को जागरूक किया और राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया। इसी दौरान वे पहली बार ब्रिटिश प्रशासन की नजर में आए। यद्यपि उनकी आयु बहुत कम थी, लेकिन उनका आत्मविश्वास और देशभक्ति उन्हें अन्य युवाओं से अलग पहचान दिला रहे थे। बंगाल विभाजन के बाद पूरे प्रदेश में फैले राष्ट्रवादी वातावरण ने भी उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।
किंग्सफोर्ड के विरुद्ध अभियान और ऐतिहासिक घटना
उस समय डगलस किंग्सफोर्ड भारतीय क्रांतिकारियों के प्रति अत्यंत कठोर रवैया अपनाने वाले ब्रिटिश न्यायाधीशों में गिने जाते थे। उन पर भारतीयों को कठोर दंड देने और राष्ट्रवादी गतिविधियों को निर्ममता से कुचलने के आरोप लगते रहे। क्रांतिकारी संगठन ने उन्हें निशाना बनाने का निर्णय लिया और यह जिम्मेदारी खुदीराम बोस तथा उनके साथी प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपी गई। दोनों अप्रैल 1908 में मुजफ्फरपुर पहुंचे और कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखी। 30 अप्रैल 1908 की रात उन्होंने एक बग्घी को किंग्सफोर्ड का वाहन समझकर उस पर बम फेंका। दुर्भाग्यवश उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं, बल्कि स्थानीय बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और पुत्री सवार थीं, जिनकी इस विस्फोट में मृत्यु हो गई। यह घटना भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो गई।
साथी की शहादत, गिरफ्तारी और ऐतिहासिक मुकदमा
घटना के बाद दोनों क्रांतिकारी अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। प्रफुल्ल कुमार चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को गोली मारकर वीरगति प्राप्त की, जबकि खुदीराम बोस को लंबी पैदल यात्रा के बाद वैनी रेलवे स्टेशन के निकट गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के समय भी उनके चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था। मुकदमे के दौरान उन्होंने अद्भुत धैर्य और आत्मविश्वास का परिचय दिया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। उस समय देशभर के समाचार पत्रों और राष्ट्रवादी नेताओं ने इस मुकदमे को औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था की कठोरता का प्रतीक बताया। कम आयु के बावजूद उनकी निर्भीकता ने पूरे देश को झकझोर दिया और वे युवाओं के लिए साहस तथा राष्ट्रप्रेम का प्रतीक बन गए।
11 अगस्त 1908: मुस्कुराते हुए फांसी का वरण
11 अगस्त 1908 की सुबह मुजफ्फरपुर जेल में जब खुदीराम बोस को फांसी के तख्ते पर ले जाया गया, तब उनके चेहरे पर अद्भुत शांति और आत्मविश्वास था। कहा जाता है कि वे मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे तक पहुंचे और बिना किसी भय के अपने प्राण राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिए। उनकी आयु उस समय केवल 18 वर्ष थी। उनकी शहादत का समाचार पूरे देश में तेजी से फैला और लाखों भारतीयों ने उन्हें राष्ट्र के अमर बलिदानी के रूप में श्रद्धांजलि दी। अनेक स्थानों पर युवाओं ने उनके नाम पर सभाएं आयोजित कीं और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का संकल्प लिया।
चिता की भस्म तक को लोगों ने माना राष्ट्रीय धरोहर
खुदीराम बोस की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार के बाद उनकी चिता की भस्म प्राप्त करने के लिए लोगों में होड़ लग गई थी। अनेक देशभक्तों ने उस भस्म को श्रद्धा से अपने पास सुरक्षित रखा और उसे राष्ट्रभक्ति का पवित्र प्रतीक माना। उनकी शहादत ने बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के युवाओं को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित किया। आने वाले वर्षों में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त और अनेक अन्य क्रांतिकारियों ने भी खुदीराम के अदम्य साहस से प्रेरणा प्राप्त की। आज भी उनका जीवन यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों और अटूट संकल्प का परिणाम है।