नई दिल्ली. देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की स्थिति अब चिंता बढ़ाने लगी है। निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट वेदर ने 2026 के पूरे मानसूनी मौसम के लिए अपने बारिश के अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत का 85 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी ने साथ ही मौसमी सूखे की संभावना 70 प्रतिशत बताई है। यह संशोधन अप्रैल में जारी किए गए अनुमान की तुलना में बड़ा बदलाव है, जब स्काईमेट ने पूरे मौसम में दीर्घकालिक औसत की 94 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान लगाया था।
स्काईमेट के अनुसार बारिश में कमी का जोखिम अब मानसून के अंतिम चरण में और बढ़ सकता है। प्रशांत महासागर में मजबूत होते अल नीनो और कमजोर भारतीय महासागर द्विध्रुव की स्थिति को इसके प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। एजेंसी का आकलन ऐसे समय आया है जब देश के कई हिस्सों में बारिश का वितरण पहले ही असमान रहा है। इससे केवल कुल बारिश का आंकड़ा ही महत्वपूर्ण नहीं रह जाता, बल्कि यह भी अहम हो जाता है कि बारिश कब और किन इलाकों में होती है।
अगस्त और सितंबर में और बिगड़ सकता है बारिश का आंकड़ा
स्काईमेट का अनुमान मानसून के बचे हुए हिस्से को लेकर भी राहत देने वाला नहीं है। एजेंसी के अनुसार अगस्त में बारिश दीर्घकालिक औसत की करीब 84 प्रतिशत और सितंबर में लगभग 80 प्रतिशत रह सकती है। दोनों महीनों में बारिश के कम रहने की संभावना 70 प्रतिशत बताई गई है। स्काईमेट का अनुमान है कि अगस्त का महीना करीब 16 प्रतिशत की कमी के साथ समाप्त हो सकता है, जबकि सितंबर में बारिश की कमी लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
सितंबर में संभावित गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम महीने के साथ-साथ खरीफ फसलों के लिए भी अहम अवधि होती है। कई फसलों को इस दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी और नियमित बारिश की जरूरत होती है। यदि बारिश लंबे अंतराल के बाद होती है या कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक और दूसरे इलाकों में बहुत कम होती है तो कुल मौसमी आंकड़ा भले ही एक स्तर पर दिखाई दे, लेकिन खेती पर उसका प्रभाव समान नहीं होता। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक अब केवल अखिल भारतीय बारिश के आंकड़े के बजाय उसके क्षेत्रीय वितरण पर भी नजर रख रहे हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग का अनुमान भी सामान्य से कम
सरकारी भारत मौसम विज्ञान विभाग का आकलन भी इस वर्ष सामान्य मानसून की उम्मीद नहीं जगा रहा है। विभाग ने मई के अंत में 2026 के पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून मौसम के लिए देशभर में दीर्घकालिक औसत की 90 प्रतिशत बारिश का अनुमान जारी किया था। उसके अनुसार मौसमी बारिश सामान्य से कम रहने की सबसे अधिक संभावना थी और देश के लिए कम या उससे भी कम बारिश की श्रेणियों की संयुक्त संभावना 84 प्रतिशत आंकी गई थी।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुमान में 90 प्रतिशत बारिश के साथ लगभग चार प्रतिशत की मॉडल त्रुटि भी है। विभाग ने देश के कई हिस्सों, खासकर मध्य और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत तथा उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई थी। साथ ही उसने यह भी रेखांकित किया था कि कम बारिश का असर कृषि, जल उपलब्धता, जलविद्युत उत्पादन और पेयजल संसाधनों पर पड़ सकता है। ऐसे में स्काईमेट का नया अनुमान सरकारी अनुमान से भी अधिक गंभीर स्थिति की ओर संकेत करता है।
17 अगस्त तक बारिश में 13 प्रतिशत की कमी
मानसून की मौजूदा स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1 जून से 17 अगस्त के बीच देश में सामान्य के मुकाबले लगभग 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इस अवधि में देश में करीब 518.7 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर लगभग 596 मिलीमीटर बारिश होने की उम्मीद रहती है। पूरे दक्षिण-पश्चिम मानसून मौसम का दीर्घकालिक औसत लगभग 870 मिलीमीटर के आसपास है। ये आंकड़े बताते हैं कि मानसून के अंतिम चरण में बारिश की भरपाई की गुंजाइश अब सीमित होती जा रही है।
हालांकि अखिल भारतीय बारिश का आंकड़ा पूरे देश की तस्वीर नहीं बताता। भारत में मानसून का प्रभाव क्षेत्र और समय दोनों के लिहाज से बेहद विविध है। किसी एक क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होने से राष्ट्रीय औसत में सुधार हो सकता है, लेकिन जिन इलाकों में बारिश की कमी बनी रहती है वहां कृषि और जल संसाधनों की समस्या जस की तस रह सकती है। इसी कारण मौसम विभाग और निजी पूर्वानुमान एजेंसियां क्षेत्रीय वितरण, बारिश के अंतराल और मानसूनी प्रणालियों की गतिविधियों को लगातार निगरानी में रखती हैं।
अल नीनो को माना जा रहा बड़ा कारण
इस वर्ष मानसून की चिंता के केंद्र में अल नीनो की मजबूत होती स्थिति है। प्रशांत महासागर के समुद्री सतह तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले बदलाव वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं और अल नीनो की स्थिति परंपरागत रूप से भारतीय मानसून के लिए प्रतिकूल मानी जाती है। स्काईमेट ने अपने संशोधित अनुमान में मजबूत होते अल नीनो और कमजोर भारतीय महासागर द्विध्रुव को बारिश में आगे होने वाली संभावित कमी से जोड़ा है।
अमेरिकी और वैश्विक मौसम प्रणालियों के दीर्घकालिक अनुमानों में भी प्रशांत महासागर की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। हालांकि किसी मौसम घटना का प्रभाव केवल एक कारक से तय नहीं होता। समुद्री सतह का तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, भारतीय महासागर की परिस्थितियां और मानसूनी निम्न दबाव प्रणालियों की सक्रियता मिलकर बारिश के व्यवहार को प्रभावित करती हैं। इसलिए अल नीनो को महत्वपूर्ण जोखिम कारक मानना उचित है, लेकिन उसके आधार पर हर क्षेत्र में बारिश की स्थिति बिल्कुल एक जैसी होगी, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा।
कमजोर बारिश का सबसे बड़ा असर खेती पर
कमजोर मानसून का सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत की खेती का बड़ा हिस्सा अभी भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है और बारिश में लंबा अंतराल खरीफ फसलों के लिए चुनौती पैदा कर सकता है। हालिया विश्लेषणों में कपास, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी फसलों को मानसून की कमजोरी से जोखिम में बताया गया है। खासकर ऐसी फसलें जिनकी जड़ें अभी गहराई तक विकसित नहीं हुई हैं, बारिश के लंबे अंतराल के दौरान नमी की कमी से जल्दी प्रभावित हो सकती हैं।
बारिश की कमी का प्रभाव खेतों से आगे भी जा सकता है। कम वर्षा से जलाशयों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे सिंचाई और बाद के रबी मौसम की तैयारी पर दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण आय में कमजोरी आने पर उपभोक्ता मांग भी प्रभावित हो सकती है। खाद्य उत्पादन में कमी होने की स्थिति में दालों, तिलहनों, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए कमजोर मानसून को केवल मौसम की खबर के रूप में नहीं, बल्कि कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य महंगाई से जुड़े व्यापक आर्थिक जोखिम के रूप में भी देखा जाता है।
क्या सूखा तय हो गया है?
स्काईमेट ने सूखे की 70 प्रतिशत संभावना जताई है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे देश में सूखा निश्चित हो गया है। यह एक पूर्वानुमानित संभावना है, अंतिम परिणाम नहीं। स्काईमेट की मौसमी श्रेणी में 90 प्रतिशत से कम दीर्घकालिक औसत बारिश को सूखे की श्रेणी में रखा गया है। उसके मौजूदा आकलन में सूखे की संभावना 70 प्रतिशत, सामान्य से कम बारिश की संभावना 20 प्रतिशत और सामान्य बारिश की संभावना 10 प्रतिशत बताई गई है।
मौसम पूर्वानुमान में अनिश्चितता बनी रहती है और मानसून की अंतिम स्थिति वास्तविक मौसमी गतिविधियों पर निर्भर करेगी। आने वाले सप्ताहों में बारिश की कुछ अच्छी प्रणालियां सक्रिय होती हैं तो राष्ट्रीय आंकड़े में सुधार संभव है। दूसरी ओर यदि अगस्त और सितंबर में अनुमान के अनुरूप बारिश कमजोर रहती है तो मौसमी कमी और गहरी हो सकती है। इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें जल प्रबंधन, फसल सलाह और क्षेत्रवार मौसम चेतावनियों के आधार पर तैयारी मजबूत रखें।
अब सितंबर की बारिश पर टिकी बड़ी उम्मीद
दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम चरण में सितंबर की बारिश अब बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। यदि अगस्त के बाद सितंबर में भी बारिश कमजोर रहती है तो मौसमी कमी को भरना मुश्किल हो सकता है। इसके विपरीत सितंबर में मानसूनी गतिविधि अपेक्षा से बेहतर रहने पर कुछ क्षेत्रों में स्थिति सुधर सकती है। यही कारण है कि आने वाले दिनों में अल नीनो की तीव्रता, भारतीय महासागर की परिस्थितियों और मानसूनी प्रणालियों की सक्रियता पर मौसम वैज्ञानिकों की निगाह बनी रहेगी।
फिलहाल स्काईमेट और भारत मौसम विज्ञान विभाग दोनों के अनुमान सामान्य से कम बारिश की ओर संकेत कर रहे हैं, हालांकि दोनों के आंकड़ों में अंतर है। सरकारी विभाग का अनुमान 90 प्रतिशत और स्काईमेट का संशोधित अनुमान 85 प्रतिशत है। ऐसे में 2026 का मानसून देश के लिए सावधानी का संकेत जरूर दे रहा है, लेकिन अंतिम तस्वीर मानसून के बचे हुए हफ्तों की बारिश से ही स्पष्ट होगी। किसानों, जल प्रबंधकों और नीति निर्माताओं के लिए अब सबसे जरूरी कदम यही होगा कि संभावित कमी को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर जल और कृषि प्रबंधन की तैयारी पहले से मजबूत की जाए।