भारत की आर्थिक और कूटनीतिक राजधानी मुंबई सितंबर में ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद के एक बड़े मंच की मेजबानी करने जा रही है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से जुड़े 500 से अधिक राजदूत, राजनयिक, कारोबारी नेता, विद्वान, सांस्कृतिक हस्तियां, उद्यमी और निवेशक इस दो दिवसीय आयोजन में शामिल होंगे। इसका उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समझना भी है कि किसी देश की संस्कृति, परंपरा, ज्ञान प्रणाली और रचनात्मक क्षमता दूसरे देशों के साथ दीर्घकालिक और अर्थपूर्ण संबंध बनाने में किस तरह भूमिका निभा सकती है।
आयोजक एपी ग्लोबेल के अनुसार ग्लोबल इम्पैक्ट फोरम का दूसरा संस्करण 5 और 6 सितंबर को मुंबई के ताज महल पैलेस में आयोजित किया जाएगा। कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय सॉफ्ट पावर महोत्सव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। बदलती वैश्विक व्यवस्था में जब देशों के बीच संबंध केवल व्यापार, निवेश और रणनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं रह गए हैं, तब संस्कृति को संवाद और विश्वास निर्माण के माध्यम के रूप में देखने की यह पहल विशेष महत्व रखती है।
ब्रिक्स देशों की साझा विरासत पर होगी गहरी बातचीत
ब्रिक्स के पांच मूल देशों की अपनी-अपनी समृद्ध सभ्यतागत परंपराएं हैं। भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणालियों से लेकर चीन की पारंपरिक चिकित्सा और मार्शल आर्ट, रूस की साहित्यिक विरासत, ब्राजील की लोक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और दक्षिण अफ्रीका की आदिवासी परंपराओं तक इन देशों के पास दुनिया के सामने साझा करने के लिए विशाल सांस्कृतिक पूंजी है। आयोजन में इसी विविधता को प्रतिस्पर्धा के बजाय संवाद और सहयोग के आधार के रूप में देखने की कोशिश की जाएगी।
सांस्कृतिक संबंधों की ताकत यह है कि वे सरकारी समझौतों से आगे जाकर समाजों के बीच प्रत्यक्ष जुड़ाव पैदा कर सकते हैं। साहित्य, संगीत, सिनेमा, नृत्य, भोजन, चिकित्सा परंपराएं और खेल ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें समझने के लिए हमेशा राजनीतिक या आर्थिक समानता जरूरी नहीं होती। इन्हीं माध्यमों से लोग दूसरे समाजों की जीवनशैली, मूल्यों और ऐतिहासिक अनुभवों को करीब से समझ पाते हैं। ब्रिक्स जैसे बहुध्रुवीय समूह में यह सांस्कृतिक संवाद भविष्य की व्यापक साझेदारी के लिए सामाजिक आधार तैयार कर सकता है।
आयुर्वेद से पारंपरिक चीनी चिकित्सा तक साझा ज्ञान पर चर्चा
कार्यक्रम में भारत की आयुर्वेद परंपरा और चीन की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को भी चर्चा के केंद्र में रखा जाएगा। दोनों देशों में स्वास्थ्य और शरीर को देखने की अपनी दीर्घकालिक ज्ञान परंपराएं रही हैं, जिनका प्रभाव आधुनिक समय तक बना हुआ है। ऐसे विषयों पर संवाद से यह समझने का अवसर मिल सकता है कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध, शिक्षा और वैश्विक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साथ किस तरह जोड़ा जा सकता है।
हालांकि पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के वैश्विक विस्तार के साथ वैज्ञानिक प्रमाण, मानकीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षित उपयोग जैसे प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इस तरह के मंचों पर सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के साथ उसके आधुनिक उपयोग से जुड़े वैज्ञानिक और संस्थागत पहलुओं पर भी गंभीर चर्चा जरूरी होगी। यदि विभिन्न देशों की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां शोध और दस्तावेजीकरण के साझा प्रयासों से जुड़ती हैं तो इससे सांस्कृतिक संरक्षण के साथ नई बौद्धिक साझेदारियों के रास्ते खुल सकते हैं।
कलरिपयट्टू से कुंग फू और ताई ची तक
भारत और चीन की सांस्कृतिक पहचान केवल उनके प्राचीन ग्रंथों या स्थापत्य तक सीमित नहीं है। दोनों देशों की शारीरिक अनुशासन और युद्धकला की परंपराएं भी उनकी सभ्यतागत विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आयोजन में भारत की कलरिपयट्टू परंपरा तथा चीन की कुंग फू और ताई ची जैसी विधाओं पर चर्चा प्रस्तावित है। इनके माध्यम से शरीर, अनुशासन, ध्यान और आत्मनियंत्रण से जुड़े अलग-अलग सांस्कृतिक दृष्टिकोणों को समझने का अवसर मिलेगा।
इसी तरह भारतीय शास्त्रीय नृत्य और ब्राजील की कैपोएरा जैसी विधाएं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और शारीरिक कला के अलग-अलग रूपों को सामने लाती हैं। एक ओर शास्त्रीय नृत्य में कथा, भाव, संगीत और आध्यात्मिक परंपरा का मेल दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर कैपोएरा में संगीत, गति, खेल और ऐतिहासिक सामाजिक अनुभवों की अनूठी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। इन विविध विधाओं को एक मंच पर लाना सांस्कृतिक विविधता के भीतर मौजूद समानताओं को पहचानने का अवसर प्रदान कर सकता है।
टैगोर और टॉल्सटॉय से सिनेमा तक साहित्यिक संवाद
कार्यक्रम में रवींद्रनाथ टैगोर और लियो टॉल्सटॉय जैसी महान साहित्यिक विभूतियों के माध्यम से विचारों और सभ्यताओं के बीच संवाद की संभावनाओं पर भी चर्चा होगी। दोनों लेखकों की रचनाएं अपने-अपने समाजों की सीमाओं से आगे निकलकर मानवता, नैतिकता, समाज और जीवन के व्यापक प्रश्नों से जुड़ती हैं। ऐसे साहित्यिक संबंध यह दिखाते हैं कि देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक पुराना और व्यापक हो सकता है।
सिनेमा और संगीत भी इस सांस्कृतिक संवाद के प्रमुख माध्यम होंगे। आज फिल्मों और डिजिटल माध्यमों के जरिए किसी देश की संस्कृति दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहले की तुलना में कहीं तेजी से पहुंचती है। ब्रिक्स देशों के बीच सह-निर्माण, फिल्म महोत्सव, संगीत सहयोग और कलाकारों के आदान-प्रदान जैसी संभावनाएं भविष्य में सांस्कृतिक उद्योगों के साथ आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकती हैं। इस लिहाज से संस्कृति अब केवल विरासत संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा भी बन चुकी है।
आदिवासी परंपराओं से जुड़ेगा संवाद का नया आयाम
ग्लोबल इम्पैक्ट फोरम में आदिवासी परंपराओं और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को भी स्थान दिया जा रहा है। ब्रिक्स के प्रत्येक देश में आदिवासी और स्थानीय समुदायों की अपनी विशिष्ट परंपराएं, कला, संगीत, मौखिक इतिहास और प्रकृति से जुड़े ज्ञान मौजूद हैं। आधुनिकता और शहरीकरण के दौर में इन परंपराओं का संरक्षण वैश्विक सांस्कृतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। ऐसे मंच इन समुदायों के ज्ञान और रचनात्मकता को व्यापक अंतरराष्ट्रीय संवाद में स्थान देने का माध्यम बन सकते हैं।
आदिवासी ज्ञान प्रणालियों की चर्चा केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इनमें पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, सामुदायिक जीवन और प्रकृति के साथ संतुलन से जुड़े अनेक अनुभव निहित हैं। जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संरक्षण जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक शोध के साथ जोड़ना नई संभावनाएं पैदा कर सकता है। ब्रिक्स देशों के बीच इस दिशा में सहयोग सांस्कृतिक संरक्षण के साथ पर्यावरणीय संवाद को भी मजबूत कर सकता है।
खेल और रचनात्मक उद्योग भी बनेंगे साझेदारी का आधार
खेलों को भी देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क का प्रभावी माध्यम माना जाता है। क्रिकेट, फुटबॉल, मार्शल आर्ट, एथलेटिक्स और अन्य खेलों के जरिए युवा पीढ़ी एक-दूसरे की संस्कृतियों से जुड़ सकती है। ब्रिक्स देशों में खेल प्रतिभाओं और खेल उद्योग की विशाल संभावनाओं को देखते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ खेल संवाद को जोड़ना भविष्य में प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं और युवा आदान-प्रदान के नए अवसर पैदा कर सकता है।
इसी तरह रचनात्मक उद्योगों में डिजाइन, फैशन, संगीत, फिल्म, डिजिटल सामग्री, हस्तशिल्प और प्रदर्शन कलाएं तेजी से वैश्विक बाजार का हिस्सा बन रही हैं। यदि सांस्कृतिक सहयोग को उद्यमिता और निवेश से जोड़ा जाए तो कलाकारों और रचनाकारों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। मुंबई जैसे शहर में इस तरह का आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की सांस्कृतिक विविधता के साथ उसके विकसित मीडिया, मनोरंजन और रचनात्मक उद्योगों को भी वैश्विक मंच प्रदान करता है।
सॉफ्ट पावर से आगे बढ़कर बन सकता है रणनीतिक सेतु
सॉफ्ट पावर की अवधारणा का मूल विचार यह है कि कोई देश केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति के जरिए ही प्रभावशाली नहीं बनता, बल्कि उसकी संस्कृति, विचार, मूल्य और अंतरराष्ट्रीय छवि भी दूसरे समाजों को प्रभावित कर सकती है। ब्रिक्स देशों के संदर्भ में यह अवधारणा विशेष महत्व रखती है क्योंकि समूह में शामिल देशों की सभ्यतागत पहचान और सांस्कृतिक विविधता अत्यंत व्यापक है। संस्कृति के माध्यम से आपसी समझ बढ़ाना राजनीतिक और आर्थिक सहयोग के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकता है।
मुंबई में होने वाला यह आयोजन इसी व्यापक संभावना की ओर संकेत करता है। यदि संस्कृति को केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, पर्यटन, रचनात्मक उद्योग, विरासत संरक्षण, अनुसंधान और युवा आदान-प्रदान से जोड़ा जाए तो इसका प्रभाव लंबे समय तक रह सकता है। ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग पहले से चर्चा में रहता है, लेकिन सांस्कृतिक संवाद उस साझेदारी को समाजों और लोगों के स्तर तक पहुंचाने का काम कर सकता है। यही इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण संभावनाओं में से एक है।
मुंबई से दुनिया को दिखाई देगी ब्रिक्स की सांस्कृतिक विविधता
5 और 6 सितंबर को प्रस्तावित ग्लोबल इम्पैक्ट फोरम ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब वैश्विक राजनीति में बहुध्रुवीय सहयोग और क्षेत्रीय साझेदारियों पर लगातार जोर बढ़ रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच संस्कृति, ज्ञान और विरासत को केंद्र में रखकर संवाद इस समूह के पारंपरिक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श से आगे जाने का अवसर देता है। 500 से अधिक प्रतिनिधियों की संभावित भागीदारी इसे केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम के बजाय विचार, संपर्क और सहयोग का व्यापक मंच बना सकती है।
मुंबई में होने वाले इस आयोजन की असली सफलता इस बात से तय होगी कि यहां होने वाली चर्चाएं कितनी ठोस साझेदारियों में बदलती हैं। यदि साहित्य, चिकित्सा ज्ञान, कला, सिनेमा, खेल, आदिवासी विरासत और रचनात्मक उद्योगों में स्थायी सहयोग की दिशा बनती है तो संस्कृति वास्तव में ब्रिक्स देशों के बीच संबंधों का नया आधार बन सकती है। दुनिया के बदलते शक्ति-संतुलन के बीच यह संदेश महत्वपूर्ण है कि देशों के बीच स्थायी रिश्ते केवल समझौतों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सभ्यताओं और समाजों को समझने से भी मजबूत होते हैं।