इन्फोसिस के सह-संस्थापक और भारत के प्रमुख उद्यमियों में शामिल एन. आर. नारायण मूर्ति आज 80 वर्ष के हो गए। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनका वह विचार एक बार फिर चर्चा में है, जिसमें उन्होंने किसी देश की वास्तविक संपत्ति को उसके प्राकृतिक संसाधनों या आर्थिक ताकत से आगे नागरिकों की बौद्धिक क्षमता और मेहनत से जोड़ा था। उनका मानना रहा है कि किसी राष्ट्र की दिशा और गति तय करने में वहां के लोगों की सोच, ज्ञान, परिश्रम और जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि उनका यह विचार उद्यमिता और आर्थिक विकास की चर्चा से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाता है।
‘देश की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति नागरिकों का मस्तिष्क और मेहनत’
नारायण मूर्ति ने कहा था, “मेरा मानना है कि किसी राष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति उसके नागरिकों का मस्तिष्क और कड़ी मेहनत है।” उनके इस विचार में विकास का केंद्र मनुष्य को बनाया गया है। किसी देश के पास कितने प्राकृतिक संसाधन हैं, उसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है या उसके पास कितनी भौतिक संपदा है, यह महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इन संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने वाली मानवीय क्षमता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होती है। ज्ञान, कौशल, रचनात्मकता और परिश्रम जब सही दिशा में लगाए जाते हैं, तो वे आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की मजबूत नींव तैयार कर सकते हैं।
विकासशील से विकसित राष्ट्र बनने की सोच
नारायण मूर्ति के विचार में किसी देश का विकास केवल आय और उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं है। उनका मानना है कि विकासशील देश को विकसित राष्ट्र के स्तर तक पहुंचाने के लिए उसके नागरिकों की आकांक्षाओं और कार्यसंस्कृति में भी बदलाव आवश्यक है। इसके लिए लोगों को ऊंचे लक्ष्य निर्धारित करने, अपनी क्षमताओं को लगातार विकसित करने और बेहतर परिणाम हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्र की प्रगति तभी व्यापक और स्थायी बन सकती है, जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और राष्ट्रीय विकास की दिशा एक-दूसरे के साथ जुड़ें।
युवाओं को ऊंची आकांक्षाओं की जरूरत
नारायण मूर्ति ने विशेष रूप से युवाओं की भूमिका को राष्ट्र के भविष्य से जोड़ा है। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी में ऊंची आकांक्षाएं होनी चाहिए और उसे अपनी क्षमता का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रखना चाहिए। बड़े लक्ष्य व्यक्ति को अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और प्रतिस्पर्धी वातावरण में उत्कृष्टता हासिल करने की इच्छा पैदा करते हैं। किसी भी देश की युवा आबादी यदि शिक्षा, कौशल, नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से अपनी क्षमता का विस्तार करे, तो वह देश की आर्थिक शक्ति को लंबे समय तक नई दिशा दे सकती है।
मूल्यों और अनुशासन को विकास का आधार माना
महत्वाकांक्षा के साथ नारायण मूर्ति ने मूल्यों और अनुशासन को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना। केवल बड़ा लक्ष्य निर्धारित कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे हासिल करने के लिए सही आचरण, निरंतर परिश्रम और जिम्मेदारी की भावना भी आवश्यक है। उनके विचार में उत्कृष्टता कोई एक बार हासिल की जाने वाली उपलब्धि नहीं, बल्कि लगातार बेहतर करने की प्रक्रिया है। अनुशासन व्यक्ति को लक्ष्य के प्रति स्थिर बनाए रखता है, जबकि अच्छे मूल्य यह सुनिश्चित करते हैं कि उपलब्धि का उपयोग व्यापक समाज और राष्ट्र के हित में भी किया जाए।
उत्कृष्टता की संस्कृति से बनती है मजबूत अर्थव्यवस्था
नारायण मूर्ति के विचारों में उत्कृष्टता पर लगातार जोर दिखाई देता है। किसी भी क्षेत्र में विश्वस्तरीय परिणाम हासिल करने के लिए गुणवत्ता, समयबद्धता, नवाचार और निरंतर सीखने की संस्कृति आवश्यक होती है। यही सिद्धांत उद्योग, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और सार्वजनिक प्रशासन जैसे क्षेत्रों पर भी लागू होता है। जब संस्थाएं और नागरिक अपने काम में उच्च मानक स्थापित करते हैं, तो उससे उत्पादकता बढ़ती है, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होती है और वैश्विक स्तर पर देश की प्रतिष्ठा को भी बल मिलता है।
इन्फोसिस से भारत की तकनीकी पहचान तक की यात्रा
नारायण मूर्ति ने 1981 में छह अन्य इंजीनियरों के साथ मिलकर इन्फोसिस की स्थापना की थी। इसके बाद कंपनी ने भारत के सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने वाली प्रमुख संस्थाओं में अपनी जगह बनाई। उनकी उद्यमशील यात्रा इस बात का उदाहरण भी मानी जाती है कि सीमित संसाधनों के बीच ज्ञान, तकनीकी क्षमता, संगठनात्मक अनुशासन और दीर्घकालिक दृष्टि के आधार पर एक वैश्विक संस्था खड़ी की जा सकती है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विस्तार के साथ उनकी सार्वजनिक छवि एक ऐसे उद्योग नेता के रूप में बनी, जिन्होंने आर्थिक सफलता के साथ संस्थागत मूल्यों पर भी जोर दिया।
राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की भूमिका का संदेश
नारायण मूर्ति का यह विचार मूल रूप से नागरिकों को राष्ट्र की विकास यात्रा का सक्रिय भागीदार मानता है। सरकारें नीतियां बना सकती हैं, संस्थाएं अवसर पैदा कर सकती हैं और उद्योग रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों को गति दे सकते हैं, लेकिन इन सभी व्यवस्थाओं का अंतिम आधार मनुष्य की क्षमता ही है। यदि नागरिक शिक्षा, मेहनत, अनुशासन, नैतिकता और उत्कृष्टता को अपनी कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाते हैं, तो उसका प्रभाव व्यक्तिगत सफलता से आगे बढ़कर पूरे समाज पर पड़ता है। यही कारण है कि उनका यह कथन आज भी केवल एक कारोबारी विचार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए मानव पूंजी के महत्व का व्यापक संदेश देता है।